शुक्रवार, 18 नवंबर 2016
बाल कविताएँ - हरीश परमार
बाल कविताएँ – हरीश परमार
मेरी प्यारी गुडिया… कविता का अंश….
ठुमक-ठुमक कर आँगन में,
चल रही है मेरी बिटिया।
रूनझुन-रूनझुन बाजत है,
उसके पैरों की पायलिया।
एक कदम फिर दो कदम,
धीरे-धीरे आगे बढ़ती,।
अब गिरी कि तब गिरी,
लेकिन सँभल-सँभल जाती।
हाथ उठाकर दूर भगाए,
जब आँगन में उतरे चिडिया।
कभी मम्मी, कभी पापा के,
पीछे-पीछे चलती है।
थक जाती पर नहीं बैठती,
हर दम चलना चाहती है।
सबके मन को भली लगे,
उसकी तुतली-तुतली बतियाँ।
मेरा तो है एक ही सपना,
बड़ी हो जाए मेरी बिटिया।
पढ़े-लिखे और नाम कमाए,
देश का गौरव बन जाए,
मेरी प्यारी-प्यारी बिटिया।
ऐसी ही अन्य मनभावन बालकविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…
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