मंगलवार, 29 मार्च 2016

बाल कहानी - तेनालीराम

तेनालीराम राज्य के कार्य में इतना व्यस्त रहता था कि वह अपने पिता के साथ अधिक समय ही नहीं बिता पाता था। इससे नाराज होकर पिता गांव चले जाने का निर्णय लेते हैं। वे अपने पुत्र का चेहरा तक नहीं देखना चाहते हैं। पिता को रोकने का साहस तेनालीराम में न था। वह अपनी परेशानी राजा को भी नहीं बताता किंतु राजा को चाटुकारों से इस बात को पता चल जाता है और वह उनके कान भरते हैं कि तेनालीराम के पिता का सम्मान करने के लिए उन्हे राजमहल बुलाया जाए। राजा उनकी बात मान लेते हैं। महल लौटने पर पिता को अपने पुत्र की तारीफ सुनकर अपने लिए निर्णय पर पछतावा होता है, लेकिन कुछ समय बाद ही उनका पछतावा खुशी में बदल जाता है। वो किस तरह? यह जानने के लिए सुनिए कहानी पिता और पुत्र की अर्थात तेनालीराम की...

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