बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

दशरथ विलाप - भारतेन्दु हरिश्चंद्र

कविता का अंश... कहाँ हौ ऐ हमारे राम प्यारे । किधर तुम छोड़कर मुझको सिधारे ।। बुढ़ापे में ये दु:ख भी देखना था। इसी के देखने को मैं बचा था ।। छिपाई है कहाँ सुन्दर वो मूरत । दिखा दो साँवली-सी मुझको सूरत ।। छिपे हो कौन-से परदे में बेटा । निकल आवो कि अब मरता हु बुड्ढा ।। बुढ़ापे पर दया जो मेरे करते । तो बन की ओर क्यों तुम पर धरते ।। किधर वह बन है जिसमें राम प्यारा । अजुध्या छोड़कर सूना सिधारा ।। गई संग में जनक की जो लली है इसी में मुझको और बेकली है ।। कहेंगे क्या जनक यह हाल सुनकर । कहाँ सीता कहाँ वह बन भयंकर ।। गया लछमन भी उसके साथ-ही-साथ । तड़पता रह गया मैं मलते ही हाथ ।। मेरी आँखों की पुतली कहाँ है । बुढ़ापे की मेरी लकड़ी कहाँ है ।। कहाँ ढूँढ़ौं मुझे कोई बता दो । मेरे बच्चो को बस मुझसे मिला दो ।। लगी है आग छाती में हमारे। बुझाओ कोई उनका हाल कह के ।। मुझे सूना दिखाता है ज़माना । कहीं भी अब नहीं मेरा ठिकाना ।। अँधेरा हो गया घर हाय मेरा । हुआ क्या मेरे हाथों का खिलौना ।। मेरा धन लूटकर के कौन भागा । भरे घर को मेरे किसने उजाड़ा ।। हमारा बोलता तोता कहाँ है । अरे वह राम-सा बेटा कहाँ है ।। कमर टूटी, न बस अब उठ सकेंगे । अरे बिन राम के रो-रो मरेंगे ।। कोई कुछ हाल तो आकर के कहता । है किस बन में मेरा प्यारा कलेजा ।। हवा और धूप में कुम्हका के थककर । कहीं साये में बैठे होंगे रघुवर ।। जो डरती देखकर मट्टी का चीता । वो वन-वन फिर रही है आज सीता ।। कभी उतरी न सेजों से जमीं पर । वो फिरती है पियोदे आज दर-दर ।। न निकली जान अब तक बेहया हूँ । भला मैं राम-बिन क्यों जी रहा हूँ ।। मेरा है वज्र का लोगो कलेजा । कि इस दु:ख पर नहीं अब भी य फटता ।। मेरे जीने का दिन बस हाय बीता । कहाँ हैं राम लछमन और सीता ।। कहीं मुखड़ा तो दिखला जायँ प्यारे । न रह जाये हविस जी में हमारे ।। कहाँ हो राम मेरे राम-ए-राम । मेरे प्यारे मेरे बच्चे मेरे श्याम ।। इस अधूरी कविता का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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