शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
कविता - कालिदास! सच-सच बतलाना ! - नागार्जुन
कविता का अंश...
कालिदास! सच-सच बतलाना !
इंदुमती के मृत्यु शोक से,
अज रोया या तुम रोये थे ?
कालिदास! सच-सच बतलाना ?
शिवजी की तीसरी आँख से,
निकली हुई महाज्वाला से,
घृतमिश्रित सूखी समिधा सम,
कामदेव जब भस्म हो गया,
रति का क्रंदन सुन आँसू से,
तुमने ही तो दृग धोये थे ?
कालिदास! सच-सच बतलाना,
रति रोयी या तुम रोये थे ?
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका,
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का,
देख गगन में श्याम घन-घटा,
विधुर यक्ष का मन जब उचटा,
खड़े-खड़े जब हाथ जोड़कर,
चित्रकूट के सुभग शिखर पर,
उस बेचारे ने भेजा था,
जिनके द्वारा ही संदेशा,
उन पुष्करावर्त मेघों का,
साथी बनकर उड़ने वाले,
कालिदास! सच-सच बतलाना,
पर पीड़ा से पूर-पूर हो,
थक-थक कर और चूर-चूर हो,
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर,
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना !
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
कविता - तीनों बंदर बापू के - नागार्जुन
कविता का अंश....
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के,
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के,
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के,
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के,
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के,
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के!
सर्वोदय के नटवर लाल,
फैला दुनिया भर में जाल,
अभी जिएंगे ये सौ साल,
ढाई घर घोड़े की चाल,
मत पूछो तुम इनका हाल,
सर्वोदय के नटवर लाल!
लंबी उमर मिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के,
दिल की कली खिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के,
बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के,
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के,
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के!
खूब होंगे मालामाल,
खूब गलेगी उनकी दाल,
औरों की टपकेगी राल,
इनकी मगर तनेगी पाल,
मत पूछो तुम इनका हाल,
सर्वोदय के नटवर लाल!
सेठों क हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
सत्य-अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के,
मुस्काते हैं आंखें मीचे तीनों बंदर बापू के!
छील रहे गीता की खाल,
उपनिषदें हैं इनकी ढाल,
उधर सजे मोती के थाल,
इधर जमे सतजुगी दलाल,
मत पूछो तुम इनका हाल,
सर्वोदय के नटवर लाल!
मड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के,
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के,
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के,
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के,
गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के,
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के!
दिल चटकीला, उजले बाल,
नाप चुके हैं गगन विशाल,
फूल गए हैं कैसे गाल,
मत पूछो तुम इनका हाल,
सर्वोदय के नटवर लाल!
हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के,
गुरुओं के भी गुरू बने हैं तीनों बंदर बापू के,
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के,
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के।
साभार- नागार्जुन रचनावली
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कविता - एकला चालो रे... - रवीन्द्रनाथ टैगोर
कविवर रवीन्द्रनाथ टैगारे की बाँगला कविता ‘एकला चालो रे...’ का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
कविता का अंश...
अनसुनी करके तेरी बात,
न दे जो कोई तेरा साथ,
तो तुही कसकर अपनी कमर,
अकेला बढ़ चल आगे रे--
अरे ओ पथिक अभागे रे ।
देखकर तुझे मिलन की बेर
सभी जो लें अपने मुख फेर,
न दो बातें भी कोई क रे,
सभय हो तेरे आगे रे--
अरे ओ पथिक अभागे रे ।
तो अकेला ही तू जी खोल,
सुरीले मन मुरली के बोल,
अकेला गा, अकेला सुन ।
अरे ओ पथिक अभागे रे,
अकेला ही चल आगे रे ।
जायँ जो तुझे अकेला छोड़,
न देखें मुड़कर तेरी ओर,
बोझ ले अपना जब बढ़ चले,
गहन पथ में तू आगे रे--
अरे ओ पथिक अभागे रे ।
तो तुही पथ के कण्टक क्रूर,
अकेला कर भय-संशय दूर,
पैर के छालों से कर चूर ।
अरे ओ पथिक अभागे रे,
अकेला ही चल आगे रे ।
और सुन तेरी करुण पुकार,
अंधेरी पावस-निशि में द्वार,
न खोलें ही न दिखावें दीप,
न कोई भी जो जागे रे-
अरे ओ पथिक अभागे रे ।
तो तुही वज्रानल में हाल,
जलाकर अपना उर-कंकाल,
अकेला जलता रह चिर काल,।
अरे ओ पथिक अभागे रे,
अकेला बढ़ चल आगे रे ।
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती - सोहनलाल द्विवेदी
यह कविता इस विवाद में रही है कि इसके रचयिता 'बच्चन' हैं या 'निराला' लेकिन इसके वास्तविक रचनाकार हैं सोहनलाल द्विवेदी। स्वयं अमिताभ बच्चन ने ट्विटर व फेसबुक के माध्यम से इस बात की पुष्टि की कि यह रचना उनके 'बाबूजी' की न होकर 'सोहनलाल द्विवेदी की ही है।' हमें यह कविता आप तक पहुँचाते हुए अत्यंत हर्ष अनुभव हो रहा है।
कविता का अंश...
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्ही चींटीं जब दाना ले कर चढ़ती है,
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगॊं मे साहस भरता है,
चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है,
मेहनत उसकी बेकार नहीं हर बार होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा-जा कर खाली हाथ लौट कर आता है,
मिलते न सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दूना विश्वास इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो नींद-चैन को त्यागो तुम,
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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गुरुवार, 10 नवंबर 2016
कविता - अमृता प्रीतम
शरद कोकास की कविता, वास्तव में यह कविता मेरे मित्र शरद कोकास की है, जो सोशल मीडिया में न जाने किस तरह से अमृता प्रीतम के नाम से प्रकाशित की गई है। बहरहाल इसे आडियो में नहीं बदल पाया हूं, पर यह साफ कर दूँ कि गलती से यह कविता मेरे ब्लॉग पर अमृता प्रीतम के नाम से प्रसारित हो गई। इसके लिए क्षमा चाहता हूं।
कविता का अंश... वह कहता था, वह सुनती थी। जारी था एक खेल, कहने-सुनने का। खेल में थी दो पर्चियाँ, एक में लिखा था - कहाे, एक में लिखा था - सुनो। अब यह नियति थी, या महज संयाेग? उसके हाथ लगती रही वही पर्ची, जिस पर लिखा था - सुनो। वह सुनती रही, उसने सुने आदेश, उसने सुने उपदेश। बंदिशें उसके लिए थी। उसके लिए थी, वर्जनाएँ । वह जानती थी, कहना-सुनना नहीं है केवल क्रियाएँ। राजा ने कहा - पत्थर बनो। वह अहिल्या हो गई। प्रभु ने कहा - निकल जाओ। वह सीता हो गई। चिता से निकली चीख, किसी कानों ने नहीं सुनी, वह सती हो गई। घुटती रही उसकी फरियाद, अटके रहे शब्द। सिले रहे होंठ, रूँधा रहा गला। उसके हाथ कभी नहीं लगी वह पर्ची, जिस पर लिखा था - कहो। नारी हृदय की यह करूण भावनाएँ ऑडियो की मदद से सुनिए...
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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कविताएँ - आशुतोष दुबे
कविता का अंश...
दो दिनों के बीच है,
एक थरथराता पुल,
रात का।
दो रातो के दरमियाँ है,
एक धड़धड़ाता पुल,
दिन का।
हम बहते हैं रात भर,
और तब कहीं आ लगते हैं,
दिन के पुल पर।
चलते रहते हैं दिन भर,
और तब कहीं सुस्ताते हैं,
रात के पुल पर।
वैसे देखें तो,
हम भी एक झूलता हुआ पुल ही हैं।
दिन और रात जिस पर,
दबे पाँव चलते हैं।
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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बुधवार, 9 नवंबर 2016
कविताएँ - उत्पल बैनर्जी
कविता का अंश...
मैं भेजूंगा उसकी ओर,
प्रार्थना की तरह शुभेच्छाएँ,
किसी प्राचीन स्मृति की प्राचीर से,
पुकारूंगा उसे।
जिसकी हमें अब कोई ख़बर नहीं,
अपनी अखण्ड पीड़ा से चुनकर,
कुछ शब्द और कविताएँ,
बहा दूंगा,
वर्षा की भीगती हवाओं में।
जिसे अजाने देश की किसी अलक्ष्य खिड़की पर बैठा,
कोई प्रेमी पक्षी गाएगा,
मैं सहेज कर रखूंगा उन क्षणों को,
जब आखि़री बार,
अपनी समूची अस्ति से उसने छुआ था मुझे।
और धूप के सरोद पर गुनगुना उठा था,
हमारा प्रेम।
बार-बार भूलने की कोशिश में,
कुछ और अधिक याद करूंगा उसे।
छुपाते-छुपाते छलक ही आएंगे आँसू,
हर बार दूर जाते-जाते लौट आऊंगा वहीं,
जहाँ उसके होने का अहसास,
अकस्मात विलीन हो गया था,
किसी अधूरे सपने की तरह।
मैं हमेशा की तरह,
उसके लिए लेकर आऊंगा,
एक कप चाय और थोड़े-से बिस्कुट।
और प्रतीक्षा करूंगा उन चिट्ठियों की,
जो नहीं आएंगी कभी!!
ऐसी ही कुछ कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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कुछ कविताएँ - अजय पाठक
कविता का अंश....
संयम के टूटेंगे फिर से अनुबंध,
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
मधुबन की बस्ती में,
सरसिज का डेरा है।
सुमनों के अधरों तक,
भँवरों का फेरा है।
फुनगी पर गुंजित है, नेहों के छंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
किसलय के अंतर में,
तरुणाई सजती है।
कलियों के तनमन में,
शहनाई बजती है।
बहती, दिशाओं में जीवन की गंध।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
बौरों की मादकता,
बिखरी अमरैया में,
कुहु की लय छेड़ी,
उन्मत कोयलिया ने।
अभिसारी गीतों से, गुंजित दिगंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
सरसों के माथे पर,
पीली चुनरिया है।
झूमे है रह रहकर,
बाली उमरिया है।
केसरिया रंगों के, झरते मकरंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
बूढ़े से बरगद पर,
यौवन चढ़ आया है।
मन है बासंती पर,
जर्जर-सी काया है।
मधुरस है थोड़ा, पर तृष्णा अनंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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लघुकथा - रौशनी - आशीष त्रिवेदी
कहानी का अंश...
अपनी बालकनी से मिसेज मेहता ने देखा आसपास की सभी इमारतें रंगबिरंगी रौशनी से जगमगा रही थीं. कुछ देर उन्हें देखनेे के बाद वह भीतर आ गईं. सोफे पर वह आंख मूंद कर बैठ गईं. बगल वाले फ्लैट में आज कुछ अधिक ही हलचल थी. पहले इस फ्लैट में बूढ़े दंपति रहते थे. तब कहीं कोई आहट नही सुनाई पड़ती थी. लेकिन इस नए परिवार में बच्चे हैं. इसलिए अक्सर धमाचौकड़ी का शोर सुनाई पड़ता रहता है.
पहले त्यौहारों के समय उनका घर भी भरा रहता था. उन्हें क्षण भर की भी फ़ुर्सत नही रहती थी. लेकिन जब से उनका इकलौता बेटा विदेश में बस गया वह और उनके पति ही अकेले रह गए. त्यौहारों की व्यस्तता कम हो गई. फिर वह दोनों मिलकर ही त्यौहार मनाते थे. आपस में एक दूसरे का सुख दुख बांट लेते थे.
पांच वर्ष पूर्व जब उनके पति की मृत्यु हो गई तब वह बिल्कुल अकेली रह गईं. तब से सारे तीज त्यौहार भी छूट गए. अब जब वह आसपास लोगों को त्यौहारों की खुशियां मनाते देखती हैं तो अपना अकेलापन उन्हें और सताने लगता है. अतः अधिकतर वह अपने घर पर ही रहती हैं.
ऐसा लगा जैसे बगल वाले फ्लैट के बाहर गतिविधियां कुछ बढ़ गई हैं. वह उठीं और उन्होंने फ्लैट का दरवाज़ा थोड़ा सा खोल कर बाहर झांका. सात आठ साल की एक लड़की रंगोली पर दिए सजा रही थी. उसके साथ आठ नौ साल का एक लड़का उसकी मदद कर रहा था. तभी लड़की की निगाह मिसेज मेहता पर पड़ी. उन्हें देख कर वह हल्के से मुस्कुराई और बोली 'हैप्पी दीवाली'. मिसेज मेहता ने दरवाज़ा बंद कर दिया.
वापस जाकर वह सोफे पर बैठ गईं. इतने वर्षों के बाद किसी की आत्मीयता ने उनके भीतर जमा कुछ पिघला दिया. वह उठीं और कुछ सोंचते हुए रसोई की तरफ बढ़ीं. ऊपर का कबर्ड खोला. उसमें दफ्ती का एक डब्बा था. उसे उतार कर खोला. उसमें मिट्टी के कुछ दिए रखे थे. यह उस आखिरी दीवाली के दिए थे जो उन्होंने अपने पति के साथ मनाई थी. दिओं को निकाल कर उन्होंने धोया. फिर उनमें तेल डाल कर जलाया और कमरे में चारों तरफ सजा दिया. एक निगाह उन्होंने पूरे कमरे पर डाली. कमरे में एक अलग ही रौनक थी. फ्रिज खोल कर उसमें से चॉकलेट का एक टुकड़ा निकाल कर खाया. उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई. वह स्वयं से बोलीं 'हैप्पी दीवाली'. इस कहानी का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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लघुकथा
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मंगलवार, 8 नवंबर 2016
कुछ कविताएँ .... - भारती परिमल
कविता का अंश...
रात को,
ख्वाबों की पोटली,
सिरहाने रखकर सोई थी।
सुबह आँख खुली
तो देखा,
पोटली खुली थी
और ख्वाब गायब थे।
कहाँ गए ?
कौन ले गया ?
आसमान, तारे, हवाएँ
पर्वत, नदियाँ, परिंदे ?
शक हुआ कि कहीं
वक्त की साजिश तो नही?
दिन भर वक्त नहीं मिला
कि वक्त को तलाशती फिरूँ।
गहरे अंधकार में,
पलकें रिश्ता
जोड़ ही रही थी,
कि देखा
रात की मुंडेर पर बैठी,
नींद के आगोश में
ख्वाब अँगडाइयाँ ले रहे हैं।
ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए....
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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शनिवार, 5 नवंबर 2016
लघुकथा – खोल – रमेश आचार्य
कहानी का अंश...
मेरा रोज उसी रूट से आना-जाना होता था। उस रास्ते में दो बड़े अस्पताल आते थे। मुझे ऑफिस जाने के लिए दो बसे पकड़नी होती थी। दूसरी बस मैं अस्पताल के स्टेन्ड से लेता था। उस दिन भी मैं ऑफिस के लिए बस से जा रहा था। समय काटने के लिए मैं पत्रिका के पन्ने पलटने लगा। तभी तीसेक साल का एक युवक ने अपनी कारुणिक आवाज में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था, बाबूजी मुझ गरीब पर दया करो। ईश्वर आपका भला करेगा। मेरी औरत महीने भर से बीमार थी। उसे इलाज के लिए दिल्ली लाया था। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। कल रात उस बेचारी ने दम तोड़ दिया। उसकी लाश अस्पताल के बाहर पड़ी है। मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। गाँव जाना तो दूर, मेरे पास उसके कफन तक के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं हैं। अब तो आप लोग ही मेरा सहारा हो। मुझ पर रहम करो, रहम करो। ऐसा कहते हुए वह जोर-जोर से रोने लगा। आगे क्या हुआ, जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....
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दिव्य दृष्टि,
लघुकथा
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
कहानी सरहद की... - भूपेन्द्र कुमार दवे
कहानी का अंश...
‘सरहद पर तैनात जवानों के सामने प्रकृति की खुली किताब होती है जिस पर ईश्वर की
इबारत शायद विश्व के सभी ग्रंथों से ज्यादा जीवन को पवित्रता संपन्न कराने की क्षमता रखती है।
मेरे साथी ने उत्तर-पश्चिम सरहदों का नजारा देखकर यह कहा था। उसने प्रश्न किया था, ‘यह
सरहद यहाँ आकर रुक क्यों जाती है? सारे विश्व को यदि यह अपने आगोश में ले ले तो मनुष्य की
पहुँच ईश्वर तक आसान हो जाएगी।’
तभी प्रकृति की आड़ में छिपकर किलबिलाते आतंकियों को देख वह सहम गया। मैंने उसे
सतर्क होने कहा और हम दुबककर उनकी गतिविधियों को देखने लगे। प्रकृति के आँचल को
लहराते हवा के झोंके ने हमारी अंतरात्मा को सुकून देना जारी रखा ताकि हम शान्त चित्त से विश्व
के अमनचैन की विचार-लहरियों में खोये रहें। हम अपने हृदय में कितने ही पुण्य-विचारों को सहेज
कर रखें, पर दुर्विचार के घरोंदों में पले खूँखार कर्मों से विकृत हुए लोग मानते कहाँ हैं? वे तो कीड़ों
की तरह अमन-चैन के रेशमी कपड़ों को तार-तार करने की उधेड़बुन में लगे रहते हैं।
लुक-छिपकर आक्रमण की लालसा लिया वह आतंकी जत्था अचानक गोलियाँ बरसाने
लगा। हमारी आँखों के सामने सरहद की चमचमाती रेखा को धुँआ की परत से ढँकने का असफल
प्रयास करनेवालों को देख मेरे साथी ने ऊँची चट्टान पर चढ़कर उन्हें ललकारा। उसकी आवाज
चहुँओर प्रतिध्वनित हो गूँज उठी -- हृदय में प्रेरणा की अलख जगाने -- मस्तिष्क में कर्तव्यबोध
की रश्मियाँ कोंधाने -- रक्तवाहिनियों में उमंग का संचार करने -- समस्त ज्ञानेन्द्रियों में नवस्फूर्ति
उत्तेजित करने।
एक जत्था धराशाही हुआ। फिर एक और को हमने नस्तेनाबूत कर दिया। गाजर घाँस की
तरह उनकी नई ऊग देख हम लगातार प्रहार करते रहे। समय हमारी सफलता की इबारत लिखता
रहा। पर सूर्यदेवता अस्ताचल की ओर बढ़े जा रहे थे। दरख्तों के लंबे साये धीरे धीरे अंधकार में
परिणित होते जा रहे थे। मैंने अपने साथी को नीचे उतर आने कहा, ‘संजय, अब नीचे उतर आवो।’‘बस एक और बचा है,’ उसने कहा।
तभी एक साथ दो गोलियों की आवाज आई।
और जैसे ही सन्नाटा फैला तो मुझे सरसराहट सुनाई दी जैसे कुछ लुढ़कता मेरे करीब आ गिरा हो।
‘मैंने सब को मार गिराया,’ मेरे मित्र की वह आवाज थी। मैंने नीचे देखा। संजय का खून से लथपथ
शरीर पड़ा था। ‘ओफ्’, एक चीख-सी निकल पड़ी।
‘ये क्या हुआ?’ मैंने प्रश्न किया।
‘कुछ नहीं, बस सबका सफाया हो गया,’ यह कह वह मुस्कराया।
‘तुम्हें क्या हुआ?’ मैंने प्रश्न दोहराया।
‘मुझे कुछ नहीं हुआ। तुम मेरी फिक्र मत करो। बस एक बात ध्यान से सुन लो, मेरे भाई।’
मेरे लिये ‘भाई’ संबोधन का प्रयोग संजय ने पहली बार किया था। अतः मेरे मुख से भी निकल
पड़ा, ‘भाई, बोलो, तुम ठीक तो हो?’
‘आतंकी जीवन से छुटकारा पाने की खुशी में उस अंतिम आतंकी ने भी गोली चलाई और
वह गोली दौड़कर मुझे धन्यवाद देती मेरे सीने को चूम गई। खैर, इसकी चिंता मत करो। मेरी बात
सुनो। रक्षाबंधन का त्यौहार आने ही वाला है। मेरी छोटी बहन उसकी तैयारी में लगी होगी। मेरी
जगह तुम्हें जाकर राखी बँधवानी होगी। बोलो, तुम ऐसा कर पावोगे?’
मेरी निरुत्तर अवस्था को भाँपकर संजय ने आगे कहा, ‘लेकिन रक्षाबंधन के दिन तक उसे
मेरे बारे में कुछ नहीं बताना। और सुनो ....’
जलप्रपात में होड़ लगाती पानी की धाराओं की तरह संजय के मुख से अक्षर शब्द बन
धड़धड़ाकर नीचे गिर रहे थे। वह अपनी बहन के बारे में सबकुछ एक साथ बताने को आतुर था। वह
कहने लगा, ‘राखी बँधवाते समय अपनी कलाई को एक बार झटका देकर देखना, मेरी बहन का
गुस्सा। उसे शान्त करने तुम्हें ही पहल करनी पड़गी। अपनी बाहों में भरकर उस गुड़िया के दाँयें
और फिर बाँयें गाल को चूमना होगा। तब कहीं वह प्यार से राखी बाँधेगी।’ उसने यह भी कहा कि
इस सुखद अनुभव को पाने मुझे संजय के न होने की खबर को छुपाये रखना होगा। संजय की
आवाज शैनः-शैनः क्षीण होने लगी और मैं देखता रहा खून से भरे तालाब में पड़े प्राण को तैरते --
वेदना की भारी भरकम चट्टान के तले प्राण को मचलते। मैं देखता रहा वेग से चलती हुई साँसों का
सामने गहरी खाई देख अचानक रुक जाना -- हमेशा के लिये।
‘संजय’ मेरी चीख चारों ओर फैली पर्वत श्रृंखला से प्रतिध्वनित हो अश्रूपूर्ण बादलों की तरह
टकराकर बरसने को आतुर हो उठी थी -- जिसे ‘बादलों का फटना’ कहते हैं। संजय कहा करता था
कि प्रकृति को निहारो -- जीवन इसी तरह पनपता है और मृत्यु का आलिंगन करवाता है।
रक्षाबंधन के दिन मैंने वर्दी पहनी और कैप भी धारण कर ली ताकि कम से कम दूर से यह
न मालूम हो कि आनेवाला संजय नहीं और कोई है। मंच पर नाटक खेलना सहज हो सकता है, पर
जीवन में किसी अन्य का ‘रोल’ करना माथे पर पसीना ला देता है। हर कदम पर हृदय चार-पाँच
बार धड़क उठता था, जिसमें से दो-तीन धड़कनों का अंदाज साँसें ले भी न पाती थी।
संजय का घर अब करीब से नजर आने लगा था। घर के मुख्य द्वार पर कढ़ी सतरंगी
रंगोली, आम्रपत्तियों के तोरण और रंग-बिरंगी झालर देख त्यौहार के उमंग की झलक मुझे मिलने
लगी थी। बाहर बरामदे में कुर्सी पर संजय की माँ इंतजार कर रही थी और बहन कुर्सी के पीछे
अनंत में एकटक देखती अपने भैया के आने की बाट जोह रही थी।
मैं आगे बढ़ने के लिये उतावला हो बड़े-बड़े कदम रखने लगा। सोचा कि बहन को आवाज दे
अपने आने की सूचना दूँ, पर इस उतावलेपन ने मुझे उसका नाम ही विस्मृत करा दिया। शुक्र
समझो कि माँ ही बोल उठी, ‘देख राधा बेटी, तेरे भैया चले आ रहे हैं।’ हाँ, याद आया कि संजय ने
यही नाम बताया था। पर तब तक वह ग्यारह बरस की बच्ची उछलकर घर के अंदर चली गई थी --
राखी की थाली सजाने। मैंने आगे बढ़कर माँ के पैर छुए, पर वह किं-कर्तव्य-विमूढ़ सी बैठी रही।
उन्होंने अपनी मुठ्ठी में एक चिठ्ठी पकड़ रखी थी। उसे मेरी ओर आगे बढ़ाते हुए कहने लगी,
‘बेटा, तू जानता है कि माँ के लिये यह कितना कठिन काम था। पर तुझे आते देख, सच कहूँ कि
मुझे लगा जैसे मेरा संजू ही चला आ रहा है। आ बेटा, अंदर चल। राधा बिटिया राखी की थाली
तैयार कर तुम्हारा ही इंतजार कर रही है’ और वह मुझे सीधे पूजाघर में ले आयी।
देखा फर्श पर पीढ़ा बिछा था। सामने आरती की थाल सजी रखी थी, जिसमें राखी,
नारियल, मिठाई सभी कुछ सजाकर रखा हुआ था। वर्ष भर के इंतजार के बाद आये पर्व पर अपने
प्यारे भैया की कलाई पर पवित्र प्रेम के बंधन की पूरी तैयारी कर रखी थी राधा ने। मुझे देख वह
चहक उठी और लपक कर मेरे गले लग गई। हाथ पकड़कर मुझे आसन पर बिठाया और एक चित्त
से रस्म पूरी करने में जुट गई। मेरी कोई बहन न होने के कारण यह अनुभव अद्भुत सौन्दर्य भरा
लग रहा था। बहन कितनी प्यारी होती है! कितनी भोली होती है! भाई के हृदय के कितने करीब।
दीपक की रोशनी में लिप्त खुद बाती और घी बनी भाई के जिगर में उजाला बनाये रखने
लालायित।
जैसे ही वह राखी बाँधने लगी तो मुझे संजय की याद आयी और उसके बताये अनुसार मैंने
अपनी कलाई हिला दी। बस क्या था -- राधा चिल्ला पड़ी, ‘माँ, देखो, भैया क्या कर रहे हैं?’ इतना
कह वह माँ की तरफ दौड़ पड़ी और कहने लगी, ‘माँ, भैया हाथ हिला देते हैं ताकि मैं राखी न बाँध
सकूँ। मैं अंधी हूँ इसलिये मेरा मजाक उड़ा रहे हैं।’ और वह रोने लगी।
‘अंधी’ यह शब्द तीर की तरह वेग से आता मुझे लुहलुहान कर उठा। मैं स्तब्ध रह गया।
हाय! अपनी कलाई हिलाकर मैं यह क्या कर बैठा? ‘राधा अंधी है,’ यह संजय ने नहीं बताया था।
मेरी परेशानी माँ समझ गई और दाँये-बाँये गाल पर चुम्मी लेने का इशारा करने लगी। मैंने आगे
बढ़कर सिसकती राधा के गीले गालों को चूम लिया। सुबह की पहली किरण को देखते ही नन्हीं
चिड़िया की तरह राधा चहक उठी। वह खुश हो उमंग से भरी राखी बाँधती रही और मेरे आँसू
लगातार बहते रहे। माँ ने इशारा किया ताकि मैं अपने आँसू पर काबू पा सकूँ और राधा को कतई
अहसास न होने दूँ कि उसका भाई अब इस संसार में नहीं है। मैं राधा के लिये उपहार स्वरूप दो
चीजें लाया था -- राजस्थानी लहंगा-चुनरी और पढ़ने के लिये किताब। शुक्र था कि दोनों की पेकिंग
अलग-अलग थी। मैंने किताब अपने पीछे छिपा ली। मैं अब उसे किताब क्या देता!
जाते समय माँ मुझे छोड़ने बाहर तक आयी। ‘माँ, जब तक जिन्दा हूँ, इस दिन आता
रहूँगा,’ मैं जैसे-तैसे रुँध गले से कह पाया। तभी अचानक माँ की आँखों से टपकते आँसुओं ने मुझे
विस्मित कर दिया। ‘माँ, ये आँसू क्यों?’ मेरा मन मुझसे पूछने लगा।
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कहानी,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
बाल कविताएँ - 2 - प्रकाश मनु
कविता का अंश...
दही-बड़े हम दही बड़े!
दौड़े आओ, मत शरमाओ
खाओ भाई खड़े-खड़े!
स्वाद मिलेगा कहीं न ऐसा,
चखकर देखो फेंको पैसा।
टाफी-च्यूंगम, आइसक्रीम के
पल में लो झंडे उखड़े।
अजब-अनोखा रंग जमाया,
डंका हमने खूब बजाया।
आ ठेले पर, खड़े हुए हैं,
लाला, बाबू बड़े-बड़े।
अपनी मस्ती, अपनी हस्ती,
खा करके आती है चुस्ती।
तबियत कर दें खूब झकाझक-
अगर कोई इमसे अकड़े।
पेड़ा, बरफी चित्त पड़े हैं,
रसगुल्ले उखड़े-उखड़े हैं।
भला किसी की यह मजाल जो
आकर के हमसे झगड़े।
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दिव्य दृष्टि,
बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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बाल कविताएँ - 1 - प्रकाश मनु
कविता का अंश...
एक मटर का दाना था जी
एक मटर का दाना,
गोल-गोल था, सुंदर-सुंदर
था वह बड़ा सयाना!
घर से निकला, चौराहे पर
मिली उसे एक कार,
उछला-कूदा, कूदा-उछला
झटपट हुआ सवार
बैठ कार में, खूब अकड़कर
दौड़ा - दौड़ा - दौड़ा,
गलियाँ, सड़कें, चौरस्ते
सबको ही पीछे छोड़ा।
आगे-आगे, दौड़ा आगे
एक मटर का दाना!
एक मटर का दाना, था जो-
सचमुच बड़ा सयाना!
दिल्ली देखी, जयपुर देखा
कलकत्ते हो आया,
सभी अजूबे देख-देखकर
झटपट घर पर आया।
आ करके, नन्हे चुनमुन को
किस्सा वही सुनाया,
खूब हँसा वह, औरों को भी
खिल-खिल खूब हँसाया।
देखो, एक घुमक्कड़ समझो
मुझको जाना-माना,
इब्न बतूता संग घूमा हूँ
किस्सा बड़ा पुराना!
अजी मटर का दाना था वह
एक मटर का दाना!
एक मटर का दाना था
वह सचमुच बड़ा सयाना।
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बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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गुरुवार, 3 नवंबर 2016
कहानी - अनमोल क्षण - भूपेन्द्र कुमार दवे
कहानी का अंश...
एक शरारती बच्चे की तरह ठंड़ गुदगुदाने के लिये झाँक-झाँककर जगह ढूँढ़ रही थी। सिर के टोपे और कोटे के कालर के बीच, दस्ताने और ऊपर खिसकी बाँह के अंदर, पैर के मोजे और पतलून की मोहरी के बीच। चश्मे के नीचे मेरी लंबी नाक की दो सुरंगों को देख वह ठंड़ तो खिलखिलाकर लगातार गुदगुदाने में मस्त हो उठी थी। मैंने महसूस किया कि ठंड़ शरारती ही नहीं, बच्चों जैसी जिद्दी भी होती है।
मैं कोहरे को चीरता जैसे ही एयरपोर्ट पहुँचा तो देखा कि वहाँ पहले से आए मुसाफिरों के मुरझाये चेहरे ठिठुर रहे थे। मैं अटैची घसीटता आगे बढ़ा। उड़ान को देर थी। ‘मैं वक्त पर आ गया हूँ,’ मैं बुदबुदाया।
‘तुम मूर्ख हो,’ यह जताने ऊपर लगा मानीटर दमक रहा था। लिखा था कि कोहरे के कारण उड़ान देर से होगी।
‘उड़ान रद्द भी हो सकती है,’ किसी ने कँपकँपाती आवाज में अपनी पत्नी से कहा। सभी यात्री कुर्सियों पर बैठे थे। हरेक ने दो कुर्सियाँ हथिया रखी थीं। एक खुद के बैठने के लिये और दूसरी अपना हेंड़बैग रखने। मुसाफिरों में कुछ भारतीय थे और शेष विदेशी। लेकिन दो कुर्सियों पर कब्जा करने का तरीका सबका एक-सा था। तीन घंटे हेंड़बैग थामे भला कौन खड़ा रह सकता है? इतने लंबे इंतजार में सब ‘एटीकेट’ चकनाचूर हो जाता हैं। मैं फर्श पर उकडूँ बैठ गया। नीचे बिछी ‘टाइलस्’ बर्फ-सी थीं। पर सिर को घुटनों और हथेलियों के बीच दुबकना अच्छा लग रहा था।
लोग आपस में बतिया रहे थे। ठंड़ में फुसफुसाहट शोर की तरह सुनाई पड़ रही थी। लोग व्यवस्था की बिंगे निकाल रहे थे -- मौसम को दोष दे रहे थे। स्वयं को भाग्यहीन कहनेवाले कह रहे थे, ‘मैं जब भी यात्रा पर निकलता हूँ तो कम्बख्त ट्रेन को तभी लेट होना होता है। हवाई जहाज से जाने की सोचता हूँ तो उड़ान को ‘केंसल’ होने की पड़ी रहती है।’ ईश्वर को भी गैरजिम्मेदार कहनेवालों की कमी नहीं थी। मैं उनकी फुसफुसाहट को सुन, मन बहलाता रहा। लेकिन कुछ देर बाद जो फुसफुसाहट हो रही थी वह थम गई। सन्नाटे में ठंड़ी हवा की आवाज भी सताने लगती है। मैं बचपन में हवाई जहाज पर लिखे निबंध को याद करने लगा। महासागर पार जाने के लिये हवाई उड़ान सबसे सरल माध्यम है। इससे समय की बचत होती है। यात्रियों की सुविधा का भी ध्यान रखा जाता है। ये सारी बातें जो बच्चे लिखते थे, खोखली नजर आ रहीं थी। इसकी वजह एक ही थी, जिसे अंग्रेजी में बोरडम और हिन्दी में बोरियत कहते हैं। बोरियत का अर्थ है बैठे-ठाले बेफजूल बातें सोचकर खिन्न होना, दिमाग को खंगालकर निरर्थक विचारों को उबाल देना, चित्त को अव्यवस्थित कर चिंता की कंटीली झाड़ियों में उलझाना, मन को फुरसतिया समझकर इधर-उधर दौड़ाकर थकान पैदा करना, खुद को जबरदस्त टोंचा देकर बेचैन करना, भाग्य को कोसकर स्वतः को हताशा का पुलिंदा बना लेना, फिर अनावश्यक पुरानी यादों को तोड़-मरोड़कर स्मरण करना और अंत में इन सब को मिलाकर बनी बोरियत की सलाद को रह रहकर चखना और मुँह बिचकाना। आप कहेंगे कि सबसे बड़ा बोर वो है जो बोरडम की हालात में बोरियत की परिभाषा करने बैठ जाए। आगे की कहानी जानिए आॅडियो की मदद से...
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बुधवार, 2 नवंबर 2016
कविता - उधार - अज्ञेय
कविता का अंश...
सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।
मैंने धूप से कहा : मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार?
चिड़िया से कहा : थोड़ी मिठास उधार दोगी?
मैंने घास की पत्ती से पूछा : तनिक हरियाली दोगी-
तिनके की नोक-भर?
शंखपुष्पी से पूछा : उजास दोगी-
किरण की ओक-भर?
मैंने हवा से माँगा : थोड़ा खुलापन-बस एक प्रश्वास,
लहर से : एक रोम की सिहरन-भर उल्लास।
मैंने आकाश से माँगी
आँख की झपकी-भर असीमता-उधार।
सब से उधार माँगा, सब ने दिया।
यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन-
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गंधवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का :
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।
रात के अकेले अंधकार में
सपने से जागा जिसमें
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझ से पूछा था : 'क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के
इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे उधार जिसे मैं
सौ-गुने सूद के साथ लौटाऊँगा-
और वह भी सौ-सौ बार गिन के-
जब-जब मैं आऊँगा?'
मैंने कहा : प्यार? उधार?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार।
उस अनदेखे अरूप ने कहा : 'हाँ,
क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं-
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त अननुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह-व्यथा,
यह अंधकार में जाग कर सहसा पहचानना कि
जो मेरा है वही ममेतर है।
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो-उधार- इस एक बार-
मुझे जो चरम आवश्यकता है।'
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कविता,
दिव्य दृष्टि
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सिंहासन बत्तीसी - 3 - चन्द्रकला
कहानी का अंश...
तीसरी पुतली चन्द्रकला ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक बार पुरुषार्थ और भाग्य में इस बात पर ठन गई कि कौन बड़ा है। पुरुषार्थ कहता कि बगैर मेहनत के कुछ भी सम्भव नहीं है जबकि भाग्य का मानना था कि जिसको जो भी मिलता है भाग्य से मिलता है ,परिश्रम की कोई भूमिका नहीं होती है। उनके विवाद ने ऐसा उग्र रुप ग्रहण कर लिया कि दोनों को देवराज इन्द्र के पास जाना पड़ा। झगड़ा बहुत ही पेचीदा था इसलिए इन्द्र भी चकरा गए। पुरुषार्थ को वे नहीं मानते जिन्हें भाग्य से ही सब कुछ प्राप्त हो चुका था। दूसरी तरफ अगर भाग्य को बड़ा बताते तो पुरुषार्थ उनका उदाहरण प्रस्तुत करता जिन्होंने मेहनत से सब कुछ अर्जित किया था। असमंजस में पड़ गए और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे। काफी सोचने के बाद उन्हें विक्रमादित्य की याद आई। उन्हें लगा सारे विश्व में इस झगड़े का समाधान सिर्फ वही कर सकते है।
उन्होंने पुरुषार्थ और भाग्य को विक्रमादित्य के पास जाने के लिए कहा। पुरुषार्थ और भाग्य मानव भेष में विक्रम के पास चल पड़े। विक्रम के पास आकर उन्होंने अपने झगड़े की बात रखी। विक्रमादित्य को भी तुरन्त कोई समाधान नहीं सूझा। उन्होंने दोनों से छ: महीने की मोहलत माँगी और उनसे छ: महीने के बाद आने को कहा। जब वे चले गए तो विक्रमादित्य ने काफी सोचा। किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके तो उन्होंने सामान्य जनता के बीच भेष बदलकर घूमना शुरु किया। काफी घूमने के बाद भी जब कोई संतोषजनक हल नहीं खोज पाए तो दूसरे राज्यों में भी घूमने का निर्णय किया। काफी भटकने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने एक व्यापारी के यहाँ नौकरी कर ली। आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...
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बाल कहानी
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
सोमवार, 31 अक्टूबर 2016
कविताएँ - शैलजा दुबे
कविता का अंश...
ज़िंदगी....मेरी नज़र में
ज़िंदगी एक आइना है,
सुख-दुख का मुआयना है।
खूबसूरत है, खुशगंवार है।
गुल से गुलशन गुलज़ार है।
ज़िंदगी सरगम है, संगीत है।
साजन से रूठा हुआ मीत है।
आलाप है, मल्हार है।
दुल्हन का सोलह श्रृंगार है।
ज़िंदगी सुबह है, शाम है।
आने जाने का नाम है।
कभी मीठी, कभी खट्टी है।
पहली बारिश से भीगी मिट्टी है।
ज़िंदगी नग़मा है, गज़ल है।
खेतों में लहराती फसल है।
कभी तकरार है, कभी प्यार है।
पहली मोहब्बत का इज़हार है।
ज़िंदगी वेदना भरी पुकार है।
मीठी सी थपकी दुलार है।
कभी ईर्षा कभी तिरस्कार है।
कभी सराहना कभी पुरस्कार है।
ज़िंदगी कभी आशा है, कभी निराशा है।
कभी मौन कभी भाषा है।
इसमें यादों के निशान हैं।
बंजर ज़मीन को उपजाता किसान है।
ज़िंदगी कभी बेसुरी, कभी सुरीली है।
सखी, सहेली, हमजोली है।
कभी उतार कभी चढ़ाव है।
कभी हलचल कभी ठहराव है।
ज़िंदगी कविता है, शायरी है।
किसी की यादों को समेटे डायरी है।
ज़िंदगी कभी मुकम्मल, कभी अधूरी है।
विश्वास पर घूमती धुरी है।
पिता की उँगली थामे हुए लाडला है।
माँ के संस्कारों से पल्लवित पौधा है।
ज़िंदगी लुत्फ़ है, खुमार है।
बागों में इठलाती हुई बहार है।
बचपन है,खिलौना है।
माथे पर लगा हुआ डिठौना है।
ज़िंदगी एक खुली किताब है।
फ़लक पर चमकता हुआ आफ़ताब है।
कभी ज़ख्म है, कभी मलहम है।
फूल की पंखुड़ी पर ठहरी हुई शबनम है।
ज़िंदगी दुर्योधन है, कंस है।
अपनों को डसता हुआ दंश है।
जिंदगी जिंदादिली की मिसाल है।
अंधेरे में जलती हुई मशाल है।
ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए....
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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लघुकथा - प्रतिबिंब - शैलजा दुबे
कहानी का अंश....
वो एक बार फिर निराश, हताश सोफे पर धम्म से बैठ गया। उसकी फाइल हाथ से छूट गई। डिग्रियाँ, सर्टिफिकेट पंखे की हवा में यहाँ-वहाँ उड़ने लगे। वह स्तब्ध, शांत, भावशून्य अपनी आशाओं, आकांक्षाओं को हवा में उड़ते देख रहा था। वह एक शिक्षित, संस्कारी, सभ्य नौजवान था, किंतु फिर भी बेरोज़गार था। उसके परिवार में माता-पिता और चार बहनें थीं। पिता सेवा निवृत्त हो चुके थे। माँ दूसरों के कपड़े सिलकर चार पैसे कमाने की कोशिश करती थी, पर अब उसकी भी आँखें कमज़ोर हो चली थीं। बहनें पढी-लिखी थी, नौकरी करना चाहती थीं, लेकिन पिता के आदर्शों और मूल्यों के आगे बेबस थीं। पिता नहीं चाहते थे कि लोग कहें कि बेटियों की कमाई खा रहे हैं। लेकिन लोगों का क्या, उनका तो काम ही है कहना। कैसी भी परिस्थिति हो उन्हें तो कहना ही है, जैसे इस काम के उन्हें पैसे मिलते हों। खैर.... उस नौजवान से परिवार के सदस्यों को बहुत उम्मीदें थीं। या यूँ कह लीजिए कि उसके कंधों पर ही परिवार का दारोमदार था। सोफे पर बैठा वह अचानक उठकर बैठ गया। तेज़ रोशनी से उसकी आँखें चौंधियाने लगीं। उसके सामने एक आकृति थी। उसने घबराकर पूछा, कौन हो तुम? तुम तो मेरी तरह ही दिख रहे हो। उस आकृति ने कहा, ‘हाँ, मैं तुम्हारा ही प्रतिबिंब हूँ। मैं तब आता हूँ, जब इंसान गहरे अंधकार, पीड़ा और अवसाद की गहराइयों में डूबने लगता है और उसे एक क्षण भी नहीं लगता अपना जीवन समाप्त करने में। वह ये विस्मृत कर देता है कि जीवन अमूल्य है, वरदान है और इस जीवन का अंत करके होगा क्या! क्या तुम उन लोगों को और परेशानी, अकेलापन नहीं दे जाओगे जो तुमसे जुड़े हैं। यह सब सुनकर उस नौजवान का चेहरा धीरे-धीरे सामान्य व स्थिर हो रहा था। उसके प्रतिबिंब ने कहा, यदि तुम्हें ईश्वर ने इस संसार में भेजा है तो तुम्हारे लिए रास्ते भी अवष्य बनाए होगें। आवश्यकता इस बात की है कि तुम उन राहों को खोजो, और एक बात सदैव याद रखना कि जो वस्तु सरलता से प्राप्त हो जाती है, उसका आनंद अधिक समय तक नहीं रहता लेकिन जो वस्तु थोड़े परिश्रम, कठिनाई से प्राप्त होती है उसका आनंद अनंत समय तक रहता है। उठो, और नए सिरे से एक बार फिर प्रयास करो क्योंकि ईश्वर की लीला को कोई नही समझ सकता। वह जो करता है अच्छे के लिए करता है। इतना कहकर वो प्रतिबिंब वहाँ से अदृश्य हो गया। अब उस नौजवान में नई आशा, विश्वास, उत्साह का संचार था। उसने अपनी बिखरी हुई डिग्रियाँ, सर्टिफिकेट समेटे और उन्हें करीने से फाइल में जमाकर चल दिया उस ओर जहाँ से रोशनी आ रही थी.... इस कहानी का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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लघुकथा
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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सिंहासन बत्तीसी - 2 - चित्रलेखा
कहानी का अंश...
एक बार राजा विक्रमादित्य की इच्छा योग साधने की हुई। अपना राजपाट अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर वह अंग में भभूत लगाकर जंगल में चले गए।
उसी जंगल में एक ब्राह्मण तपस्या कर रहा था। एक दिन देवताओं ने प्रसन्न होकर उस ब्राह्मण को एक फल दिया और कहा, “जो इसे खा लेगा, वह अमर हो जायगा।” ब्राह्मण ने उस फल को अपनी ब्राह्मणी को दे दिया। ब्राह्मणी ने उससे कहा, “इसे राजा को दे आओं और बदले में कुछ धन ले आओ।” ब्राह्मण ने जाकर वह फल राजा को दे दिया। राजा अपनी रानी को बुहत प्यार करता था, उसने वह फल अपनी रानी को दे दिया। रानी की दोस्ती शहर के कोतवाल से थी। रानी ने वह फल उस दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह फल वेश्या के यहाँ पहुँचा। वेश्या ने सोचा कि, “मैं अमर हो जाऊँगी तो बराबर पाप करती रहूँगी। अच्छा होगा कि यह फल राजा को दे दूँ। वह जीएगा तो लाखों का भला करेगा।” यह सोचकर उसने दरबार में जाकर वह फल राजा को दे दिया। फल को देखकर राजा आश्चर्य चकित रह गया। उसे सब भेद मालूम हुआ तो उसे बड़ा दु:ख हुआ। उसे दुनिया बेकार लगने लगी। एक दिन वह बिना किसी से कहे-सुने राजपाट छोड़कर घर से निकल गया। राजा इंद्र को यह मालूम हुआ तो उन्होंने राज्य की रखवाली के लिए एक देव भेज दिया।
उधर जब राजा विक्रमादित्य का योग पूरा हुआ तो वह लौटे। देव ने उन्हे रोका। विक्रमादित्य ने उससे पूछा तो उसने सब हाल बता दिया। विक्रमादित्य ने अपना नाम बताया, फिर भी देव ने उन्हें न जाने दिया। बोला, “तुम विक्रमाकिदत्य हो तो पहले मुझसे लड़ों।”
दोनों में लड़ाई हुई। विक्रमादित्य ने उसे पछाड़ दिया। देव बोला, “तुम मुझे छोड़ दो। मैं तुम्हारी जान बचाता हूं।”
राजा ने पूछा, “कैसे?”
देव बोला, “इस नगर में एक तेली और एक कुम्हार तुम्हें मारने की फिराक में है। तेली पाताल में राज करता है। और कुम्हार योगी बना जंगल में तपस्या करता है।
दोनों चाहते हैं कि तुमको मारकर तीनों लोकों का राज करें।
योगी ने चालाकी से तेली को अपने वश में कर लिया है। और वह अब सिरस के पेड़ पर रहता है। एक दिन योगी तुम्हें बुलायगा और छल करके ले जायगा। जब वह देवी को दंडवत करने को कहे तो तुम कह देना कि मैं राजा हूँ, दण्डवत करना नहीं जानता। तुम बताओ कि कैसे करुँ? योगी जैसे ही सिर झुकाए, तुम खांडे से उसका सिर काट देना। फिर उसे और तेली को सिरस के पेड़ से उतारकर देवी के आगे खौलते तेल के कड़ाह में डाल देना।”
राजा ने ऐसा ही किया। इससे देवी बहुत प्रसन्न हुई और उसने दो वीर उनके साथ भेज दिए। राजा अपने घर आए और राज करने लगे। दोनों वीर राजा के वश में रहे और उनकी मदद से राजा ने आगे बड़े–बडे काम किए। इसके आगे की कहानी जानिए ऑडियो की मदद से...
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बाल कहानी
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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शनिवार, 22 अक्टूबर 2016
पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू हाजिर हों....
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आज का सच
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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016
सिंहासन बत्तीसी - 1 - रत्नमंजरी
कहानी का अंश...
अंबावती में एक राजा राज करता था। उसका बड़ा रौब-दाब था। वह बड़ा दानी था। उसी राज्य में धर्मसेन नाम का एक और बड़ा राजा हुआ। उसकी चार रानियाँ थी। एक थी ब्राहृण दूसरी क्षत्रिय, तीसरी वैश्य और चौथी शूद्र। ब्राहृणी से एक पुत्र हुआ, जिसका नाम ब्राहृणीत रखा गया। क्षत्राणी से तीन बेटे हुए। एक का नाम शंख, दूसरे का नाम विक्रमादित्य और तीसरे का भर्तृहरि रखा गया। वैश्य से एक लड़का हुआ, जिसका नाम चंद्र रखा गया। शूद्राणी से धन्वन्तारि हुए।
जब वे लड़के बड़े हुए तो ब्राह्यणी का बेटा दीवान बना। बाद में वहाँ बड़े झगड़े हुए। उनसे तंग आकर वह लड़का घर से निकल पड़ा और धारापूर आया। हे राजन्! वहाँ का राजा तुम्हारा पिता था। उस लड़के ने राजा को मार डाला और राज्य अपने हाथ में करके उज्जैन पहुँचा। संयोग की बात कि उज्जैन में आते ही वह मर गया। उसके मरने पर क्षत्राणी का बेटा शंख गद्दी पर बैठा। कुछ समय बाद विक्रमादित्य ने चालाकी से शंख को मरवा डाला और स्वयं गद्दी पर बैठ गया।
एक दिन राजा विक्रमादित्य शिकार खेलने गया। बियावान जंगल। रास्ता सूझे नहीं। वह एक पेड़ चढ़ गया। ऊपर जाकर चारों ओर निगाह दौड़ाई तो पास ही उसे एक बहुत बड़ा शहर दिखाई दिया। अगले दिन राजा ने अपने नगर में लौटकर उसे बुलवाया। वह आया। राजा ने आदर से उसे बिठाया और शहर के बारे में पूछा तो उसने कहा, “वहाँ बाहुबल नाम का राजा बहुत दिनों से राज करता है। आपके पिता गंधर्वसेन उसके दीवान थे। एक बार राजा को उन पर अविश्वास हो गया और उन्हें नौकरी से अलग कर दिया। गंधर्बसेन अंबावती नगरी में आये और वहाँ के राजा हो गए। हे राजन्! आपको जग जानता है, लेकिन जब तक राजा बाहुबल आपका राजतिलक नहीं करेगा, तब तक आपका राज अचल नहीं होगा। मेरी बात मानकर राजा के पास जाओं और प्यार में भुलाकर उससे तिलक कराओं।”
विक्रमादित्य ने कहा, “अच्छा।” और वह लूतवरण को साथ लेकर वहाँ गया। बाहुबल ने बड़े आदर से उसका स्वागत किया और बड़े प्यार से उसे रखा। पाँच दिन बीत गए। लूतवरण ने विक्रमादित्य से कहा, “जब आप विदा लोगे तो बाहुबल आपसे कुछ माँगने को कहेगा। राजा के घर में एक सिंहासन हैं, जिसे महादेव ने राजा इन्द्र को दिया था। और इन्द्र ने बाहुबल को दिया। उस सिंहासन में यह गुण है कि जो उस पर बैठेगा। वह सात द्वीप नवखण्ड पृथ्वी पर राज करेगा। उसमें बहुत-से जवाहरात जड़े हैं। उसमें साँचे में ढालकर बत्तीस पुतलियाँ लगाई गई हैं। हे राजन्! तुम उसी सिंहासन को माँग लेना।”
इसके आगे की कथा ऑडियो के माध्यम से जानिए...
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बाल कहानी
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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सिंहासन बत्तीसी - आरंभ की कथा
कहानी का अंश...
बहुत दिनों की बात है। उज्जैन नगरी में राजा भोंज नाम का एक राजा राज करता था। वह बड़ा दानी और धर्मात्मा था। न्याय ऐसा करता कि दूध और पानी अलग-अलग हो जाए। उसके राज में शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। प्रजा सब तरह से सुखी थी। नगरी के पास ही एक खेत था, जिसमें एक आदमी ने तरह–तरह की बेलें और साग-भाजियां लगा रखी थीं। एक बार की बात है कि खेत में बड़ी अच्छी फसल हुई। खूब तरकारियाँ उतरीं, लेकिन खेत के बीचों-बीच थोड़ी-सी जमीन खाली रह गई। बीज उस पर डाले थे, पर जमे नहीं। सो खेत वाले वहाँ खेत की रखवाली के लिए एक मचान बना लिया। पर उस पर वह जैसें ही चढ़ा कि लगा चिल्लाने- “कोई है? राजा भोज को पकड़ लाओं और सजा दो।”
होते-होते यह बात राजा के कानों में पहुँची। राजा ने कहा, “मुझे उस खेत पर ले चलो। मैं सारी बातें अपनी आंखों से देखना और कानों से सुनना चाहता हूं।”
लोग राजा को ले गए। खेत पर पहुँचते ही देखते क्या हैं कि वह आदमी मचान पर खड़ा है और कह रहा है- “राजा भोज को फौरन पकड़ लाओ और मेरा राज उससे ले लो। जाओ, जल्दी जाओ।”
यह सुनकर राजा को बड़ा डर लगा। वह चुपचाप महल में लौटा आया। फिक्र के मारे उसे रातभर नींद नहीं आयी। ज्यों-त्यों रात बिताई। सवेरा होते ही उसने अपने राज्य के ज्योतिषियों और पंडितों को इकट्ठा किया। उन्होंने हिसाब लगाकर बताया कि उस मचान के नीचे धन छिपा है। राजा ने उसी समय आज्ञा दी कि उस जगह को खुदवाया जाए।
खोदते-खोदते जब काफी मिट्टी निकल गई तो अचानक लोगों ने देखा कि नीचे एक सिंहासन है। उनके अचरज का ठिकाना न रहा। राजा को खबर मिली तो उसने उसे बाहर निकालने को कहा, लेकिन लाखों मजदूरों के जोर लगाने पर भी वह सिंहासन टस-से मस-न हुआ। तब एक पंडित ने बताया कि यह सिंहासन देवताओं का बनाया हुआ है। अपनी जगह से तब तक नहीं हटेगा जब तक कि इसकों कोई बलि न दी जाए। इसके आगे की कहानी जानिए ऑडियो के माध्यम से...
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दिव्य दृष्टि,
बाल कहानी
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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तिरंगे के बारे में कुछ जानकारियाँ….
लेख का अंश…
प्रत्येक देश का राष्ट्रीय ध्वज उस देश का प्रतीक होता है। इसलिए हर नागरिक का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने राष्ट्र के पावन प्रतीक का निष्ठापूर्वक सम्मान करे। भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के नाम से जाना जाता है। हमारे इस ध्वज में तीन समान लंबाई-चौड़ाई वाली पट्टियाँ हैं। सबसे ऊपर त्याग की प्रतीक केसरिया, बीच में निर्मलता की प्रतीक सफेद और नीचे देश की समृद्धि और विकास की प्रतीक हरी पट्टी है। वास्तव में तिरंगे में चौथे रंग का भी प्रयोग हुआ है। यह रंग है नीला। ध्वज के मध्य में सफेद पट्टी पर अशोक चक्र इसी रंग में है। यह रंग नीले आकाश और सागर का प्रतीक है। चक्र में तीलियाँ हैं, जो 24 घंटे चलने वाली विकास की गति का प्रतीक है। आमतौर पर दुनिया भर में राष्ट्रीय ध्वज सूर्योदय के समय फहराए जाते हैं और सूर्यास्त के समय उतार लिए जाते हैं।
राष्ट्रीय ध्वज को फहराते या उतारते समय सम्मान के लिए सावधान की मुद्रा में खड़े रहना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज को फहराने या उसके प्रदर्शन के समय उसे किसी व्यक्ति या वस्तु विशेष के सामने झुकाना नहीं चाहिए। ऐसी ही राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ी कुछ विेशेष नियमावली के बारे में ऑडियो की मदद से जानिए…
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लेख
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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बाल कविता – नींद – डॉ. श्रीप्रसाद
कविता का अंश…
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
मीठी गोली जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
माँ की बोली जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
अपने खेलों जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
सुंदर मेलों जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
खिल खिल फूलों जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
प्यारे झूलों जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
झिलमिल किरनों जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
चंचल हिरनों जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
अपनी नानी जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है,
कथा कहानी जैसी।
नींद बड़ी अच्छी लगती है….
इस अधूरी कविता को पूरा सुनने का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…
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बाल कविता
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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016
लघुकथा – सौदागर – रमेश चन्द्र शर्मा ‘आचार्य’
कहानी का अंश...
उसके पास-पड़ोस की सभी हमउम्र लड़कियाँ अपना-अपना घर बसा चुकी थीं। कई तो उसकी उम्र से चार-पाँच साल छोटी भी थी। वह विवाह के यर्थाथ से भलीभांति परिचित थी। कई बार स्त्री मुक्ति के बारे में अखबारों में पढ़ती तो उसे मन ही मन बड़ा क्रोध आता। उसकी तो बस एक ही इच्छा थी कि उसके माँ-बाबूजी सदा खुश रहें लेकिन जब भी वे उसे देखते उनके चेहरे पर विषाद की रेखाएँ उभरने लगतीं। और वे अपनी किस्मत को कोसने लगते थे। वह अच्छी तरह से जानती थी कि मध्यमवर्गीय परिवार की लड़कियाँ समाज द्वारा संचालित होती हैं और उनके माता-पिता भी समाज की रुढ़ियों से ग्रस्त होते हैं। वह हर बार सोचती कि बाबूजी से सीधे कहे कि बिना शादी के भी लोग जीते हैं और वे उसके विवाह को लेकर परेशान न हों। मगर वो कहाँ मानने वाले थे। कहीं भी, कोई भी मिलता तो बस वे उसे घर आने का न्योता दे डालते और उसे एक बार फिर सभी के सामने नुमाइश बनना पड़ता था। वह देखने में साँवली थी। नैन-नक्श भी अच्छे थे। एक कंपनी में अच्छी तनख्वाह से नौकरी भी कर रही थी।फिर क्या हुआ? क्यों विवाह में देर हो रही थी? आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....
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दिव्य दृष्टि,
लघुकथा
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
बुधवार, 19 अक्टूबर 2016
कविता - जिसका काम उसी को साजे : विवेक भटनागर
कविता का अंश...
एक गधा था चंपक वन में,
ढेंचू जिसका नाम।
सीधा-सादा, भोला-भाला,
करता था सब काम।
एक बार वह लगा सोचने,
मैं भी गाना गाऊँ।
जंगल के सब जानवरों पर,
अपनी धाक जमाऊँ।
लेकिन गधा अकेले कैसे,
अपना राग अलापे।
यही सोचकर गधा बेचारा,
मन ही मन में झेंपे।
कालू कौए को जब उसने,
मन की बात बताई।
कालू बोला- ढेंचू भाई,
इसमें कौन बुराई।
हम दोनों मिलकर गाएँगे,
अपना नाम करेंगे।
कोयल-मैना के गाने की,
हम छुट्टी कर देंगे।
मैं काँव-काँव का राग गढ़ूँ,
तुम ढेंचू राग बनाना।
डूब मरेगा चुल्लू भर में,
तानसेन का नाना।
इतने में आ गई लोमड़ी,
फिर उनको बहकाने।
बोली- तुम तो गा सकते हो,
अच्छे-अच्छे गाने।
शेर सिंह राजा को जाकर,
अपना राग सुनाओ।
उनको खुश कर राजसभा में,
मंत्रीपद पा जाओ।
अगले दिन था राजसभा में,
उन दोनों का गाना।
ढेंचू-ढेंचू-काँव-काँव का,
बजने लगा तराना।
वहाँ उपस्थित सब लोगों ने,
कान में उंगली डाली।
गाना खत्म हो गया लेकिन
बजी न एक भी ताली।
निर्णय दिया शेरसिंह ने तब,
कर्कश है यह गान।
इससे हो सकता है प्रदूषित,
हरा-भरा उद्यान।
जाकर इस जंगल के बाहर,
तुमको गाना होगा।
वरना इस गाने पर तुमको,
टैक्स चुकाना होगा।
सुनकर शेरसिंह का निर्णय,
हो गये दोनों दंग।
जैसे भरी सभा में दोनों,
हो गये नंग-धड़ंग।
शेर सिंह की बातें सुनकर,
सपने से वे जागे।
जिसका काम उसी को साजे,
और करे तो डंडा बाजे।
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दिव्य दृष्टि,
बाल कविता
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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कविता - माँ का मौन - विवेक भटनागर
कविता का अंश...
लीप दिया है चूल्हा, अम्मा मिट्टी वाला।
मांज दिया है तवा, हुआ था बेहद काला।
फिर भी कहती मत जा बाहर लुक्का-छिप्पी खेल खेलने…।
बड़े सबेरे उठकर मैंने,
सारे घर के कपड़े फींचे।
नहला-धुला कर लछमिनिया को,
उलझे बाल जतन से खींचे।
भूखी गइयों की नांदों में,
खली डाल कर सानी की है।
हुई मांजकर बरतन काली,
दी हुई अंगूठी नानी की है।
लगा दिया है बटन सुई से,
संजू के नेकर में काला….।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला….।
जब बाहर जाती तो कहती,
बेटी तू मत बाहर खेल।
तू लड़की है, कामकाज कर,
लड़कों के संग कैसा मेल।
क्या लड़कों के साथ खेलना,
कोई पाप हुआ करता है?
लड़की का क्या कद बढ़ जाना,
अम्मा पाप हुआ करता है?
फिर तो अम्मा चारदिवारी,
लगती है मकड़ी का जाला…।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला…।
लेकर कलम-बुदिक्का मैंने,
पाटी में था लिखा ककहरा।
पाठ याद किए थे सारे,
था जीवन में उन्हें उतारा…।
पांच पास करते ही तुमने,
मुझे मदरसा छुटा दिया है।
घर-गृहस्थी में क्यों अम्मा,
मुझको उलझा अभी दिया है।
जो कुछ पढ़ा, अभी तक उसका,
इन कामों में पड़ा न पाला….।
लीप दिया है चूल्हा अम्मा मिट्टी वाला…।
इस अधूरी कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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धरती देखती गगन की ओर - प्रदीप कुमार सिंह
धरती देखती गगन की ओर
कविता का अंश...
धरती देखती गगन की ओर, कब गिरेंगी बूँदें चारों ओर।
कब बिखरेगी हरियाली, कब मदमस्त होकर नाचेगा मोर।
होगी शांति स्थापित कब और कब खत्म होगा ये शोर।
अपने आँसू स्वयं पोछती, माता देखती गगन की ओर।
जैसे चाँद को देखता है चकोर , धरती देखती गगन की ओर।
सब रिश्ते नाते तोड़ कर मानव चला जिस मोड़ पर,
उस पथ पर अँधियारा है घोर।
कब मिटा कर अँधेरे की थाती, फिर चमकेगा सूरज चहुँ ओर।
यही पूछती बेटों से, चुपचाप देखती मरण की ओर।
धरती देखती गगन की ओर। धरती देखती गगन की ओर।
लेकर मन में आशा के अंकुर, टूटे हुए सपनों की जोड़ती है डोर।
यही सोचती मन ही मन की ना जाने कब होगी ये भोर।
मानवीय दोहन से आहत, माता देखती दमन की ओर।
धरती देखती गगन की ओर। धरती देखती गगन की ओर।
सिमटती जा रही है माँ, मिटती जा रही है माँ,
कब मानव करेगा जननी पर गौर?
अपनी ही परछाई से डरती, धरती देखती गगन की ओर।
धरती देखती गगन की ओर। धरती देखती गगन की ओर।
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कविता,
दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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दशरथ विलाप - भारतेन्दु हरिश्चंद्र
कविता का अंश...
कहाँ हौ ऐ हमारे राम प्यारे ।
किधर तुम छोड़कर मुझको सिधारे ।।
बुढ़ापे में ये दु:ख भी देखना था।
इसी के देखने को मैं बचा था ।।
छिपाई है कहाँ सुन्दर वो मूरत ।
दिखा दो साँवली-सी मुझको सूरत ।।
छिपे हो कौन-से परदे में बेटा ।
निकल आवो कि अब मरता हु बुड्ढा ।।
बुढ़ापे पर दया जो मेरे करते ।
तो बन की ओर क्यों तुम पर धरते ।।
किधर वह बन है जिसमें राम प्यारा ।
अजुध्या छोड़कर सूना सिधारा ।।
गई संग में जनक की जो लली है
इसी में मुझको और बेकली है ।।
कहेंगे क्या जनक यह हाल सुनकर ।
कहाँ सीता कहाँ वह बन भयंकर ।।
गया लछमन भी उसके साथ-ही-साथ ।
तड़पता रह गया मैं मलते ही हाथ ।।
मेरी आँखों की पुतली कहाँ है ।
बुढ़ापे की मेरी लकड़ी कहाँ है ।।
कहाँ ढूँढ़ौं मुझे कोई बता दो ।
मेरे बच्चो को बस मुझसे मिला दो ।।
लगी है आग छाती में हमारे।
बुझाओ कोई उनका हाल कह के ।।
मुझे सूना दिखाता है ज़माना ।
कहीं भी अब नहीं मेरा ठिकाना ।।
अँधेरा हो गया घर हाय मेरा ।
हुआ क्या मेरे हाथों का खिलौना ।।
मेरा धन लूटकर के कौन भागा ।
भरे घर को मेरे किसने उजाड़ा ।।
हमारा बोलता तोता कहाँ है ।
अरे वह राम-सा बेटा कहाँ है ।।
कमर टूटी, न बस अब उठ सकेंगे ।
अरे बिन राम के रो-रो मरेंगे ।।
कोई कुछ हाल तो आकर के कहता ।
है किस बन में मेरा प्यारा कलेजा ।।
हवा और धूप में कुम्हका के थककर ।
कहीं साये में बैठे होंगे रघुवर ।।
जो डरती देखकर मट्टी का चीता ।
वो वन-वन फिर रही है आज सीता ।।
कभी उतरी न सेजों से जमीं पर ।
वो फिरती है पियोदे आज दर-दर ।।
न निकली जान अब तक बेहया हूँ ।
भला मैं राम-बिन क्यों जी रहा हूँ ।।
मेरा है वज्र का लोगो कलेजा ।
कि इस दु:ख पर नहीं अब भी य फटता ।।
मेरे जीने का दिन बस हाय बीता ।
कहाँ हैं राम लछमन और सीता ।।
कहीं मुखड़ा तो दिखला जायँ प्यारे ।
न रह जाये हविस जी में हमारे ।।
कहाँ हो राम मेरे राम-ए-राम ।
मेरे प्यारे मेरे बच्चे मेरे श्याम ।।
इस अधूरी कविता का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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दिव्य दृष्टि
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बाल कविताएँ - महादेवी वर्मा
कविता का अंश...
मेह बरसने वाला है,
मेरी खिड़की में आ जा तितली।
बाहर जब पर होंगे गीले,
धुल जाएँगे रंग सजीले,
झड़ जाएगा फूल, न तुझको
बचा सकेगा छोटी तितली,
खिड़की में तू आ जा तितली!
नन्हे तुझे पकड़ पाएगा,
डिब्बी में रख ले जाएगा,
फिर किताब में चिपकाएगा,
मर जाएगी तब तू तितली,
खिड़की में तू छिप जा तितली।
ऐसी ही अन्य बाल कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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