शुक्रवार, 18 मार्च 2016
रोटियाँ - नज़ीर अकबराबादी
रोटियाँ - नज़ीर अकबराबादी की यह प्रसिद्ध रचना आज के दौर में भी अपनी पहचान बनाए हुए है। यह समाज की वो सच्चाई है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
बुधवार, 16 मार्च 2016
बंजारानामा - नज़ीर अकबराबादी
नज़ीर अकबराबादी मृत्यु के करीब 300 वर्ष बाद भी प्रासंगिक हैं। उनकी कविताओं में ताज़गी देखते ही बनती है। साधारण से साधारण विषय पर भी वो गंभीरता से अपनी बात रखते हैं। हबीब तनवीर का नाटक 'आगरा बाज़ार' उन्हीं के गीतों से सजा और सॅंवरा है। यहॉं प्रस्तुत है उनकी एक प्रसिद्ध रचना - जब लाद चलेगा बंजारा...
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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नज़ीर अकबराबादी - एक परिचय
उर्दू के मशहूर शायर नज़ीर अकबराबादी ने लगभग 95 वर्ष की आयु भोगी और सच्चे अर्थों में भोगी। एश-ओ-आराम से न रहने पर भी उन्होंने जीवन का पूरा आनंद लिया। संसार की तथाकथित छोटी से छोटी बातों में भी पूरी दिलचस्पी ली और उन सभी बातों को इस तरह सामने रख दिया कि लोग भी जीवन का पूर्ण उपयोग कर सकें। उन्होंने जन्म से लेकर मरण पर्यन्त पूरे जीवन का इस उत्साह के साथ अपनी शायरी में वर्णन किया है कि यह वर्णन कहीं और नहीं मिलता। उनकी शायरियों को यदि सहेजकर रखा गया होता तो उनकी संख्या दो लाख से भी अधिक होती, किंतु अफसोस लगभग 6 हजार शे'र ही उपलब्ध हो पाए हैं। वह भी उनके शिष्यों की उदारता का ही परिणाम है।
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दिव्य दृष्टि,
लेख
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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अॅंधेरे में उम्मीद - डॉ. श्रीराम परिहार
डॉ. श्रीराम परिहार का यह ललित निबंध हमारे निराश मन-मस्तिष्क को एक नई ऊर्जा से भर देता है। आशा संघर्ष पथ की प्रेरणा है। नियति की जकड़नों और विडम्बनाओं से वही उबारती है। आशा के सहारे ही व्यक्ति पहाड़ जैसी जिंदगी काट लेता है। पेड़ वसंत की आशा में पतझड़ की मार सह लेता है। आशा के भी अलग-अलग तेवर होते हैं। अलग-अलग किस्म का जुझारूपन होता है। यही आशा हमारे जीवन की कठिनाइयों में हमारा मार्ग प्रशस्त करती है ...
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ललित निबंध
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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सोमवार, 14 मार्च 2016
कहानी - दूसरा हार
बाल कहानी - दूसरा हार... राजा की न्यायप्रियता का परिचय देती है। एक ईमानदार और न्यायप्रिय राजा ही प्रजा का सच्चा हितैषी होता है। वह निस्वार्थ भाव से न्याय करता है और अपराधी को दंड देता है। कुछ इसी तरह का संदेश देती है, यह कहानी...
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बाल कहानी
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चाँद का कुरता - रामधारी सिंह 'दिनकर'
रामधारी सिंह 'दिनकर' (२३ सितंबर १९०८- २४ अप्रैल १९७४) हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गए। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। बालमन को समझने का प्रयास भी उन्होंने बड़ी चतुराई के साथ किया है। प्रस्तुत है उसी संदर्भ में उनकी यह बाल कविता - चाँद का कुरता...
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बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कविता - डॉ. चन्द्रकुमार जैन
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे डॉ. चन्द्रकुमार जैन काव्यजगत का एक जाना-पहचाना नाम है। हिंदी गीत, कविता, ग़ज़ल के सृजनधर्मी डॉ. जैन की लेखनी में सरस, सरल एवं सटीक शब्दों का प्रयोग उन्हें एक नई पहचान देता है। प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएँ...
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ग़ज़ल - डॉ; चन्द्रकुमार जैन
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे डॉ. चन्द्रकुमार जैन काव्यजगत का एक जाना-पहचाना नाम है। हिंदी गीत, कविता, ग़ज़ल के सृजनधर्मी डॉ. जैन की लेखनी में सरस, सरल एवं सटीक शब्दों का प्रयोग उन्हें एक नई पहचान देता है। प्रस्तुत है उनकी कुछ हिंदी ग़ज़ल...
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गुरुवार, 10 मार्च 2016
आँचल माँ का - छाँव नीम की - डॉ. श्रीराम परिहार
मॉं और नीम भारतीय जीवन की अवधारणाओं को अपने संस्कारों से अटाटूट तरीके से आत्मसात किए हुए हैं। दुनिया की सारी कड़वाहट अपने में समेट कर एक निरोग जीवन सृष्टि को दान कर देते हैं। सावन में पानी की बूँदें पके जामुन की तरह टपकती है। वर्षा में निथरता हुआ नीम अपनी सघनता में गमगमा उठता है। पकी निबोली धरती के ऊपर इच्छाओं की तरह झरने लगती है। ऐसी ही स्नेह फुहारों से सुसज्जित है, डॉ. श्रीराम परिहार का यह ललित निबंध...
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ललित निबंध
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बुधवार, 9 मार्च 2016
कहानी - प्यारी राजकुमारियॉं
राजगढ़ के राजा सूर्यदेव को पु्त्र न होने का दुख था। वे इसी चिंता में रहते थे कि उनके बाद राज्य का भार कौन संभालगा ? लेकिन उनकी दोनों पुत्रियों ने उनकी इस चिंता को अपनी बुद्धिमानी और साहस से दूर कर दिया। अब वे बिलकुल चिंतामुक्त थे। सुनिए प्यारी राजकुमारियों की ये प्यारी-सी कहानी...
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बाल कहानी
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मंगलवार, 8 मार्च 2016
बच्चों पर अपेक्षाओं का बोझ न डालें
4 मार्च को हरिभूमि जबलपुर संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख
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आज का सच
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बाल कहानी - जीत गए तुम
बाल कहानियों की पिटारी में से आज लेकर आए हैं बाल पत्रिका नंदन की एक कहानी - जीत गए तुम । स्वयं की वीरता साबित करने के लिए अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग जरूरी नहीं, स्नेह जरूरी है। यह कहानी कुछ इसी तरह का संदेश देती है।
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बाल कहानी
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महिला दिवस पर विशेष कविता
एक कलाकार अपनी कला को नाम जरूर देता है। एक रचनाकार की रचना भी उसके नाम से पहचानी जाती है लेकिन भारतीय संस्कृति में एक नारी ही ऐसी रचनाकार है जो अपनी रचना को नाम नहीं दे पाती है। उसकी सृजन कृति उसकी कोख से जन्म जरूर लेती है लेकिन उसे नाम पिता का ही मिलता है। जब हम स्वयं को ये अधिकार दे देंगे कि संतान के साथ माता का नाम ही संवैधानिक रूप से जोड़ा जाए तभी वो सही अर्थों में महिला दिवस होगा।
महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है यह कविता...
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बुधवार, 2 मार्च 2016
विश्व के महान वैज्ञानिक
दिव्य दृष्टि के श्रव्य संसार में दी जा रही है, विश्व के महान वैज्ञानिकों के बारे में कुछ जानकारियॉं -
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कहानी - बुद्धिमान बंजारा
जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए स्वयं पर विश्वास होना जरूरी है। हमारा आत्मविश्वास ही हमें सफलता के मार्ग की ओर अग्रसर करता है। बुद्धिमान बंजारा एक ऐसी ही प्रेरक कहानी है।
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मंगलवार, 1 मार्च 2016
कहानी - कंजूस करोड़ीमल
सेठ करोडीमल की कंजूसी ने उन्हें इस तरह से मुसीबत में डाल दिया कि पैसे बचाने के चक्कर में उलटे पैसे खर्च करने की नौबत आ गई। इस मुसीबत से बचने का कोई उपाय न था। सुनिए एक मजेदार कहानी नन्ही पीहू की जुबानी...
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बाल कहानी
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बाल कहानी - बंदरिया
बच्चों का अपना अनोखा संसार होता है। इस संसार की अपनी कल्पनाऍं होती हैं। अपनी मस्ती और अपने रंग होते हैं। ये रंग उनमें उत्साह भरते हैं। बचपन इन्हीं इंद्रधनुषी रंगों से रंगीन होता है। बच्चों के इसी कल्पनालोक में से चुराकर हम लाए हैं एक बाल कहानी बंदरिया...
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सोमवार, 29 फ़रवरी 2016
हरिवंश राय 'बच्चन' की कविताऍं -
हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव बाबूपट्टी में एक कायस्थ परिवार मे हुआ था। इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। इनको बाल्यकाल में 'बच्चन' कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ 'बच्चा' या संतान होता है। बाद में ये इसी नाम से मशहूर हुए। इन्होंने कायस्थ पाठशाला में पहले उर्दू की शिक्षा ली जो उस समय कानून की डिग्री के लिए पहला कदम माना जाता था। उन्होने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए. और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के विख्यात कवि डब्लू बी यीट्स की कविताओं पर शोध कर पी-एच.डी. पूरी की। प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताऍं -
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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016
असम चुनाव भाजपा के लिए नहीं होंगे आसान
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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बुधवार, 24 फ़रवरी 2016
रामधारी सिंह 'दिनकर' - कृष्ण की चेतावनी
रामधारी सिंह 'दिनकर' (२३ सितंबर १९०८- २४ अप्रैल १९७४) हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गए। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। यहॉं प्रस्तुत है उनकी वीर रस से भरी हुई ओजपूर्ण कविता- कृष्ण की चेतावनी
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016
मासूम मुस्कान की मलिका - मधुबाला
मधुबाला का अभिनय, प्रतिभा, व्यक्तित्व और खूबसूरती देख कर यही कहा जाता है कि वह भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे महान अभिनेत्री है। वास्तव मे हिन्दी फ़िल्मों के समीक्षक मधुबाला के अभिनय काल को स्वर्ण युग की संज्ञा से सम्मानित करते हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम दे रहे हैं उन्हें भावनाओं की विनम्र श्रद्धांजलि।
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दिव्य दृष्टि,
लेख
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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रविवार, 21 फ़रवरी 2016
कहाँ गया छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का स्वाद?
नवभारत रायपुर के अवकाश अंक में प्रकाशित मेरा आलेख
कहाँ गया छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का स्वाद?
डॉ. महेश परिमल
पूरे 12 दिनों के छत्तीसगढ़ दौर से भोपाल लौटने पर बच्चों ने पूछा-पापा, हमारे लिए क्या लाए? मेरे नकारात्मक उत्तर से बच्चे उदास हो गए। उनका उदास होना स्वाभाविक ही था। इसके पहले जब कहीं बाहर जाना होता, तो वहां के व्यंजनों के कुछ आइटम लेते आता। पर इस बार छत्तीसगढ़ से कुछ न लाने पर यह प्रश्न कौंधने लगा कि क्या छत्तीसगढ़ के लोग किसी तरह का व्यंजन नहीं बनाते? कहां तो गुजरात का ढोकला, फाफड़ा, खाखरा पूरे देश में लोकप्रिय है, दक्षिण भारत के इडली, सांभर, डोसा उत्तपम आज पूरे भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी मिल रहे हैं। पंजाब के छोले-भटूरे और कुलचे देश के कोने-कोने में मिल रहे हैं। महाराष्ट्र की भाखर-बड़ी भी कहीं न कहीं मिल जाएगी। यही नहीं विदेशों के कई व्यंजन भी आज हमारे देश के गांव-गांव में मिल रहे हैं, तो फिर ऐसी कौन-सी बात है कि छत्तीसगढ़ के व्यंजन छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही उपलब्ध नहीं हैं।
छत्तीसगढ़ का मूल निवासी होने के कारण छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की लज्जत से पूर्णत: वाकिफ हूं। तेज गर्मी में यदि सुबह बासी मिल जाए, तो दिन भर की तरावट का अहसास होता है, इसे वे ही जानते हैं, जिन्होंने बासी का स्वाद लिया है। ये तो खैर रोजमर्रा का भोजन है। इसके अलावा त्योहारों में बनने वाले व्यंजनों की लम्बी शृंखला है, जो गाहै-बगाहे खाने को मिल जाती है। मेरा मानना है कि यदि बाहर का कोई भी व्यक्ति छत्तीसगढ़ में किसी के घर यदि दाल-भात, रोटी के साथ मुनगा-आलू और बड़ी की सब्जी खा ले, तो उस स्वाद को वह जिंदगी भर नहीं भूल सकता। शादी के दौरान बनने वाले व्यंजनों में कई ऐसे हैं, जिनका स्वाद ताउम्र बना रहता है। कड़ी लाड़ू के स्वाद का कहना ही क्या? इसके अलावा ठेठरी, खुरमी, अरसा रोटी, डूबकी कढ़ी, चीला, फरहा, चौसेला, गुलगुला,लाई-बरी, बिजौरी,तीखूर, सिंघाड़ा, करोली जैसे कई व्यंजन हैं, जिनके जायके को ग्रहण करने के लिए जीभ आज भी मचलती है। मेरा दावा है कि इन व्यंजनों के नाम पढ़ते हुए भी छत्तीसगढ़ियों के मुंह में पानी आ गया होगा।
दु:ख इस बात का है कि छत्तीसगढ़ के इन व्यंजनों का स्वाद अन्य प्रांतों के लोगों को चखाने के लिए राज्य सरकार ने ऐसा कोई उपाय नहीं किया। हां, छत्तीसगढ़ पर केंद्रित मेलों जगार आदि में इन व्यंजनों का स्वाद चखने को मिल जाता है। पर शहर में बिखरे तमाम फास्ट फूड जोन में इस तरह के आइटम देखने को नहीं मिलते। छत्तीसगढ़ की शालीन परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सरकार इतने अधिक प्रयास कर रही है, पर व्यंजनों की उपलब्धता पर आज तक कोई ठोस प्रयास किए गए हों, ऐसा नहीं लगता। ऐसा भी नहीं है कि रायपुर-बिलासपुर में छत्तीसगढ़ व्यंजनों का स्वाद चखने के लिए कोई व्यवस्था ही नहीं की गई है। पता लगाने पर रायुपर-बिलासपुर में इक्का-दुक्का दुकानों का पता चला। पर छत्तीसगढ़ में बाहर से आए लोगों के लिए यह नाकाफी है। सरकार को सोचना चाहिए कि जब यहां कोई परप्रांतीय आकर अपने साथ वहां के व्यंजनों की व्यवस्था कर लेता है, तो छत्तीसगढ़ में वहाँ के व्यंजनों की बिक्री के लिए कोई उपाय क्यों नहीं किए जा सकते?
यह सच है कि आज की पीढ़ी व्यंजनों की इस शालीन परंपराओं को सहेजकर रखना नहीं जानती। पर उन्हें इसके लिए प्रेरित तो करना ही होगा। आज वहां के कुछ मूल निवासी भी छत्तीसगढ़ी में बात करना अपनी तौहीन समझते हैं। अपनी इस भाषा का वे स्वयं ही आदर नहीं कर पा रहे हैं। वहाँ भी हिंदी मिश्रित अंग्रेजी हावी हो गई है। मीडिया भी इस परंपरा का निर्वाह कर रहा है। भाषा को सहेजने और उसे समझाने के कुछ प्रयास अखबारों में भी दिखाई देते हैं, पर व्यंजनों के संरक्षण के लिए क्या हो रहा है, यह बताने वाला कोई नहीं है। राजधानी रायपुर में रेल्वे स्टेशन से लेकर सुदूर मोतीनगर, शंकर नगर, मठपुरैना आदि स्थानों पर दिल्ली से आने वाले तमाम कथित भारतीय व्यंजनों का स्वाद चखाने वाले आइटम मिल जाएंगे, पर कहीं भी छत्तीसगढ़ी व्यंजन के दर्शन नहीं हुए। इसे आखिर क्या कहा जाए, विरासत का अंत या विरासत का पतन। आज की पीढ़ी छत्तीसगढ़ के व्यंजनों का नाम भी नहीं जानती होगी। क्योंकि इन्हें बचपन से ही इस तरह के व्यंजन मिले ही नहीं, वह भी फास्ट फूड खा-खाकर बड़ी हो रही है, तो फिर उसने यह अपेक्षा रखना बेकार है कि वह इन व्यंजनों का स्वाद सुदूर प्रांतों तक फैलाने के काम में अपना हाथ बँटाएगी।
आज सरकार छत्तीसगढ़ विकास के बारे में सोच रही है, यह अच्छी बात है। विकास हो भी रहा है। भले ही यह विकास भ्रष्टाचार के गटर से होकर आ रहा है, पर जो हो रहा है, वह दिखाई भी दे रहा है। सरकार क्या ऐसा नहीं कर सकती कि सुबह के नाश्ते में बनने वाला व्यंजन चीला-चटनी का स्वाद हर किसी को मिल सके, इसके लिए चौराहों पर इसके स्टाल लगाने के लिए वहीं के लोगों को प्रेरित करे। ठेठरी-खुरमी जैसे व्यंजन तो सूखे होते हैं, इन्हें भी रखा ही जा सकता है। इसके अलावा कई आइटम ऐसे भी हैं, जो खराब भी नहीं होते और उनका स्वाद भी बना रहता है। मेरा यह लिखने का उद्देश्य केवल इतना ही है कि बाहरी लोग भी छत्तीसगढ़ के व्यंजनों का स्वाद लें और जब अपने घर जाएं, तो यहां के आइटम ले जाएं, ताकि उनके बच्चे भी इस तरह के व्यंजनों का स्वाद ले सकें। उन्हें छत्तीसगढ़ के व्यंजनों के नाम पर बच्चों से झूठ न बोलना पड़े। इसे लघु उद्योग की तरह भी व्यवस्थित किया जा सकता है। फाइव स्टार में ऐसी चीजें मिलने से रही, इसकी शुरुआत गुमटियों से ही होगी। इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
बचपन में इन व्यंजनों का स्वाद जो लगा है, उसे आज भी नहीं भुला हूं। वहां जाकर मेरी फरमाइश ही होती है कि छत्तीसगढ़ के कुछ व्यंजनों का स्वाद एक बार फिर ग्रहण कर सकूं। वहां के स्वाद की बात ही निराली है। दोपहर में नहाने के तुरंत बाद भोजन करना एक आल्हादकारी अनुभव है। तेज भूख होने पर वहां के मसालों एवं घर की मां-बहनों द्वारा आग्रह-पूर्वक परोसा जाना और फिर उस साधारण से भोजन का स्वाद ही न भूलने वाला होता है। आज गांव में यह परंपरा जारी होगी, पर शहर की भागम-भाग में वह शालीन परंपरा लुप्तप्राय है। अब तो शादी के दौरान भी इस तरह के व्यंजन लुप्त होने लगे हैं। छत्तीसगढ़ जाकर जब इन हालात का सामना करना होता है, तो दु:ख होना स्वाभाविक है। पर क्या किया जा सकता है? मेरा आग्रह यही है कि इसकी शुरुआत छत्तीसगढ़वासियों से ही होनी चाहिए। वे इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ेंगे, तो सरकार आगे आकर दस कदम आगे खींच लेगी। आवश्यकता है केवल एक कदम बढ़ाने की…….।
डॉ. महेश परिमल
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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शनिवार, 20 फ़रवरी 2016
भाजपा के लिए चुनौती है असम
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सोमवार, 15 फ़रवरी 2016
कैसे रुकेगी शादियों में फिजूलखर्ची
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अभिमत
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रविवार, 14 फ़रवरी 2016
जेएनयू की साख पर आँच
राजनांदगांव से प्रकाशित सबेरा संकेत में मेरा आलेख
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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016
वेलेंटाइन डे पर विशेष - भारती परिमल
मोहब्बत अब 'लव' में बदल गई है। और 'लव' की लाइफ इतनी 'फास्ट' हो गई है कि इसमें जज्बातों के लिए समय ही नहीं है। मैं हैरान हूँ कि सभी प्रेमी केवल एक दिवस को ही प्रेम के लिए समर्पित करते हैं। सुबह से शुरू हुआ 'लव' शाम होते-होते खत्म हो जाता है और सुर्ख गुलाब सड़कों की शोभा बन जाते हैं। आखिर प्रेम के लिए एक दिवस ही क्यों? आइए जानते हैं, मोहब्बत खुद क्या कहती है इसके बारे में...
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दिव्य दृष्टि,
लेख
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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016
वो जी उठा, हम बचा नहीं पाए
सियाचीन की बर्फीली वादियों में पूरे 6 दिन तक 35 फीट बर्फ के नीचे दबे रहे हनुमनथप्पा ने मौत को अपने पास तक नहीं आने दिया, लेकिन बाहर निकाले जाने के बाद ये बहादुर इलाज के दौरान जिंदगी की लड़ाई हार गया। हम उसे बचाने में नाकाम रहे। 11 फरवरी 2016 को डाॅक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। कवि हरि ओम पवार ने श्रद्धांजलि स्वरूप जो कविता लिखी है, वह यहॉं प्रस्तुत है -
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016
वसंत, वसंत कहॉं हो तुम - डाॅ. महेश परिमल
अभी-अभी ठंड ने गरमी का चुंबन लिया है... समझ गया वसंत आनेवाला है। पर कहॉं है ? कहॉं खो गया है ? सीमेंट और कांक्रीट के जंगल में प्रकृति भी रंग बदलने लगी है। ऐसे में कहॉं खोजें हम अपने प्यारे वसंत को ? क्या सचमुच खो गया है या कहीं दुबक गया है हमारा वसंत ? आइए तलाशते हैं हम अपने वसंत को...
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यादों का वसंत - डॉ. महेश परिमल
यादों का वसंत पूरे उमंग और उत्साह के साथ आपके हृदय के द्वार पर आकर खड़ा है। स्वागत कीजिए इस वसंत का...ये जीवन को नई ऊर्जा देता है। यादों और कल्पनाओं में इतनी ताकत होती है कि ये पल भर के लिए हथेलियों की रेखाओं को भी बदल देती हैं। तो आइए, स्वागत करें यादों के वसंत का...
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प्रसून जोशी की कविता
भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार प्रसून जोशी का नाम हम सभी के लिए एक जाना-पहचाना नाम है। वे संवेदनशील लेखक, गीत और गज़लों के रचियताओं के रूप में अधिक जाने जाते हैं। सुपरहिट फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ के गाने ‘मां...’ के लिए उन्हें 'राष्ट्रीय पुरस्कार' भी मिल चुका है। इसके अलावा उनके दिए गए कई विज्ञापनों के शीर्षक लोगों की जबान पर है, जैसे - ‘ठण्डा मतलब कोका कोला’ एवं ‘बार्बर शॉप-ए जा बाल कटा ला’ जैसे प्रचलित विज्ञापनों के कारण उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिली। आइए, सुनते हैं उनकी एक प्रेरक कविता...
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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016
निदा फ़ाज़ली की कुछ नज्में
निदा फ़ाज़ली ने इस फ़ानी दुनिया को रूखसत कर दिया लेकिन उनकी याद हमारे दिलों में बनी रहेगी। अपनी नज्मों के साथ वे हमेशा हमारे बीच रहेंगे। निदा अगली पीढ़ी के शायर थे। उनके दिल में मीर, मीरा, तुलसी, रहीम, कबीर एक साथ धड़कते थे। उनकी लेखनी में जमीनी सोचवाले शब्द फूटते थे। शायरी ऐसी जिसे हर कोई समझ जाए। परंपरा में रहकर कलम चलाते थे। जिसमें दोहे, नज्म, ग़ज़ल सभी का समावेश है।
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बुधवार, 3 फ़रवरी 2016
नाना-अक्षय को अवार्ड क्यों नहीं?
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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016
भाभी के हाथ की रोटियाँ - के. जयराम
यह कहानी नहीं, हकीकत है। आज से करीब सौ वर्ष पहले की हकीकत। जब भाई-भाई के बीच प्रेम और समर्पण् की एक अनोखी दुनिया होती थी। संबंधों का संसार सजता था और हर संबंध अपने आप में एक अनोखी सुगंध बिखेरता था। आइए, हम चलते हैं समर्पण के इसी संसार में...
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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रविवार, 24 जनवरी 2016
अंजना बख्शी की कविताऍं
साहित्य जगत में अंजना बख्शी एक जाना-पहचाना नाम है। इनकी कविताऍं मनुष्य को भीतर तक आंदोलित करती हैं। समाज में स्त्री की सच्चाई को उजागर करती इनकी कुछ कविताओं को स्वर देते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता अनुभव हो रही है...
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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शनिवार, 23 जनवरी 2016
कविता - शिवमंगल सिंह 'सुमन'
हिन्दी साहित्य जगत में 'सुमन' जी का नाम चिर-परिचित हैा वे हिन्दी के शीर्ष कवियों में से एक हैं। उन्हें सन् 1999 में भारत सरकार ने साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया था। अपनी ओजपूर्ण काव्यधारा से उन्होंने साहित्यजगत में अमिट पहचान बनाई है। आज उनकी कविताऍं प्रस्तुत करते हुए मुझे भी गर्व अनुभव हो रहा है। तो आइए, सुनते हैं उनकी कुछ ओजपूर्ण कविताऍं...
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कहानी - कॉम्पलीकेशन
कभी-कभी जिंदगी में कुछ एेसे कॉम्पलीकेशन्स आ जाते हैं कि लाख प्रयत्न करने के बाद भी हम उसे ठीक करने में असमर्थ होते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ डॉ. मयंक की जिंदगी में। कब, क्यों और कैसे? इन्हीं सवालों के जवाब जानिए इस कहानी में...
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गुरुवार, 21 जनवरी 2016
कहानी - वेदना से संवेदना तक
संवेदना का संबंध मात्र मनुष्य से ही नहीं होता, प्रकृति के सानिध्य में रहते पेड़-पौधे भी वेदना-संवेदना से जुड़े होते हैं। वे भी अपनी खुशी में खुश होते हैं अौर दुख में दुखी होते हैं। जब वे दुखी होते हैं, तो मुरझाने लगते हैं और खुश होने पर झूमने लगते हैं। इसी बात को प्रस्तुत करती है ये संवेदनशील कहानी ...
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मंगलवार, 19 जनवरी 2016
करवा का व्रत - यशपाल
पद्म भूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित यशपाल हिंदी के चुनिंदा प्रतिभाशाली लेखकों में गिने जाते हैं. उन्होंने निबंध, उपन्यास, छोटी कहानियां, नाटक और अपनी आत्मकथा लिखी है. 1976 में उपन्यास 'मेरी तेरी उसकी बात' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया.सुनिए, उनकी कहानी 'करवा का व्रत'...
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फैसला - भीष्म साहनी
रावलपिंडी पाकिस्तान में जन्मे भीष्म साहनी आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्हें हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है। हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई होने का गौरव प्राप्त भीष्म साहनी को विशेषत रुप से उनके उपन्यास तमस से जाना जाता है। उन्हें १९७५ में तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, १९७५ में शिरोमणि लेखक अवार्ड (पंजाब सरकार), १९८० में एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड, १९८३ में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड तथा १९९८ में भारत सरकार के पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया गया। उनके उपन्यास तमस पर १९८६ में एक फिल्म का निर्माण भी किया गया था। प्रस्तुत है, उनकी एक कहानी फैसला...
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रविवार, 17 जनवरी 2016
बूढ़ी काकी - मुंशी प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद की कहानियॉं आम जीवन से जुड़ी हुई होती हैं। बूढ़ी काकी कहानी भी उन्हीं में से एक हैं। बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। इसी उक्ति को इस कहानी के माध्यम से दर्शाया गया है। तो आइए, आनंद लीजिए इस कहानी का...
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शुक्रवार, 15 जनवरी 2016
बाल कविताऍं - रमेश तैलंग
बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया होती है। इस दुनिया में सजीव और निर्जीव का भेद मिट जाता है। निर्जीव वस्तुऍं भी बातें करती हैं। अपनेपन और मासूमियत से भरी हुई प्यारी-प्यारी बातें... आइए सुनते हैं, उनकी कुछ प्यार भरी मीठी-मीठी बातें कवि रमेश तैलंग की कलम से...
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बाल कविता
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अनुशासन सिखाती पतंग
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सोमवार, 11 जनवरी 2016
अटल बिहारी वाजपेयी की कुछ कविताऍं -
देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने आेजस्वी भाषण के लिए पहचाने जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में भाषण की शुरुआत करनेवाले वे पहले व्यक्ति हैं। कविहृदय वाजपेयी के वक्तृत्व कला की सराहना पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भी की थी। अपनी संवेदनशील कविताओं के माध्यम से उन्होंने जो विचार व्यक्त किए हैं, उसे कोई सहृदय व्यक्ति ही समझ सकता है। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताऍं -
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बाल कहानी - आरुणि की गुरुभक्ति
एकलव्य, उपमन्यु, आरुणि ये सभी ऐसे शिष्य हैं, जिन्होंने अपनी गुरुभक्ति का संसार में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। गुरु-शिष्य परम्परा की चर्चा करते हुए इनका नाम सदैव आदर एवं गर्व से लिया जाता रहा है। इन्होंने त्याग, तपस्या और भक्ति का ऐसा पावन स्रोत बहाया है कि संपूर्ण भारतवर्ष इनका सदैव ऋणी रहेगा। आइए जानते हैं, आरुणि की गुरुभक्ति के बारे में -
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रविवार, 10 जनवरी 2016
कविता - चूहा और बिल्ली, कवि - एस.के.पाण्डेय
कवि श्री एस.के.पाण्डेय की बाल कविता का मजा लीजिए -
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बाल कविताऍं - सफदर हाशमी
साहित्य की दुनिया में सफदर हाशमी एक जाना-पहचाना नाम है। आइए सुनते हैं उनकी कुछ बाल कविताऍं -
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गुरुवार, 7 जनवरी 2016
लवशाला - डॉ. रमेश चंद्र महरोत्रा
डॉ. रमेश चंद्र महरोत्रा देश के ख्याति प्राप्त भाषाविद रह चुके हैं। उनके निर्देशन में पॉंच डी.लिट एवं करीब साठ पी-एच.डी हो चुकी हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास के लिए उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया। उनका मानना है कि 'लवशाला' को आप प्रतिदिन 'हनुमान चालिसा'की तरह सुनें, जिससे पति-पत्नी के बीच सामंजस्य बना रहे।
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बुधवार, 6 जनवरी 2016
कहानी कादर मियां - लेखक के. जयराम
लेखक के. जयराम यानी केशवजी जयराम राठोड़। इनके अनुभवों से जुड़ी गुजराती कहानियों का संग्रह स्मृति बिंदु किताब के रूप में है। इन्हीं कहानियों में से एक कहानी कादर मियां का हिंदी अनुवाद कर आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है। इस विश्वास के साथ कि यह कहानी आपको जरूर पसंद आएगी, तो सुनिए एक मर्मस्पर्शी अनुभव -
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मंगलवार, 5 जनवरी 2016
हारे नहीं है हम अभी - 1
जिसने कभी रोशनी से साक्षात्कार नहीं किया, वह एक प्राध्यापक भी हो सकता है। इसके अलावा वो पी.एच-डी. भी कर सकता है और वह भी गिरीश कर्नाड के नाटकों पर। ऐसे शख्स को भला आप क्या कहेंगे? डॉ. रोहित त्रिवेदी ही वह शख्स हैं, जिन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है जो सक्षम लोग भी मुश्ि कल से कर पाते हैं। वे आज के युवाओं की प्रेरणा हैं। जानिए उन्हीं के बारे में...
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सोमवार, 4 जनवरी 2016
कम नहीं होंगी चुनौतियाँ
दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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आज का सच
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शनिवार, 2 जनवरी 2016
डॉ. महेश परिमल - आओ समय को बोना सीखें...
छत्तीसगढ़ की माटी में जन्मे महेश परिमल का यह मानना है कि समय को काटना तभी संभव है, जब उसे बोया जाए। समय बोने की यह प्रक्रिया किस तरह की जा सकती है, ये इस लेख में आप स्वयं ही सुन लीजिए -
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परीक्षा बच्चों की, कसौटी पालकों की - डाॅ. महेश परिमल
छत्तीसगढ़ की माटी में जन्मे डॉ. महेश परिमल मूल रूप से एक लेखक हैं। आजीविका के रूप में पत्रकारिता को अपनाने के बाद उनका लेखनकार्य जीवंत हो उठा। यहाँ उन्हीं का एक आलेख प्रस्तुत है -
लेबल:
दिव्य दृष्टि,
लेख
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
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