गुरुवार, 10 मार्च 2016

आँचल माँ का - छाँव नीम की - डॉ. श्रीराम परिहार

मॉं और नीम भारतीय जीवन की अवधारणाओं को अपने संस्कारों से अटाटूट तरीके से आत्मसात किए हुए हैं। दुनिया की सारी कड़वाहट अपने में समेट कर एक निरोग जीवन सृष्टि को दान कर देते हैं। सावन में पानी की बूँदें पके जामुन की तरह टपकती है। वर्षा में निथरता हुआ नीम अपनी सघनता में गमगमा उठता है। पकी निबोली धरती के ऊपर इच्छाओं की तरह झरने लगती है। ऐसी ही स्नेह फुहारों से सुसज्जित है, डॉ. श्रीराम परिहार का यह ललित निबंध...

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Labels