
डॉ. महेश परिमल
आज के भागमभाग और आपाधापी के जीवन में सबका एक ही उद्देश्य है- वह है सुखी होना। सुखी होने के लिए इंसान क्या नहीं करता। उसकी खोज में वह कहाँ-कहाँ नहीं भटकता। सुखी जीवन प्राप्त करने के लिए लोग धन, जमीन, मकान, विद्या, यश आदि तो बटोर लेते हैं, परंतु सुख से रहना नहीं जानते। सुख कोई क्रय-विक्रय की चीज भी नहीं, जिसे जब चाहे जितना खरीद लिया। सुख आंतरिक विषय है। यह हमारे भीतर ही होता है। हमें इसका अनुभव करना होता है।
पदार्थों को संग्रह करने में मनुष्य की प्रवृत्ति जितनी प्रबल है, उतनी यदि अच्छा व्यवहार करने में होती, तो उसे सुखी होने में क्षण भर भी नहीं लगता। मनुष्य चाहे कितना भी ज्ञानी क्यों न हो, यदि वह अच्छा व्यवहार करना नहीं जानता, तो कदापि सुखी नहीं हो सकता। धर्म, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि का दिखावा भी मनुष्य को सुख नहीं दे सकता।
यदि हम अपने घर और समाज में रहने वालों से अच्छा व्यवहार करते हैं, तो आधा पेट सूखी रोटी खाकर भी सुख से रह सकते हैं। दूसरी ओर यदि हम अपने साथियों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार नहीं कर सकते तो हर प्रकार की सम्पन्नता भी हमें सुख नहीं दे सकती। लोग सुखी होने के लिए देवी-देवताओं की शरण में जाते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि इसी समाज में कई मनुष्य ऐसे हैं, जो राग-द्वेष से ऊपर उठकर लोगों की भलाई के बारे में सोचते हैं और उनकी सेवा करने को सदैव तत्पर रहते हैं। क्या ऐसे लोग ईश्वर के प्रतिनिधि नहीं हैं?
सच बताएँ, क्या ईश्वर पत्थर, पेड़-पौधे, नदी, पर्वत, गोबर, मिट्टी, चाँद, सूरज, तारे आदि जड़ पदार्थों में है? इन सभी को हम यदा-कदा पूजते ही रहते हैं, पर क्या कभी हमने ईश्वर के जीवित प्रतिनिधियों की तरफ ध्यान दिया है? वस्तुत: प्राणी ही और उनमें भी श्रेष्ठ मनुष्य ही सच्चे देवता है, क्योंकि उनमें जान है। वो ज्ञान स्वरूप हैं। उनसे गलती होती है, तो उन्हीं से सही होने की भी उम्मीद है। आप कह सकते हैं कि हमने जड़ वस्तुओं में ईश्वर के दर्शन किए हैं, इसलिए हम तो उन्हें ही पूजेंगे। यदि आपको जड़ वस्तुओं में ईश्वर के दर्शन होते हैं, तो आप चेतन में फिर किस के दर्शन करेंगे, यह सोचा कभी आपने?
आप यह जान लें कि पत्थर की मूर्ति कुछ गलत नहीं कर सकती तो कुछ सही भी नहीं कर सकती। पेड़, पत्थर, पहाड़ में बुराई नहीं है, तो उनमें भलाई करने की भी समझ नहीं है। इंसान बुराई करता है, परंतु उसी से भलाई की भी आशा की जा सकती है। मनुष्य जब अच्छा व्यवहार करता है, तब वह देवत्व के करीब होता है। यही अच्छा व्यवहार और भलाई के कार्य जब उसके स्थायी स्वभाव बन जाए, तो वह देवता बन जाता है।
आप कहेंगे, एक डॉक्टर भी अच्छा व्यवहार करके रोग का उपचार करके भलाई का काम करता है, तो क्या हम उसे देवता मान लें? वह डॉक्टर जिस पर आपने विश्वास कर अपने परिजन को उसके हवाले कर दिया है और वह उसे बचाने में अपनी सारी शक्ति लगा रहा है, तो उस वक्त वह किसी ईश्वर से कम नहीं, पर उसके एवज में जब वह स्वार्थी होकर मोटी रकम वसूलता है, तो वह किसी शैतान से कम नहीं। एक ही व्यक्ति में दो रूपों के दर्शन ऐसे होते हैं।
डॉ. महेश परिमल
आपके आलेखों को आजकल लागातार पढ़ रही हूं। बहुत ही अच्छी बातें लिखी होती है।
जवाब देंहटाएंbhut achha likha hai aapne.
जवाब देंहटाएंसुखी रहना है तो दुसरों को सुखी रखो..
जवाब देंहटाएंसुखी रहना है तो दुसरों को सुखी रखो.
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