बुधवार, 23 नवंबर 2016

कविताएँ - कृष्णकुमार तिवारी किशन

कविता का अंश... बूढी माँ का मन अनमन है । उमर घटी है, समय नटी है, अब करतब दिखलाए। दो बेटों के बीच ठनी है, वो किसको समझाए ? आज स्वयं से ही, अनबन है । व्याकुल चित्त हुआ बूढी माँ का, घडी-घडी घबराए। दोनों ही अपनी ऊँगली है, कितना किसे दबाए ? हृदय में बढती, धड़कन है। शांत हो गयी लहरें बँटकर, माँ मझधार पड़ी। अपने ही घर के कोने में सहमी- सी रही खड़ी। पल पल तड़पन ही तड़पन है । खांसी आती ताने लेकर, आफत नई -नई। आज बड़े कल छोटे का दिन, माँ है बँटी हुई। टुकड़ों पर पलता जीवन है। ऐसी ही अन्य मर्मस्पर्शी कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... संपर्क - kktiwari.70@rediffmail.com

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