शुक्रवार, 7 दिसंबर 2007

कब तक चलेगी मासूमों की तिजारत...

डॉ. महेश परिमल
बच्चा प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति. इनमें ईश्वर का वास होता है. इनका मन पवित्र होता है. ये भेदभाव नहीं जानते. इनकी दृष्टि में सब समान होते हैं पर यही बच्चे जब लोगों की तामसी प्रवृत्ति का शिकार होते हों, तब किसका हृदय नहीं पसीजेगा? लेकिन ऐसा हो रहा है. ठीक सरकार की नाक के नीचे. लेकिन बच्चों का व्यापार करने वाले दुष्टों का सरकार भी कुछ बिगाड़ नहीं पा रही है.
हमारे आसपास मासूम बचपन कई रूपों में मिल जाता है. कभी किलकता हुआ, कभी मस्ती में डूबा हुआ, कभी माता-पिता के काम में हाथ बँटाता हुआ, कभी मजदूरी करता हुआ और कभी पूर्ण वयस्क बनकर घर की जिम्मेदारी उठाता हुआ. पर किलकता हुआ बचपन तो वह मनभावन रूप है, जिसके साथ कुछ भी अन्याय करने पर आत्मा रो पड़ती है, पर आंध्रप्रदेश के हैदराबाद में समाजसेवा के नाम पर जिन स्वयंसेवी संस्थाओं के दुष्टों ने मासूमों को विदेशी हाथों में बेचने का जो घृणित कार्य किया है, वह समाज के लिये कलंक है. उन भेड़ियों के लिए फाँसी की सजा भी कम है. पर राज्य को कम्प्यूटर युग में ले जाने वाली सरकार को भला इससे क्या? वह भी कम्प्यूटर की तरह हृदयहीन हो गई है. संवेदना तो मर ही गई है उस सरकार की.
आज पूरे देश में जहाँ जेल अपराधियों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान बन गई हो, वहाँ नारी निकेतन एवं बाल सुधार गृह, यंत्रणा के केंद्र बन गए हैं. सरकारी अस्पताल जहाँ मरीज ढेर सारी दुआएँ लेकर स्वस्थ होने जाता है, वहाँ से वह किस तरह की छटपटाहट एवं कसमसाहट लेकर लौटता है, इसे केवल भुक्तभोगी ही समझता है. प्रसव पीड़ा से कराहती महिला के लिए अस्पताल की दाइयों के मुँह से निकलने वाले 'वेदवाक्यों' को जो सुन ले, वह अपनी खैर मना ले, वही बहुत है, यहाँ आकर ईश्वर भी रोता होगा अपने ही बंदों की करतूतें देखकर. सूनी गोद को मासूम किलकारियों से भर देने का वादा करने वाली हैदराबाद की उन स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा सुनियोजित ढंग से बच्चों को बेचने का जो मामला प्रकाश में आया है, वह हृदय विदारक है. इन यंत्रणा गृहों के बीमार बच्चों को अस्पताल लाया गया तो उसमें से कई बच्चे कुपोषण, चेचक, खसरा एवं हृदय की बीमारी से ग्रस्त थे. कई मासूम तो अस्पतालों में दम भी तोड़ चुके हैं, पर इन्हें विदेशी हाथों में बेचने का जो धंधा इन स्वयंसेवी संस्थाओं ने किया है, वह अक्षम्य है. निश्चित रूप से उन बच्चों का इस्तेमाल मानव अंग बेचने के लिऐ किया जाता होगा.
गरीबी, भूख और बेकारी ही इन बच्चों को यहाँ तक ले आती है. माता-पिता जब अपने कलेजे के टुकड़े की परवरिश नहीं कर पाते, तो उन मासूमों को सरकार से मान्यता प्राप्त इन स्वयंसेवी संस्थाओं को बेच देते हैं, ताकि मासूम पल जाए. पर यहाँ मासूम पलते नहीं बेच दिए जाते हैं. सभी जानते हैं कि किसी बच्चे को गोद लेने की एक लंबी प्रक्रिया है. इसी में कोई खामी ऐसी है जो मासूमों की तिजारत को बढ़ावा देती है. हाल ही में जिन दो संस्थाओं में छापे मारकर मासूमों को बरामद किया गया, उसमें से एक संस्थान के खिलाफ कतिपय शिकायतों के कारण उसकी मान्यता रद्द कर दी गई थी. फिर उसे दोबारा मान्यता मिल जाना क्या हमारी सड़ी-गली व्यवस्था को उजागर नहीं करता? सरकारी फाइलों में उक्त सारे संस्थान पूरी तरह से 'फिट' हैं, फिर क्या कारण है कि यहाँ से बरामद किए गए बच्चे मलेरिया, कुपोषण, चेचक, खसरा आदि बीमारी से ग्रस्त हैं. निश्चित ही यह संस्थान सरकारी कर्मचारियों एवं अधिकारियों के लिऐ अतिरिक्त आय का साधन होंगे, तभी तो इतनी बड़ी बात हो गई. पर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के पास ऐसा कोई कम्प्यूटर नहीं है, जो बता सके कि मासूमों का अंग निकालने में उसे कितनी पीड़ा होती होगी. माता-पिता से बिछुड़कर वे किस तरह सूनी गोद को भरते होंगे? पर वे 'गोदें' भी व्यापारी निकलीं.
उन सेवाभावी संगठनों के लिए कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होगा कि उन्हें किस तरह की सजा दी जाए. पर समाज की दृष्टि में वह ऐसा घृणित व्यापार है, जिसकी सजा ऐसी हो कि कोई दूसरा उस तरह के व्यापार करने की हिम्मत न कर सके. पर ऐसे व्यापार समाज में जारी हैं और रहेंगे. कानून इनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता. हमारे सामाजिक ढाँचे में क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत है. आज कानून धनपतियों के हाथ का खिलौना मात्र बनकर रह गया है. यही कानून गरीबों के लिये बहुत सख्त है, पर धन के आगे यही लचीला होकर उन्हें संरक्षण देता है, इसलिए धनपति कानून से डरते नहीं बल्कि उसे जेब में रखने की बात करते हैं.
क्या कारण है कि चारा घोटाले के प्रमुख आरोपी लालू यादव परोक्ष रूप से बिहार का शासन चला रहे हैं? इस कांड के कई गवाह अब तक मौत के घाट उतारे जा चुके हैं. नरसंहारों का अंतहीन सिलसिला अब भी जारी है. लोग मर रहे हैं, कट रहे हैं, पर कानून अभी तक उनके पास फटका तक नहीं. करोड़ों रुपए का घालमेल करने वाले हर्षद मेहता को क्या सजा मिली? मुम्बई बमकांड के अभियुक्त को सजा मिलते क्या हमारी कोई पीढ़ी देख पाएगी? बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के आरोपियों को अदालत क्या मानती है? हवाला कांड की हवा निकल गई. गरीबों के सपने बेचकर न जाने कितनी फाइनेंस कंपनियाँ अंधेरे में खो गईं, है कोई ऐसी रौशनी, जिससे ढूँढ़ा जाए ऐसे महानुभावों को?
इसी तरह इस देश में मासूमों की बिक्री के माध्यम से मानव अंगों का व्यापार चलता रहेगा. लड़कियाँ माँ की कोख में ही दम तोड़ती रहेंगी, गरीबी, भूख, बेकारी के कारण लड़कियाँ बिकती रहेंगी और कोठे की शान बनती रहेंगी. युवा पीढ़ी नशे की आग में जलती रहेंगी, फिर भी इसके पीछे के काले चेहरे कभी सामने आए हैं और न आएँगे. हरदम गूँजती रहेंगी, पीड़ाओं एवं वेदनाओं की अनसुनी चीखें....
- डॉ. महेश परिमल

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