बुधवार, 2 नवंबर 2016

कविता - उधार - अज्ञेय

कविता का अंश... सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी। मैंने धूप से कहा : मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार? चिड़िया से कहा : थोड़ी मिठास उधार दोगी? मैंने घास की पत्ती से पूछा : तनिक हरियाली दोगी- तिनके की नोक-भर? शंखपुष्पी से पूछा : उजास दोगी- किरण की ओक-भर? मैंने हवा से माँगा : थोड़ा खुलापन-बस एक प्रश्वास, लहर से : एक रोम की सिहरन-भर उल्लास। मैंने आकाश से माँगी आँख की झपकी-भर असीमता-उधार। सब से उधार माँगा, सब ने दिया। यों मैं जिया और जीता हूँ क्योंकि यही सब तो है जीवन- गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला, गंधवाही मुक्त खुलापन, लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह, और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का : ये सब उधार पाये हुए द्रव्य। रात के अकेले अंधकार में सपने से जागा जिसमें एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर मुझ से पूछा था : 'क्यों जी, तुम्हारे इस जीवन के इतने विविध अनुभव हैं इतने तुम धनी हो, तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे उधार जिसे मैं सौ-गुने सूद के साथ लौटाऊँगा- और वह भी सौ-सौ बार गिन के- जब-जब मैं आऊँगा?' मैंने कहा : प्यार? उधार? स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार। उस अनदेखे अरूप ने कहा : 'हाँ, क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं- यह अकेलापन, यह अकुलाहट, यह असमंजस, अचकचाहट, आर्त अननुभव, यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय विरह-व्यथा, यह अंधकार में जाग कर सहसा पहचानना कि जो मेरा है वही ममेतर है। यह सब तुम्हारे पास है तो थोड़ा मुझे दे दो-उधार- इस एक बार- मुझे जो चरम आवश्यकता है।' इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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