बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

मन्‍नू भंडारी की कहानी अकेली

अकेली एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। कहानीकार ने कहानी के पात्र सोमा बुआ की मनोव्‍यथा का बडा मार्मिक चित्रण किया है।

नागार्जुन की कविता अकाल और उसके बाद

कवि नागार्जुन की इस क‍विता में अकाल और उसके बाद की स्थिति का वर्णन किया गया है कि किस तरह अकाल का प्रभाव न केवल घर के लोगों पर पडता है, बल्कि छोटे छोटे जीवधारी भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते हैं।

अपना पासवर्ड डायरी में अवश्य लिखें

डॉ. महेश परिमल
आज का युग डीजिटल है। सब कुछ कंप्यूटर में कैद होने लगा है। कंप्यूटर का छोटा संस्करण मोबाइल के रूप में हमारी हथेली में है। मोबाइलधारकों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा होता जा रहा है। अब बैंकों के कई काम भी इसी मोबाइल के माध्यम से होने लगे हैं। इसमें नेट बैंकिंग प्रमुख है। इन सुविधाओं के साथ कुछ समस्याएं भी सामने आ रही हैं। कुछ दिन पहले मेरे एक साथी का अचानक ही हृदयाघात से देहांत हो गया। अब उसके परिवार वाले इस बात को लेकर चिंतित है कि उनके सारे पासवर्ड कहां से लाएँ। िमत्र अपना अधिकांश कार्य कंप्यूटर के माध्यम से करते थे। इसमें नेट बैंकिंग प्रमुख था। अब उनके न रहने पर पासवर्ड परिवार के किसी सदस्य को नहीं मालूम। अब परिजनों को यह पता नहीं चल पा रहा है कि टैक्स, प्रीमियम, लोन आदि की जानकारी किस तरह से प्राप्त की जाए? इसलिए अब यह कहा जा रहा है कि यदि आप नेट बैंकिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो अपना पासवर्ड, वेबसाइट आदि की जानकारी एक डायरी में लिखकर रखें, ताकि उनके न रहने पर परिजनों को किसी तरह की परेशानी न हो।
आज के डीजिटल युग में एक नई समस्या उभरकर सामने आई है। इसमें इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोग शामिल है। सामान्य रूप से हम अपना पासवर्ड, यूजर्स नेम आदि गोपनीय रखते हैं। हमें शुरू से ही यही कहा गया है कि अपना पासवर्ड किसी को भी न बताया जाए। पत्नी को भी नहीं। यह गोपनीय है, इसकी गोपनीयता बनाए रखी जाए। ऐसी स्थिति में हमारा वह अपना अचानक ही हमारे बीच न रहे, तो फिर उनके बैंक एकाउंट से लेकर अन्य कई लेन-देन की जानकारी उनके साथ ही चली जाती है। ऐेसे में अब यह सलाह दी जाने लगी है कि अपना यूजर्स नेम,पासवर्ड आदि एक डायरी में अवश्य लिखकर रखेे। इसी तरह इंटरनेट पर भी किए जाने वाले कार्यों की जानकारी भी एक डायरी में लिखी होनी चाहिए। निजी बैंक तो अपने उपभोक्ता को हर महीने बैंक स्टेटमेंट भेजती हैं, पर सरकारी बैंकें ऐसा नहीं कर पाती। इसलिए परिवार वालों को यह पता ही नहीं होता कि घर के मुखिया का एकाउंट कहां-कहां है। उसमें कितनी राशि है। एकाउंट से किस तरह के बिलों का भुगतान हर महीने इंटरनेट बैंकिंग के तहत किया जाता है। हाल ही एक घटना हुई, जिसमें इंटरनेट पर पे-पाल में एक व्यक्ति ने खाता खुलवाया। उसमें विदेशी करेंसी ट्रांसफर हो सकती थी। पे-पाल में खाता खुलवाने वाला यदि चाहे, तो अपने अन्य किसी खाते में राशि ट्रांसफर कर सकता था। घर में किसी को इस संबंध में पता नहीं था। अचानक उस व्यक्ति की मौत हो गई। तब उसके परिजनों को बैंक से खाते का स्टेटमेंट मिला। पर पे-पाल से सभी अनजान थे। एक बार परिवार के एक सदस्य को बैंक स्टेटमेंट देखते हुए यह खयाल आया है कि पे-पाल से खाते में धनराशि जमा हुई है। पहले तो पे-पाल क्या है, यही पता नहीं था, जब पता चला कि पे-पाल से खाते में डॉलर जमा हुए हैं। तब पे-पाल के एकाउंट के संबंध में जांच हुई। पे-पाल पर 5-6 बार यूजर नेम और पासवर्ड के लिए प्रयास किया गया। इसे पे-पाल ने यही समझा कि कोई हेकर्स इस तरह का प्रयास कर रहा है। इससे एकाउंट अपने ही आप ब्लॉक हो गया। पे-पाल को ई मेल कर कई तरह की जानकारियां दी गई। पहले तो पे-पाल ने कोई जवाब नहीं दिया, पर जब इफर्मेशन टेक्नालॉजी एक्ट के माध्यम से नोटिस दिया गया और अपना ई मेल भेजा गया, तो पे-पाल से सहयोग करते हुए वन टाइम पासवर्ड भेजा, जिससे पता चला कि खाते में 1500 डॉलर हैं। अंतत: वह राशि अन्य खाते में ट्रांसफर कर दी गई।
यह दुर्भाग्य है कि कितने ही खाते न्यूनतम बेलेंस के साथ बरसों से बैंकों में पड़े रहते हैं। कितनी ही बैंकें हर 6 महीने में खातेदार को स्टेटमेंट भेजती हैं, पर सरकारी बैंकें ऐसा नहीं कर पाती। फलस्वरूप कई खातों में ब्याज की राशि जुड़ती चली जाती है और राशि दोगुनी भी हो जाती है। यही हाल आजकल पीएफ खाते का भी है। यदि आपने कहीं एक साल काम किया है, तो आपके खाते में कितनी राशि है, इसकी जानकारी पीएफ विभाग से नहीं मिलती। इस तरह से कई लोगों की राशि जमा होते हुए भी सही व्यक्ति को नहीं मिल पाती। इसलिए यह प्रावधान होना चाहिए कि यदि किसी व्यक्ति की एक निश्चित राशि कहीं जमा हो रही है, तो उसे स्टेटमेंट भेजकर व्यक्ति को इसकी जानकारी देते रहना चाहिए।
डेटा जनरेटर:-अाजकल जब हर कोई डीजिटल के साथ-साथ चल रहा है, तो हम यह मानकर चलें कि हम भी डेटा जनरेटर के साथ-साथ डेटा ट्रांसमीटर्स भी हैं। सोशल नेटवर्किंग हो या फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन हो या तीन-चार ई मेल एकाउंट हो, परंतु इस सब से जुड़े डेटा स्टोरेज को भी महत्व दिया जाए। जिनके डेटा स्टोरेज उड़ जाते हैं, उनके पास सर पकड़कर रोने के सिवाय और कोई चारा नहीं होता। गूगल-याहू जैसे ज्वाइंट सर्च इंजन डेटा स्टोरेज जैसी सुविधाएं देते हैं। अापके कंप्यूटर में भी यदि आवश्यकता से अधिक डेटा हों, तो आप उसे गूगल या याहू के डेटा स्टोरेज पर डाल सकते हैं। डेस्कटॉप की बिक्री घटी:- स्मार्ट फोन, टेबलेट और लेपटॉप की मांग बढ़ने से डेस्कटॉप काे अब कोई पूछने वाला नहीं रह गया है। पहले जो घर पर डेस्कटॉप पर काम करते थे, वे अब लेपटॉप का इस्तेमाल करने लगे हैं। जिन्हें अपने काम से दिन भर घर से बाहर रहना हो, तो उनके लिए लेपटॉप से सुविधा रहती है। इसलिए लोग अब डेस्कटॉप का इस्तेमाल नहीं करते। इससे उसकी बिक्री प्रभावित होने लगी है। अब इसकी बिक्री में 10 प्रतिशत की कमी देखी गई है। एक साल पहले जो डेक्सटॉप का बाजार 25,117 करोड़ रुपप का था, वह घटकर 21,058 करोड़ रुपए हो गया है। डेक्सटॉप की बिक्री घटने से इसका असर स्मार्टफोन पर पड़ा है। स्मार्ट फोन की बिक्री 33 प्रतिशत बढ़ी है। टेबलेट की बिक्री भी 4 प्रतिशत बढ़ी है इंटरनेट की सुविधा ने पूरे देश को एक हथेली में बंद कर दिया है। स्मार्टफोन के कारण अब लाेग ई कामर्स, ऑनलाइन ट्रांजेक्शन, ऑनलाइन शेयरबाजार ट्रेडिंग आदि आसानी से कर रहे हैं। अब फोर जी ने इस सुविधा को और भी आसान कर दिया है। इसका इस्तेमाल करने वाले भी निश्चित रूप से बढ़ेंगे। तब यह होगा कि लोग डाउनलोडिंग की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

कविता बाबुल की गलियॉं

इस कविता में बचपन की यादें समाई हुई हैं। हम कितने भी बडे हो जाएँ, माता पिता एवं अपनों के साथ्‍ा गुजारे बचपन के दिन कभी नहीं भूल सकते। ये दिन हमारे एकांत का खालीपन भरते हैं। इन्‍हीं यादों को कविता में उतारा गया है।

कहानी उपहार

लेखिका आरती रॉय की ये कहानी नारी विवशता को उजागर करती है। हमारा समाज आज विकास के पथ पर कितना भी आगे बढ जाए लेकिन पुरुष की नजरों में कहीं न कहीं वह केवल भोग्‍या की वस्‍तु ही है। इस विवशता को कहानी में उजागर करने का प्रयास किया गया है।

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

कविता युग जननी भारत माता

इस कविता में भारत माता देश के नौनिहालों से पुकार कर रही है और उन्‍हें देश के महापुरुषों जैसा बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

कविता लिखो नहीं इतिहास बनो तुम

श्रीकृष्‍ण सरलजी की ओजपूर्ण कविता लिखो नहीं इतिहास बनो तुम वास्‍तव में देश के नौजवानों के लिए एक आह़वान है कि वे देश्‍ा और समाज के प्रति अपना कर्तव्‍य समझें और उन्‍हें पूरा करने के लिए दृढप्रतिज्ञ बनें।

कविता धरती को श्रृंगार दो

क्रांतिकारी कवि श्रीकृष्‍ण सरल जी की कविता धरती को श्रृंगार दो को यहॉं प्रस्‍तुत किया गया है। यह कविता उनके काव्‍यप्रेम के साथ साथ देशप्रेम को भी उजागर करती है।

गीत आ जा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले

फिल्‍म चोरी चारी में अभिनेता राजकपूर एवं अभिनेत्री नरगिस पर फिल्‍माए गए गीत आ जा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले का संस्‍कृत अनुवाद आपका मन मोह लेगा। इसी विश्‍वास के साथ इसे यहाँ सहेजा गया है।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

कविता मैं अमर शहीदों का चारण

क्रांतिकारी कवि श्री कृष्ण सरल जी की यह देशप्रेम से भरी एक ओजपूर्ण कविता है। मैं अमर शहीदों का चारण कविता के माध्‍यम से वे देश के नौनिहालों में देशप्रेम जगाने का प्रयत्‍न करते हैं। देश के प्रति हमारे कर्तव्‍य की याद दिलाते हैं।

बाल कहानी तलवार और गीत

बच्‍चों की मासूमियत में वो सच्‍चाई और भोलापन होता है कि उसके सामने एक कठोर दिल भी पिघल जाता हैा जब सिकंदर दूसरे नगर में आक्रमण करने आता है, तो वहाँ के भोलेभाले बच्‍चों की मधुर मुस्‍कान और मासूमियत भरी बातें सुनकर उसका मन बदल जाता है और वह लडाई का इरादा त्‍याग देता है।

दाल बनी वीआईपी, सरकार निष्क्रिय

डाॅ. महेश परिमल
डिजिटल इंडिया का नारा लगाने वाली सरकार के सामने देखते ही देखते दाल आम आदमी की पहंुच से दूर हो गई। सरकार की निष्क्रियता सामने आ गई। अच्छे दिन की कल्पना करने वाले अब बुरे दिन भी देखने लगे। महंगी दाल ने दीवाली का उत्साह की खतम कर दिया है। लोगों को दिखाए जाने वाले सारे सपने दिवास्वप्न हो गए। सरकार न तो जमाखोरों पर अंकुश रख पाई और न ही मुनाफाखोरों पर किसी प्रकार की सख्ती दिखा पाई। प्रधानमंत्री का नारा ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ यहां आकर सच साबित हो रहा है। सचमुच दाल को भोजन की थाली से गायब पाकर अब यह सोचना जायज हो जाता है कि भोजन की थाली से अब क्या-क्या चीजें गायब होने वाली हैं। यह सच है कि सरकार भ्रष्ट नहीं है, पर भ्रष्टों का संरक्षण देना भी एक अपराध ही है, इस अपराध से मोदी सरकार खुद को अलग नहीं कर सकती। नेताओं को विवादास्पद बयान देने से ही फुरसत नहीं है। दाल के भाव को अंकुश में रखने के सारे सरकारी प्रयास विफल साबित हुए। अपने आप को साहसी सरकार कहने वाली यह सरकार दाल के बढ़ते दामों पर कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस के जमाने में दाल ने कीमतों के इतने ऊंचे ग्राफ नहीं छुए थे। इस सरकार ने हद ही कर दी।
जिन हिंदू संगठनों के बूते पर यह सरकार बनी है, अब वे ही सरकार का विरोध करने लगे हैं। यह भी तय है कि एक दिन यही समर्थक संगठन सरकार को मुसीबत में भी डाल सकते हैं। यह सब होगा, नेताओं के बेतुके बयानों से। क्योंकि इतनी सख्ती के बाद भी प्रधानमंत्री की सलाह को न कोई मान रहा है, न ही उसे गंभीरता से ले रहा है। एक तरफ स्वयं प्रधानमंत्री के बयान संयत होते हैं, वही दूसनेताओं के बयान आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। कभी आरएसएस के प्रमुख मोदी की विचारधारा के विरुद्ध बोलते हैं, तो कभी विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर बनाने के लिए विवादित बयान देती है। गौमांस के मामले पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि इस चक्कर में सरकार यह भूल गई कि महंगाई दबे पांव बढ़ गई है, उस पर लगाम कसनी है। इस दौरान जमाखोरों की तो बन आई। पूरे डेढ़ वर्ष के मोदी शासन में किसी जमाखोर या मुनाफाखोर पर सख्त कार्रवाई हुई, ऐसा न तो सुना गया और न ही पढ़ा गया। अनजाने में वह इन समाजविरोधी तबकों को संरक्षण ही दे रही है। ऐसे में भाजपा पर विश्वास कर वोट देने वाला मतदाता ठगा सा रह जाता है।

आज की महंगाई पर यदि किसी की जवाबदारी बनती है, तो वह है मोदी सरकार। यूपीए सरकार के तमाम सलाहकारों को बेदर्दी से हटा दिया गया। मंत्रियों के कार्यालयों में काम करने वाले कांग्रेस समर्थक सभी लोगों को हटा दिया गया। योजना आयोग पर ताला लगा दिया। यह सब काम इसलिए किया गया कि मोदी सरकार स्वतंत्र होकर काम कर सके। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार महंगाई तो कम नहीं कर पाई, उल्टे महंगाई दोगुनी हो गई। जब प्रधानमंत्री स्वयं यह कहते हैं कि वे गरीबी में पले-बढ़े हैं, तो फिर उन्हें महंगाई क्या होती है, यह अच्छी तरह से पता होना चाहिए। जो गरीबी में पले-बढ़े होते हैं, वे ही जानते हैं कि महंगाई बढ़ने से इस परिवार पर क्या बीतती है? अपने नारों में प्रधानमंत्री निवेश, विदेशी निवेश, डिजिटल इंडिया, साइन इंडिया आदि शब्दों का उच्चारण करते हैं, तो लगता है कि यह तो आम आदमी की आवाज कतई नहीं है। विदेशी यदि भारत में निवेश करें, तो इससे आम आदमी को क्या? वह तो यही चाहता है कि किसी भी तरह से महंगाई कम हो। जीने लायक कमा सकें और आवश्यक वस्तुओं को खरीद सकें। विदेशों से अच्छे संबंध एक चुनौती है, पर उससे बड़ी चुनौती यह है कि देश में क्या चल रहा है, उसे भी जानना। आज हर तरफ महंगाई की ही चर्चा है, पर उसे कम करने के लिए किसी के पास कोई उपाय नहीं है। आज सरकार का संबंध आम आदमी से टूट गया है, जो आघातजनक है। सरकार की नजर डॉलर के भाव, सोनेे-चांदी के भाव, क्रूड के भाव आदि से हटती नहीं है। जीडीपी और मैनुफैक्चरिंग इंडेक्स की बातें करती थकती नहीं, परंतु अरहर की दाल के बढ़ते दाम जैसे सुलगते मुद्दे पर कोई कुछ करने को तैयार ही नहीं है। सरकार बातें बहुत कर रही है, पर अपने खिलाफ कुछ भी सुनना नहीं चाहती। एनडीए सरकार बनी, तब से सभी अच्छे दिनों की राह देख रहे हैं। पर अच्छे दिन एक सपना बनकर रह गया है। अब कमरतोड़ महंगाई सबका स्वागत करने लगी है। अाश्चर्य इस बात का है कि पहले पेट्रोल की कीमतों के साथ्ज्ञ महंगाई बढ़ती थी, अब तो पेट्रोल के दाम कम हो रहे हैं, अब जाकर स्थिर भी हो गए हैं, उसके बाद भी महंगाई लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार इतनी लापरवाह कैसे हो सकती है? सरकार को अपनी नाकामयाबी की शायद जानकारी नहीं है। अपनी छबि को उज्जवल करने के लिए प्रधानमंत्री विदेशों के दौरे कर रहे हैं। शायद उन्हें भी नहीं मालूम कि देश में क्या हो रहा है। अरहर दाल ने अन्य सभी दालों के दाम बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कई लोग यह तर्क दे रहे हैं कि महंगाई बढ़ने के साथ-साथ लोगों के वेतन में भी वृद्धि हुई है। पर वेतन में वृद्धि केवल सरकारी कर्मचारियों की हुई है। निजी कंपनियों के कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि एक विकसित देश में बढ़ती महंगाई पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है। पर जब क्रूड आयल के दामों में कमी आती है, तो उसका लाभ देश को जो मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पा रहा है। भाव कम होने का असर सुदूर गांव के एक ग्रामीण पर भी होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है। यह सरकार की अदूरदर्शिता है। सरकार को यह देखना चाहिए कि जब वह दाम कम करती है, तो वास्तव में दाम कम हो रहे हैं या नहीं। अमेरिका जैसे देशों में दूध, अंडे और ब्रेड की कीमतों मे पिछले 40 बरसों में मात्र कुछ सेंट की ही बढ़ोत्तरी हुई है। यदि हमारे देश में भी यह संभव होता है, तो यह सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। सरकार के पास अभी भी समय है, वह जमाखोरों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। जिससे उन्हें लगे कि दालों का संग्रह कर उन्होंने गलती की है, तो इसी गलती का अहसास उन्हें सरकार उन पर सख्ती लगाकर कराए, तो दाल के दाम अंकुश में लाने में देर नहीं होगी। इसके पहले भी देश को प्याज ने काफी रुलाया है। कांग्रेस की सरकार केवल प्याज के कारण ही चली भी गई। प्रधानमंत्री की बड़ी-बड़ी बातें अब लोगों को लुभा नहीं पा रही हैं। आम आदमी चाहता है कि वह अपने बच्चों की परवरिश सही तरीके से कर सके। इसीलिए उसने भाजपा को अपना कीमती वोट दिया था। अब यदि यह सरकार भी आम आदमी की न होकर व्यापारियों, मुनाफाखोरों और जमाखोरों की हो जाए, तो यह भारतीय जनता के लिए बहुत बड़ा धोखा है। सरकार इस दिशा में जितने भी सख्त कदम उठाए, उसका असर दीवाली तक तो नहीं पड़ेगा, यह तय है। इसका मतलब यही हुआ कि इस बार की दीवाली महंगाई के नाम रही।
डाॅ. महेश परिमल

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

तिन तिनक तुन तानी वाद्य यंत्रों की कहानी

इस लेख में संगीत से जुडे विविध वाद्य यंत्रों के बारे में जानकारी दी गई हैं। जो कि आप सभी के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी।

बाल कहानी पिंजरा खोलो

इस कहानी में तोते की उदारता का वर्णन किया गया है। पक्षी उन्‍मुक्‍त गगन में उडना चाहते हैं। वे मनुष्‍यों के बीच रहते अवश्‍य हैं लेकिन उनका असली ठिकाना गगन की ऊँचाई है। इसे छूकर ही वे खुश रह सकते हैंं। मानवीय मूल्‍यों से जुडी ये बाल कहानी मानवता का संदेश देती है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

बाल कविता हरीश परमार 1

छत्‍तीसगढ में हरीश परमार का नाम बाल साहित्‍यकार के रूप में जाना पहचाना है। उनकी कई कविताऍं क्षेत्रिय समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रही हैं। प्रस्‍तुत हैं उनकी कुछ कविताऍं -

बाल कहानी तेनालीराम ऊनी कम्‍बल

तेनालीराम के किस्‍से काफी मशहूर हैं। वे हमेशा अपनी चतुराई से साजिशों का पर्दाफाश कर देते हैंं। इस कहानी में उनकी इसी चतुराई को बताया गया है।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

बाल कहानी बिजली

बच्‍चों का अपना एक अनोखा संसार होता है। वे इस संसार में कुदरती नजारों को जब अपने जैसा ही देखते हैं तो खुश हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही इस कहानी में है। ये कहानी बच्‍चो को चांद तारों की अनोखी दुनिया में ले जाती है।

बाल कहानी रेगिस्‍तान की खुशी

बाल कहानी रेगिस्‍तान की खुशी इस कहानी में यह बताया गया है कि त्‍याग में ही खुशी है। अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन हमें दूसरों के लिए जीवन जीकर उसे सार्थकता प्रदान करनी चाहिए।

शाम ए गम की कसम तलत महमूद

शाम ए गम की कसम तलत महमूद को याद करते हुए लिखा गया एक जानकारीप्रद लेख है। जिसमें उनके संघर्ष के दिनों की कुछ झलकियाँ दिखाई देती हैं। इस लेख को आवाज देते हुए आप तक पहुँचाने की एक कोशिश हमने की है।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

सिबाका गीतमाला की कहानी अमीन सयानी की जुबानी

इस ऑडियो में अमीन सयानी ने सिबाका गीतमाला की शुरूआत की कहानी बताते हुए 1955 के आसपास के हिट गीतों की जानकारी दी है और वे गीत सुनाए भी हैं। आप भी इन गीतों का मजा लीजिए।

राम अधीर जी के काव्‍य गीत

राम अधीर जी साहित्‍यजगत में एक जाना पहचाना नाम है। उनकी कुछ कविताओं को यहॉं आवाज दी गई है। उन्‍होंने अपने काव्‍य गीतों में सरस, सरल और सहज शब्‍दों का प्रयोग किया है। जो मन को छू लेते हैं।

कहानी खेत में मणि

बाल कहानी खेत में मणि के माध्‍यम से यह बताया गया है कि मेहनत और ईमानदारी का फल हमेशा अच्‍छा होता है। जीवन में सच्‍चाई का साथ निभानेवाला व्‍यक्ति कभी दुखी नहीं होता।

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

कहानी दुख का अधिकार


हिंदी कहानी दुख का अधिकार
 लेखक यशपाल की इस कहानी में जीवन की सच्‍चाई को बडे सहज एवं सरल तरीके से व्‍यक्‍त किया गया है। अमीर और गरीब के बीच केवल धन दौलत की दीवार नहीं होती दकियानूसी विचारों की दीवार भी होती है ।

निराधार हुआ आधार

डॉ. महेश परिमल
सबसे पहले जब उद्योगपति नंदन नीलकेणी ने पिछली सरकार के सामने एक भारतीय की अपनी पहचान के लिए एक प्रस्ताव रखा कि हम भारतीयों के नाम में समानता हो सकती है, पर यदि अपनी पहचान कायम करने के लिए यदि सभी के अलग-अलग नम्बर हों, जिसके आधार पर उसकी पहचान स्थापित हो सके। तो सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए सभी के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया। धीरे-धीरे यह हर भारतीय की पहचान बनने लगा। इससे आगे बढ़ते हुए भाजपा सरकार ने इसे उपभोक्ता के बैंक खाते से जोड़ने के लिए कदम उठाया। इससे समूचे देश में एक क्रांति ही आ गई। हर तरफ आधार कार्ड की ही चर्चा होने लगी। साथ-साथ इसमें की गई गलतियों एवं लापरवाहियों के किस्से भी आम हो गए। लेकिन एक बात यह ठीक रही कि इससे उपभोक्ता के खाते में सबसिडी की राशि सीधे जमा होने लगी। पर तभी सुप्रीमकोर्ट ने यह आदेश दिया कि आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया जा सकता। इससे लोगों में एक तरह की बेचैनी देखी गई। काफी जद्दोजहद से बना था आधार कार्ड, लेकिन उसकी उपयोगिता को अनदेखा कर दिया गया। अब अाधार कार्ड की हालत यह है कि यह अपनी पहचान बनाते-बनाते स्वयं ही निराधार हो गया। एक तरफ डिजिटल इंडिया के लिए सरकार हाय-तौबा मचा रही है, तो दूसरी तरफ डायरेक्ट केश ट्रांसफर के साथ जुड़ी आधार कार्ड योजना के संबंध में लापरवाह हो गई है। सरकार की सबसिडी की राशि सीधे उपभोक्ता के खाते में चली जाए, इसके लिए आधार कार्ड को सीधे बैंक खाते से जोड़ दिया गया। आधार कार्ड पाकर लोग स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। लोग इसे हाईप्रोफाइल मानने लगे। लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने अपने निर्णय में यह कहा कि प्रजा का यह बायोमेट्रिक डाटा सुरक्षित नहीं है। इस जानकारी को गोपनीय भी नहीं रखा जा सकता। सुप्रीमकोर्ट ने सबसिडी जमा करने के लिए आधार कार्ड को उपयोगी माना। परंतु इसके अन्य क्षेत्रों में उपयोग के लिए अनुपयोगी माना। इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है कि इसे अन्य क्षेत्रों में भी उपयोग में लाया जाए या नहीं। आधार कार्ड की योजना सभी क्षेत्रों में जारी रखी जाए या नहीं, इस आशय का सुझाव सेबी, आरबीआई, एलआईसी, ट्राई एवं आयकर आदि ने दिए हैं। इस तरह से देखते ही देखते आधार कार्ड जीवन का ही आधार बन गया। लोग इसके लिए लम्बी-लम्बी लाइनों में खड़े रहकर, परेशान होकर अपना कार्ड बनवाने लगे। सब कुछ अच्छे से चल रहा था कि अचानक ही एक जनहित याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने यह फैसला दिया कि आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। इस फैसले से लोगों की आशाओं पर मानों तुषारापात हो गया। आधार कार्ड को कांग्रेस अपना गेम चेंजर समझती थी, परंतु लोकसभा चुनाव में वह इसे पूरी तरह से भुना नहीं पाई। कांग्रेस के इस कार्य को भाजपा सरकार ने भुनाने का प्रयास किया, इसमें काफी हद से कामयाब भी रही।


सरकार डायरेक्ट बेनीफीट ट्रांसफर स्कीम को आधार कार्ड के साथ जोड़ना चाहती थी, परंतु इसके लिए कोई योजना तैयार नहीं कर पाई। एक योजना के अंतर्गत यह प्लान था कि सरकार की तरफ से मिलने वाले लाभ को सीधे उपभोक्ता के बैंक खाते में डाल दिया जाए। यूपीए सरकार इस योजना में विफल साबित हुई। सभी यही सोच रहे थे कि एनडीए सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस नाकामयाब योजना को ताक पर रख देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। आधार कार्ड का आइडिया देने वाले नंदन नीलकेणी मोदी को इसकी उपयोगिता को समझाने में सफल रहे। उन्होंने बताया कि आधार कार्ड से अभी भले नहीं, पर भविष्य में इसके चमकात्कारिक परिणाम सामने आ सकते हैं। इसके बाद इस आधार कार्ड को जोरदार सफलता मिलने लगी। एलपीजी सबसिडी आदि की राशि सीधे ग्राहक के खाते में जमा होने लगी। जन धन योजना के अंतर्गत 28 अगस्त तक 17.74 करोड़ बचत खाता बैंकों में खुले थे। इसमें से 22 हजार करोड़ की राशि जमा भी हो गई। ये सभी खाते आधार कार्ड के साथ जोड़ दिए गए थे। 3 लाख 515 हजार 634 परमानेंट एकाउंट नम्बर (पेनकार्ड) आधार कार्ड के साथ जुड़ गए। आधार कार्ड का दूसरा लाभ यह हुआ कि बैंक एकाउंट ख्ुलवाना, पासपोर्ट बनवाना आदि अन्य सरकारी कामों में भी इसका उपयोग होने लगा था। सरकार को आधार कार्ड के उपयोग को एक सीमा में रखने के बजाए राज्यों में कितने बोगस राशन कार्ड हैं, इसकी जांच कर उसे रद्द करने का काम करना चाहिए।
आधार का आधार पहले तो स्पष्ट था, इसके कारण कई बोगस उपभोक्ताओं की पहचान हो गई। भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया। इससे प्रजा का धन योग्य हाथों में जाना शुरू हो गया। आधार कार्ड के कारण यह स्पष्ट हुआ कि 2011 में आंध्र प्रदेश में जब जनसंख्या की गणना हुई, तो पता चला कि जितने राशन कार्ड हैं, उससे अधिक उस राज्य की आबादी है। यानी की आबादी से कई गुना राशन कार्ड थे। इससे बिचौलियों का आधार खत्म हो गया। इन्हीं के कारण सरकार द्वारा दिया जाने वाला लाभ सही हाथों तक नहीं पहुंच पाता था। इससे कई फायदे हुए। लेकिन जो पहले सरकारी सहायता को लोगों तक नहीं पहुंचने देना चाहते थे, वही लोग इससे घबराने लगे। वही लोग जनहित याचिका लगाकर उसे एक बेकार योजना बनाने में लगे हुए हैं। आधार कार्ड जैसी योजना बार-बार देखने को नहीं मिलती। जब तक लार्जर बैंक कोई निर्णय न ले, तब तक आधार कार्ड केवल एलपीजी, केरोसीन और अनाज की सबसिडी में काम में लाई जा सकती है। इससे भले ही सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। लेकिन इसके लाभ को देखते हुए इसे जारी रखना चाहिए। ताकि सरकारी लाभ का फायदा सीधे हितग्राहियों को ही मिले।
डॉ. महेश परिमल

हरीश परमार की कविताऍं

छत्‍तीसगढ के साहित्यकारों में हरीश परमार एक जाना पहचाना नाम है। उनकी कविताएँ विशेष रूप से बाल कविताऍं काफी सराहनीय हैं। यहॉं पर उनकी कुछ जीवन की सच्‍चाई से जुडी कविताएँ आप सुन सकते हैं।

बाल कविता मेरा घर

बाल कविता मेरा घर एक मासूम चिडिया का संसार कितना छोटा होता है और धीरे धीरे बढता जाता है। इसी बात को इस कविता में बताया है एक मासूम आवाज ने।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

खुशबू का रंग

कहानी खुशबू का रंग 38 साल पहले सारिका में प्रकाशित नासिरा शर्मा की यह कहानी जेहन में चल रही थ्‍ाी। जिसे आज आवाज देते हुए रोमांचित हूँ।

दुष्‍यंत कुमार की गजलें

हिंदी गजलों में दुष्‍यंत कुमार का नाम सर्वोपर‍‍ि है। उनकी गजलें आज भी प्रासंगिक हैंं।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

एक था चूजा

एक था चूजा - यह कहानी, कविता की तर्ज पर तुकबंदी के साथ लिखी गई है। जिसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि किस तरह से माँ की बात न मानने पर बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जब उन्‍हें अपनी गलती पता चलती है, तब तक देर हो चुकी होती है। भारती परिमल







स्कूल का अंतिम दिन




आज के बच्चे स्कूल जाकर वहाँ इतने रम जाते हैं कि वे स्कूल छोड़ना ही नहीं चाहते। 12 पास करने के बाद भी वे अपनी स्कूल की यादें दिल से नहीं भुला पाते हैं। एेसी ही एक 12 वीं पास युवती की जुबानी सुनें कि वह क्यों स्कूल छोड़ना नहीं चाहती। यह कविता है भारती परिमल की और उसे पढ़ा है उनकी बेटी अन्यूता परिमल ने

सुलगते सवालों के मुहाने पर हम!

डॉ. महेश परिमल
 इस समय देश का माहौल कुछ बदला-बदला-सा लग रहा है। नेताओं की जुबानें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। जुबानी-जंग तेज से तेजतर होती जा रही हैं। लोग स्वयं को असुरक्षित समझने लगे हैं। कोई मकान बदल रहा है, तो कोई शहर। कोई अपने घर में राशन भर रहा है, तो कोई बच्चों को विदेश भेज रहा है। ये सारे ताम-झाम केवल स्वयं और परिवार की सुरक्षा को लेकर हो रहा है। हिंदू-मुस्लिम के नाम पर दोनों को अलग करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जा रही है। ऐसा लगता है कि भीतर ही भीतर कुछ पक रहा है। कुछ ऐसी तैयािरयां हो रही हैं, जो इसके पहले कभी नहीं हुई। लोग परस्पर संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। सब अपने में ही मस्त हैं। टीवी पर चीखते लोग ऐसे लगते हैं, मानों पूरे देश में आग लगा देंगे। अखबार भी कम नहीं हैं। एक छोटी-सी खबर को भी बहुत बड़ा स्थान देकर उसे तूल दिया जा रहा है। कोई किसी का सरमायादार नहीं बनना चाहता। विश्वास नाम की चीज तो रह ही नहीं गई है। ऐसा माहौल पहले कभी देखने को नहीं मिला। अभी कुछ ही दिन पहले एक मित्र ने अपने प्रावीडेंस फंड से कुछ राशि निकाली। उस राशि से उसने घर में दो महीने का राशन भर लिया। मुझे आश्चर्य हुआ। इसका कारण जानना चाहा, तो उसने साफ-साफ कहा-इस देश में अब कभी-भी कुछ भी हो सकता है। हो सकता है, लंबा कर्फ्यू ही लग जाए। इसलिए बच्चों के लिए कुछ तो रखना ही होगा। मुझे समझ में नहीं आया कि आखिर माजरा क्या है। इस देश को काफी लंबे समय बाद बहुमत वाली सरकार मिली है। सरकार का वादा है कि वह जाति,धर्म आदि से उठकर काम करेगी। सबका विकास करेगी। ऐसा होता दिखाई भी दे रहा है, तो फिर अराजकता का माहौल क्यों दिखाई दे रहा है? कहीं तो ऐसा कुछ है, जो बाहर से दिखाई नहीं दे रहा है, पर भीतर ही भीतर सुलग रहा है। इस बीच नेताओं के बयान पर कोई अंकुश नहीं है। वे कुछ भी बोल रहे हैं, तो मीडिया को मसाला मिल रहा है। कहीं किसी के मुंह से कुछ गलत निकला कि वह मुद्दा बन जाता है। कहने वाला तो एक ही बार कहता है, फिर मीडिया उसे दिन में करीब 100 बार कहलवा देता है। इससे माहौल बिगड़ते देर नहीं लगती। देखा जाए, तो संयम तो कहीं किसी में दिखाई नहीं दे रहा है। अंकुश के अभाव में लोग एक-दूसरे को भड़काने में ही लगे हैं। सोशल मीडिया तो इस दिशा में एक कदम आगे जाकर काम करने लगा है। अफवाहें फैलाने में इससे बड़ा कोई माध्यम ही नहीं है। यूं तो सोशल मीडिया ज्ञान का खजाना है, पर इस खजाने का दुरुपयाेग ही अधिक हो रहा है। आपसी सद्भाव अब दुर्लभ हो गया है। इक्का-दुक्का कुछ खबरें आ जरूर रही हैं, पर वह समुद्र में एक बूंद की तरह है। बच्चों में प्रतिस्पर्धा के नाम पर कुछ ऐसे संस्कार डाल दिए गए हैं कि दूसरे नम्बर पर आने पर वह यही कहता पाया जाता है कि टीचर नेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे पक्षपात किया। काेई भी किसी के निर्णय से संतुष्ट ही नहीं है। हर कोई अपना मुकाम खुद ही बनाना चाहता है। बच्चों में यह सब कुछ आ रहा है, बड़ों के माध्यम से। बच्चे जो देख-सुन रहे हैं, उसे ही अपने जीवन में उतार रहे हैं। संस्कार के साधन अब माता-पिता ही नहीं, बल्कि मोबाइल-टीवी हो गए हैं। आकाशीय मार्ग से मिलने वाले इस ज्ञान से बच्चे कुछ अलग ही तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं। स्कूलों में हर बच्चा आक्रामक ही दिखाई दे रहा है। सभी की नसें तनी हुई होती हैं। इसकी वजह होम वर्क तो कतई नहीं है। पर वे भी स्वयं पर काबू नहीं रख पा रहे हैं। घर में कोई भी इलेक्ट्राॅनिक चीज बच्चों की सहमति के बिना आ ही नहीं सकती। बच्चे बड़ों के काम में दखल देने लगे हैं, पर उन्हें अपने काम में बड़ों का दखल कतई मंजूर नहीं। हर कोई अपने ही आस्मां में कैद रहकर अपना रास्ता खोज रहा है। न तो उसे अपनी मंजिल का पता है और न ही उसे यह पता है कि उसे जाना कहां है? यदि जाना है, तो उसके पास जो संसाधन है, उससे वह अपनी मंजिल तक पहंुच सकता है? रही बात गांव, मोहल्ले, शहरों की, तो सभी जगह राजनीति ने ऐसी पैठ जमा ली है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। एक-दूसरे को नीचा दिखाना मानो राष्ट्रधर्म बन गया है। अपने को कोई कम आंकना ही नहीं चाहता। किसी भी किसी अपराध में पकड़ लिया जाए, तो उसकी पहंुच इतनी दूर तक होती है कि वह पुलिस हिरासत में पहुंचने के पहले ही रिहा हो जाता है। मामला थाने तक भी नहीं पहुंच पाता। ऐसा तो गांव, मोहल्ले में हो रहा है। पर जो राजधानी स्तर पर हो रहा है, उसकी तस्वीर बहुत ही भयानक है। छोटी से छोटी संस्थाओं के तार राजनेताओं से जुड़े हुए हैं। इन नेताओं के तेवर इतने अधिक सख्त हैं कि अपनी जीत के लिए वे कुछ भी कर सकने के लिए दल-बल के साथ तैयार हैं। हर नेता की अपनी तैयारी है। उनके अपने कार्यकर्ता हैं, जो एक आवाज पर लड़ने-मरने को उतारू हैं। मानों यह संकल्प ही ले लिया है कि अब की बार तो कोई बच ही नहीं पाएगा। बिहार चुनाव को लेकर इस समय काफी गर्मा-गर्मी भी दिखाई दे रही है। अभद्र भाषा का चलन ऐसा बढ़ गया है कि कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करना चाहता। माहौल ऐसा बन गया है कि दुश्मन को जीवित देखना भी पसंद नहीं है। दुश्मन का जिंदा रहना उनकी कायरता है। अपनी इस कायरता को कम करने के लिए वे कुछ ऐसा करने के लिए तैयार हैं, जिससे दुश्मन नेस्तनाबूत हो जाएं। देश की स्थायी सरकार में ही कुछ लोग ऐसे हैं, जो किसी का कहना नहीं मान रहे हैं। आपत्तिजनक बयानों के बाढ़ आ गई है। मुद्दा कोई भी हो, उसका तुरंत राजनीतिकरण हो जाता है। उसके बाद बयान दर बयान का सिलसिला चल निकलता है। उनके बयान इतने अधिक आक्रामक होते हैं कि लोग अपने वश में नहीं रह पाते। कुछ कर गुजरने की छटपटाहट बढ़ जाती है। अब साधू-संत भी इसमें पीछे नहीं रहे। उनके अंधभक्त भी इतने अधिक हिंसावादी हैं कि वे और कोई दूसरी भाषा न तो समझते हैं और न ही उन्हें शांति की भाषा आती है। हर दल का अपना एक अलग ही आक्रामक शाखा है, जो बस आदेश की प्रतीक्षा में है। उलझन भरे इस माहौल में आम आदमी का सांस लेना मुश्किल हो गया है। बदलते माहौल को लेकर हर कोई अपने तईं तैयारी कर ही रहा है। पर यह तय है कि कुछ हुआ, तो सबसे अधिक प्रभावित आम आदमी ही होगा। वही मारा जाएगा, उसके बच्चे मारे जाएंगे, उसका परिवार तबाह हो जाएगा। उच्च और मध्यम वर्ग तो अपनी तैयारी कर चुका है, अब निम्न वर्ग क्या करे? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सुलगते सवालों के मुहानों पर बैठा आज इंसान यह तय नहीं कर पा रहा है कि क्या किया जाए? संकीर्ण मानसिकता, ओछी राजनीति, तीखी हवाओं के बीच आम आदमी अपने वजूद को तलाश रहा है। इससे बचने की कोई राह दूर-दूर नहीं दिखाई नहीं दे रही है। क्या होगा इस देश का, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
 डॉ. महेश परिमल

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

बावरे मुहावरे

मुहावरों में वह शक्ति होती है, जो कई बार बहुत ही मारक होती है। कई बार ये लोगों को हँसा भी देते हैं। कई बार सौ बातों की अपेक्षा एक ही मुहावरा काफी होता है, अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी होने के लिए। कई मुहावरे तो आपस में विरोधाभासी भी होते हैं। ये हमारे जीेवन में हमेशा काम आते हैं। आओ, मुहावरों की इस दुनिया में थोड़ी देर के लिए, सच में बहुत मजा आएगा....



hindi poem international womensday

नारी जीवन से जुड़ी सच्चाई को दर्शाती एक कविता


दिव्य दृष्टि - एक परिचय और एक नई शुरूआत

आज से नियमित तौर पर सुनें हिंदी पॉडकास्ट - हर विषय और हर रंग में.

हम शुरुआत कर रहे हैं अपना परिचय और अपने काम के बारे में आपको बता कर :


शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

विरोध नहीं, उसकी जड़ की पड़ताल हो

डॉ. महेश परिमल
चिड़िया जैसी कद का एक खूबसूरत स्पेनिश पक्षी होता है, जिसका नाम है केनेरी। 300 वर्ष पहले जब कोयले की खानों में काम करने वाले खनिक मजदूर अपने काम के लिए जाते थे, तब अपने साथ इस केनेरी पक्षी को भी ले जाते थे। इस पक्षी की यह विशेषता हाेती है कि खदानों से निकलने वाली मिथेन जैसी जहरीली गैस को सबसे पहले यही पक्षी महसूस करता है, थोड़ी-सी गंध से ही इस पक्षी का दम घुटने लग जाता है। कुछ देर बाद इसकी मौत हो जाती थी। इससे मजदूर समझ जाते थे कि कहां पर मिथेन गैस की बहुतायत है। एक पक्षी की अकाल मृत्यु से कई मजदूरों की जान बच जाती थी। समाज में रहने वाले सर्जक, लेखक, कलाकार या फिर कवि ये सभी अपने आसपास के समाज के केनेरी पक्षी की तरह होते हैं। अपने समय या देशकाल के आंतरिक सत्य को ये सबसे पहले महसूस करते हैं। उसके बाद अपने विचार समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं। आम जनता अपने आसपास फैली जहरीली हवाओं को पहचान नहीं पाती, इसलिए ये समाज के संवेदनशील लोग केनेरी पक्षी की भूमिका अदा करते हैँ। अपने जान जोखिम में डालकर ये लोगों को सचेत करते हैं कि आने वाला समय काफी संवेदनशील है, जो खतरनाक भी हो सकता है। इसलिए सचेत हो जाएं। लोगों को सचेत करने वाले यही सर्जक, कवि, कलाकार, लेखक अपनी इसी ख्ूबी के कारण समाज के पहरुए का काम करते हैं। इसलिए इनका स्थान विशिष्ट होता है। इस समय ये काम नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने किया है। स्वयं को मिले सम्मान सरकार को लौटाते हुए इन्होंने अपनी तरफ से विरोध का स्वर मुखर किया है। इस स्वर में वह पीड़ा प्रस्फुटित होती है, जो उनकी पहचान है।
इस समय देश में जो कुछ भी हो रहा है, वह एक संवेदनशील समाज के लिए घातक है। इससे बौद्धिक वर्ग कुछ अनमना-सा महसूस कर रहा है। विख्यात साहित्यकार नयनतारा सहगल ने कितनी ही समस्याओं को लेकर देश के प्रधानमंत्री और अन्य प्रबुद्ध वर्ग के मौन को लेकर अपना विरोध व्यक्त किया है। इस ओर सबका ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने की घोषणा भी कर दी है। उनका अनुसरण करते हुए अशोक वाजपेयी ने भी स्वयं को मिले पुरस्कार लौटा दिए हैं। स्वाभाविक है, कुछ लोग इसे भाजपाई खेमे के विरोध के रूप में देख रहे हों और इसे  राग कांग्रेसी’ बता रहे हों। पर क्या यह पूरा सच है? नयनतारा सहगल को कांग्रेसी कहकर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। भले ही वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी हों, पर केवल इसी कारण से उन्हें हाशिए पर नहीं डाला जा सकता। उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में भी है। पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान अपने उपन्यास ‘टाइम टू बी हेपी’ से खींचा। इसके बाद तो ‘स्टार्म इन चंडीगढ़’ ‘मिस्टेकन आईडेंटटिटी’ और ‘रिच लाइफ अस’ जैसे उपन्यासों के माध्यम ने साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। यही नहीं समय-समय पर उन्होंने सर्जनात्मक साहित्य के साथ-साथ अपने आसपास के राजनीतिक, सामाजिक अौर वैश्विक परिवेश पर भी अपने विचार व्यक्त करती रहीं हैं। नयनतारा जवाहर लाल नेहरू की भांजी है, इस आवरण से तो वे तभी मुक्त हो गई थीं, जब उन्होंने इंदिरा गांधी के शासन में उनका विरोध किया था। अपनी किताब इंदिरा गांधी इमर्जेंसी एंड स्टाइल में उन्होंने व्यक्तिपूजा, एकाधिकार के कारण लोकतंत्र की छटपटाहट को व्यक्त किया था। उस समय उनका यह रूप भाजपा को बहुत भला लगा था। स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने नयनतारा को एक ‘जाग्रत सर्जक’ ही एक जाग्रह प्रहरी हो सकता है, कहकर उनकी प्रशंसा की थी। वही नयनतारा अब भाजपा शासन की बुराई कर रहीं हैं, तो इसे कांग्रेसी राग कहा जा रहा है। किस तरह की दोहरी मानसिकता है लाेगों की? दूसरी ओर अशोक वाजपेयी को  हिंदी के ख्यातनाम कवि के रूप मे पहचाना जाता है। सरकार के कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला है उन्होंने। गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के लिए उन्होंने काफी काम किया है। उनका कार्यकाल कांग्रेस शासन में अधिक रहा, इसलिए लोग उन्हें ‘कांग्रेस कवि’ कहते हैं। परंतु जिनकी कविता के प्रशंसक अटल बिहारी वाजपेयी हों और उन्होंने ही अशोक जी को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया हो, तो फिर वे किस तरह से कांग्रेसी कवि हो गए? इसका जवाब किसी भाजपाई के पास नहीं है।
इन दोनों बुद्धिजीवियों ने वर्तमान राजनीतिक वातावरण में बढ़ रही धर्मांधता, मानवीय मूल्यों के हनन और स्वेच्छाचारी विचारधारा के अतिक्रमण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। यह एक चुनौतीभरा काम है। नयनतारा ने साहित्य अकादमी द्वारा मिले सम्मान को वापस करते हुए यह मुद्दा उठाया हे कि देश में स्थापित हितों के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की हत्या हो रही है,तब साहित्य अकादमी खामोश क्यों बैठी है? दादरी हत्या के मामले में प्रधानमंत्री अब तक मौन क्यों हैं? इस पर भी उन्होंने अपना विरोध मुखर किया है। नयनतारा ने इसके पहले कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी की हत्या, वामपंथी विचार गोविंद पानसरे की हत्या और सुधारवादी नेता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या का उल्लेख किया है। ये तीनोें बुद्धिजीवी अपने-अपने क्षेत्र में अपनी तरह का योगदान देते रहे हैं। तीनों की हत्या में समानता है। तीनों ही मामले में धर्मांध लोगों को इनकी सक्रियता फूटी आंख नहीं सुहा रही थी। ये उनके लिए आंख की किरकिरी बन गए थे। एम.एम. कलबुर्गी भी साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे। अपने लेखन में उन्होंने समय-समय पर धार्मिक रूढ़ियों, उन्माद, क्रियाकांडों की निरर्थकता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर तीखा प्रहार भी किया था। मूर्ति में क्या कोई शक्ति है, इसकी जांच के लिए उन्होंने जो कुछ किया, उस पर विहिप और बजरंग दल वाले भड़क उठे, उनकी काफी आलोचना हुई। अंतत: 30 अगस्त को उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। गोविंद पानसरे महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत के साम्यवादी विचारक थे। राजनीतिक विचारधारा वामपंथी होने के कारण वे समाज की रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाते रहते। शिवाजी पर केंद्रित उनकी किताब काफी विवादास्पद हुई थी। शिवाजी पर उनके दृष्टिकोण से शिवसेना एवं अन्य धार्मिक कट्‌टरवादी संस्थाएं उनके विरोध में आ खड़ी हुई थीं। उन पर तीन बार प्राणघातक हमला हुआ। ऐसे ही एक हमले में गत फरवरी में वे अपनी जान गवां बैठे। इसी तरह नरेंद्र दाभोलकर भी समाज में फैली कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधश्रद्धा, क्रियाकांडों, धार्मिक पाखंडों आदि पर जमकर प्रहार करते। अपनी इसी प्रहारक क्षमता के कारण वे धर्म के नाम पर ढोंग करने वाले कथित बाबाओं के लिए परेशानी का कारण  बन गए थे। कितनी बार उन्हें जान से मारने की धमकी मिली। उन पर हमले भी हुए। अंधश्रद्धा निर्मूलन संबंधी विधेयक लाने के लिए वे पूरे महाराष्ट्र में अभियान चला रहे थे। इसके कारण कितने ही सांप्रदायिक संगठनों के निशाने पर आ गए थे। अंतत: उन्हें भी अपनी जान खोनी पड़ी।
उपरोक्त तीनों मामलों से एक बात यही निकलकर आती है कि क्या गोविंद पानसरे ने शिवाजी के प्रति अपने विचार रखने का अधिकार नहीं है। क्या वे अपनी नई नजर, नए तर्क से अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकते? मूर्ति में बसने वाले ईश्वर वास्तव में हमारे भीतर बसते हैं, ऐसा कहने वाले कलबुर्गी अपने ही बचपन में की गई नादानी का किस्सा बताते हैं, तो कुछ लोगों के सर पर आसमान क्यों टूट पड़ता है? यह ईश्वरीय तत्व का अपमान है या सत्य की तरफ ले जाने वाला एक नूतन अभिगम है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हम सभी को प्राप्त है। यह लोकतंत्र का प्राण है। इसके अलावा यह हिंदू धर्म का मर्म भी है। प्राचीन वेदग्रंथों में भी ब्रह्म को व्याख्यायित करने के लिए मंथन करने वाले शिष्यों को गुरु सतत ‘नेति...नेति’ कहकर सत्य की तरफ ले जाते रहे हैं। क्या उस समय उनके शिष्यों ने अपने गुरु पर हमला किया था। ब्रह्म यह नहीं है, ऐसा लगातार कहने वाले गुरु को हम नास्तिक कहने में जरा भी संकोच नहीं करते। विचारों की ताजगी को खुले रूप में स्वीकारना ही हिंदू धर्म का लचीलापन है। इसी लचीलेपन के कारण ही हिंदू धर्म हजारों साल के बाद भी पूरी शिद्दत के साथ अडिग है। इतने सारे आक्रमणों के बाद भी उसमें जरा भी विचलन नहीं आया है। उसकी अविचलता ही उसकी पहचान है। तो क्या आज यदि कुछ लोग ज्वलंत मामलों में अपना नया विचार रखते हैं, तो सचमुच हिंदू धर्म खतरे में पड़ जाएगा? यदि वास्तव में ऐसा होता, तो यह धर्म कब का नेस्तनाबूत हो चुका होता। नयनतारा सहगल हो या अशोक वाजपेयी, यदि वे अपना विरोध दर्ज करते हैं, तो उन्हें गंभीरता से सुनना ही होगा। आखिर उन्हें एेसा कहने और करने की नौबत क्यों आई, इस पर गहराई से विचार आवश्यक है। न कि उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर किसी तरह की टिप्पणी की जाए। समाज में यदि विरोध नहीं होगा, तो नए विचार कैसे आएंगे। विरोध तो सामाजिक विकास का अभिन्न अंग है। इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। यदि हमने विरोध को नहीं स्वीकारा, तो मंजीरों के शोर में हम भी क्रमश: तालिबानी मानसिकता के प्रभाव में आ जाएंगे। इसका हमें आभास भी नहीं होगा। विरोध को कुचलना समाधान नहीं है, बल्कि विरोधियों का हौसला बुलंद करना है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 19 सितंबर 2015

निवेश से ही बदलेंगे हालात


हरिभूमि में आज प्रकाशित  मेरा आलेख

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

बिहार चुनाव:ओवैसी ने बिगाड़ा समीकरण

डॉ. महेश परिमल
बिहार चुनाव के पहले लालू-नीतिश ने गठबंधन कर स्वयं को एक बताया था। बड़े गर्व से वे कह रहे थे कि ये महागठबंधन है, हम भाजपा की आंधी को रोक कर रहेंगे। इसी बीच इस महागठबंधन से मुलायम यादव अलग हो गए। उन्हें मनाने की काफी कोशिशें हुई, पर उन्हें असफलता ही मिली। अभी वे इस गम से उबर ही नहीं पाए थे कि अचानक बिहार चुनाव में ओवैसी ने अपना दांव खेला। इससे लालू-नीतिश चारों खाने चित्त हो गए। रही-सही साख पर बट्‌टा लग गया। जिस मुस्लिम मतों को लेकर वे इतना अधिक गरिया रहे थे, उसे मुलायम-ओवैसी ने इतना बड़ा झटका दिया कि दोनों कहीं के नहीं रहे। भाजपा के लिए ओवैसी एक तुरुप का पत्ता साबित हुए। 1970 के दशक में एक फिल्म आई थी, दुश्मन, जिसका एक गीत था ‘दुश्मन-दुश्मन, जो दोस्तों से प्यारा है’, आज यही गीत भाजपा के लिए सही साबित हो रहा है। ओवैसी को किसी भी तरह से अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनकी शख्सियत ही ऐसी है कि चाहकर भी कोई पार्टी उन्हें कम नहीं आंक सकती। इस समय बिहार चुनाव को लेकर भाजपा खेमे में खुशी का माहौल है। नीतिश-लालू के गठबंधन का ब्लड प्रेशर बढ़ गया है। ओवैसी अपनी वक्तृत्व कला से नीतिश-लालू के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं। ओवैसी केवल मुस्लिम मतों को अपनी तरफ कर सकते हैं, इसके अलावा उनकी आक्रामकता से भयभीत होने वाले हिंदू भी भाजपा का रुख कर सकते हैं। इससे नीतिश-लालू अलग-थलग पड़ जाएंगे, इसमें कोई दो मत नहीं।
भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, उसके पहले भारत के मुस्लिम जिन्ना की मुस्लिम लीग को अपना तारणहार मानती थी। पाकिस्तान बन जाने के बाद मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान चले गए। इसके बाद भारत में मुस्लिमों के मसीहा के भूमिका कांग्रेस ने निभाई थी। किसी सक्षम मुस्लिम नेता की अनुपस्थिति में भारत के मुस्लिम कांग्रेस के बाद समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल आदि तथाकथित सेकुलर पार्टियों को अपना समर्थन देते थे। मुलायम सिंह यादव, मायावती, ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव आदि हिंदू नेता मुस्लिम मतों पर अपना प्रभाव रखते थे। तथाकथित सेकुलर नेताओं ने काफी कोशिशें की कि भाजपा के विजय रथ को रोका जाए। पर ऐसा नहीं हो पाया। इन्हें एक ऐसे मुस्लिम नेता की आवश्यकता थी, जो अपने प्रभाव से मुस्लिम मतों पर अपनी ओर खींच सके। अपने भाषण से आग उगलते नेता ओवैसी पर सबकी नजर थी। आधुनिक भारत के 18 करोड़ मुसलमानों के नेता बनने की खूबियां ओवैसी में है। उनका जन्म हैदराबाद के मुस्लिम परिवार में हुआ। हैदराबाद में 35 से 40 प्रतिशत की आबादी मुस्लिमों की है। ओवैसी की शिक्षा हैदराबाद की पब्लिक स्कूल में हुई। इसी स्कूल में माइक्रोसाफ्ट के सीईओ सत्या नाडेला भी पढ़ चुके हैं। गांधीजी की तरह ओवैसी ने भी लंदन जाकर बैरिस्टर की परीक्षा पास की। 46 वर्षीय उर्दू और अंग्रेेजी धाराप्रवाह बोलते हैं। मुस्लिमों को उत्तेजित करने के लिए उनकी जुबान तलवार की तरह काम करती है। यह सभी जानते हैं। उनकी भाषा ही उनकी ताकत है, इससे भी कोई इंकार नहीं कर सकता।
असउद्दीन ओवैसी अपनी आक्रामक भाषा को माध्यम बनाकर एक राजनैतिक ताकत के रूप में उभरे हैं। मुस्लिमों को राजनैतिक रूप से संगठित कर उन्होंने मजलिस-ए-इत्तेहेदुल मुसलमिन (एकआईएम) नाम से अपनी पार्टी बनाई है। उनका गणित बहुत ही साफ है। उनके अनुसार भारत की कुल आबादी में 14 प्रतिशत मुस्लिम हैं, तो उन्हें संसद और अन्य राज्यों में भी 14 प्रतिशत सीट मिलनी चाहिए। ओवैसी मुस्लिम वोटों के जोर पर हैदराबाद में लाेकसभा चुनाव जीता। उनकी पार्टी ने तेेलंगाना विधानसभा में भी जीत हासिल की। अब वे मुस्लिमों के राष्ट्रीय नेता बनना चाहते हैं। देश की राजनैतिक पार्टियां पहले तो ओवैसी को हैदराबाद के मुस्लिम नेता के रूप में ही देखते थे। पर साल की शुरुआत में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने 24 प्रत्याशी खड़े किए थे। इनमें से दो ने जीेत हासिल की। मुम्बई जैसे महानगर में ओवैसी की पार्टी को भी एक सीट मिली थी। महाराष्ट्र की दो सीटों पर आेवैसी के दो प्रत्याशी दूसरे नम्बर पर थे।  उनकी पार्टी को कुल दस लाख मत प्राप्त हुए थे। बिहार के चुनाव में भाजपा गठबंधन और नीतिश-लालू के गठबंधन के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। संयोगों से एक दर्जन सीट पर कुछ खेल हो जाए, तो जीत की बाजी हार में बदल सकती है। असउद्दीन ओवैसी की पार्टी ने बिहार की सीमा पर 4 जिलों में 24 प्रत्याशी खड़े करने का निर्णय लिया है। नेपाल की सीमा से लगे किसनगंज, अरारिया, कटिहार और पूर्णिया आदि जिलों में मुस्लिमों की संख्या काफी है। ओवैसी ने अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान को खड़ा किया है। उनकी छवि दमदार नेताओं की है। इसके पहले वे लालू की पार्टी के विधायक थे। लोकसभा चुनाव के पहले वे नीतिश से जुड़ गए। नीतिश ने उन्हें किसनगंज से टिकट भी दी थी। अंतिम क्षणों में वे कांग्रेस के प्रत्याशी मौलाना हक के समर्थन में बैठ गए। इसका पूरा लाभ भाजपा को मिला। वहां से भाजपा जीत गई।
भारत के मुस्लिमों को लगता है कि तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों के हिंदू नेता मुस्लिम हितों की रक्षा करने में नाकामयाब साबित हुए है, इसलिए वे आक्रामक मुस्लिम नेताओं की खोज मे हैं। असम में बंगाली मुसलमान खुद का इतना अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं कि उन्होंने अपने मौलाना बदरुद्दीन अजमल को जीताकर संसद में भेजा है। बदरुद्दीन अजमल असम में अपना रुतबा रखते हैं। इधर ओवैसी भी भारत के मुस्लिमों के मसीहा बनने की जुगत में हैं। बिहार के चुनाव उनके लिए एक चुनौती है। अब देखना यह है कि वे इस चुनौती को किस हद तक स्वीकार कर अपना वर्चस्व स्थापित करते हैं।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

सांसत में है मोदी सरकार

डॉ. महेश परिमल
मोदी सरकार के सामने संकट की घड़ी है। एक तरफ मानसून का कमजोर होना और दूसरी तरफ अमेरिकी सेंट्रल रिजर्व फेडरल बैंक(फेड) द्वारा आगामी 16 एवं 17 सितम्बर को होने वाली बैठक में ब्याज दर बढ़ाने की आशंका है। इन दोनों कारकों के कारण इस हफ्ते बाजार में काफी उथल-पुथल देखी जा सकती है। फेड यदि ब्याज दरें बढ़ाने का फैसला करता है, तो ग्लोबल स्तर पर सोने की कीमतों में तेज गिरावट आ सकती हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसा होने पर घरेलू मार्केट में सोना 2000 रुपए प्रति 10 ग्राम तक सस्ता हो सकता है। इसके अलावा इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती की उम्मीद, गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम और चीन से घटती डिमांड सोने की कीमतों पर दबाव बना सकते हैं। शुक्रवार को दिल्ली सर्राफा बाजार में सोना 26,460 रुपए प्रति 10 ग्राम पर था। यानी ये दाम 25 हजार से नीचे आ सकते हैं। मद्रास ज्वेलर्स एंड डायमंड मर्चेंट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट जयंतीलाल जे चेल्लानी ने बताया कि गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम से घरों में रखा सोना बाहर आएगा, जिससे ग्लोबल मार्केट में डिमांड घटेगी और कीमतों में गिरावट आएगी। ऐसा होने पर ज्वेलर्स की बिक्री बढ़ेगी और कमाई इजाफा होगा। इसके अलावा देश पर एक और समस्या मंडरा रही है, वह है पेयजल की समस्या। कम बारिश से यह तो तय है कि लोगों ने पानी का अपव्यय कम नहीं किया है। हजारों नारों के बाद भी पानी के अपव्यय करने में किसी प्रकार की लगाम नहीं लगाई जा सकी है। मानसून ने जो आमद दिखाई थी, वह अब पूरी तरह से भ्रम साबित हुआ है। इसलिए देश में पीने के पानी का संकट मंडराने लगा है। लोग इससे अभी भले ही अनजान हों, पर गर्मी के पहले पानी को लेकर होने वाली जंग ही बता देगी कि यह समस्या कितनी विकराल साबित होगी। महंगाई पर किसी तरह का अंकुश न होने के कारण लोग पानी के लिए त्राहि-त्राहि करेंगे, यह तय है। देश के लिए यह अभी अग्निपरीक्षा का दौर है।
अमेरिकी सेंट्रल बैंक (फेड)  की नजर भारतीय बाजार पर है। वह भारतीय आर्थिक तंत्र का गहराई से अध्ययन कर रहा है।  अमेरिकी अर्थतंत्र ब्याज दर बढ़ाने के नाम पर दो भागों में विभाजित हो गया है। एक वर्ग का कहना है कि ब्याज दर बढ़ाई जानी चाहिए। इनका तर्क है कि डॉलर अब मजबूत हो गया है, इसलिए ब्याज दर बढ़ाने से देश को फायदा होगा।  देश में लगातार दूसरे साल सूखे जैसे हालात हैं। ऐसा भारत के 115 साल के इतिहास में चौथी बार होने जा रहा है। 1 जून से 10 सितंबर तक देशभर में 664.3 मिमी बारिश हुई है, जो कि सामान्य के मुकाबले 15 फीसदी कम है। साउथ इंडियन रीजनल गोल्ड फेडरेशन के प्रमुख पद्मनाभन ने बताया कि बारिश कम होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से सोने की मांग घटी है। इसके कारण देश में सोने का इंपोर्ट 10 फीसदी घटने की संभावना है। ग्रामीण क्षेत्रों में 60 फीसदी से अधिक सोने की खपत होती है। इसके अलावा प्रमुख करंसी के मुकाबले डॉलर इंडेक्स 96 अंक के करीब पहुंच गया है। अमेरिका के मजबूत आर्थिक आंकड़ों के कारण डॉलर में तेजी देखने को मिल रही है। पैराडाइम कमोडिटी के सीईओ बीरेन वकील ने कहा कि पिछले एक साल के दौरान डॉलर इंडेक्स में 14 फीसदी से ज्यादा का उछाल आ चुका है। वकील के मुताबिक अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ीं, तो डॉलर इंडेक्स 100 के पार पहुंच सकता है। इसके कारण सोने की कीमतों में गिरावट की आशंका है।
यह तो देश का एक साधारण आदमी भी जानता है कि मानसून यदि अच्छा होता है, तो देश का आर्थिक तंत्र भी मजबूत होता है। मानसून का कमजोर होना अकाल की संभावनाएँ बढ़ा देता है। वैसे देश के पास अनाज का पर्याप्त स्टॉक है, इसके बाद भी अनाज की वितरण व्यवस्था ठीक न होने के कारण यह अनाज सही हाथों तक पहुंच पाएगा, इसमें शक है। यह तो इसी बात से पता चलता है कि देश में पेट्राेल-डीजल के दाम बढ़ते ही महंगाई बढ़ जाती है, पर जब उनके दामों में कमी आती है, तो महंगाई कम नहीं होती। अब सरकार कमजोर मानसून के नाम पर महँगाई का एक और डोज देने के लिए तैयार हो रही है। बाजार का संकेत अब अर्थशास्त्री ही नहीं, बल्कि आम आदमी भी समझने लगा है। कम बारिश से महंगाई बढ़ती है,आवश्यक वस्तुओं की कमी होने लगती है। काफी समय से बाजार मंदी की चपेट में है। एक तरफ लोग बाजार में तेजी की आशा लिए बैठे हैं, तो दूसरी तरफ मंदी और अधिक तीव्र होने लगी है। अच्छे दिन की बात अब हवा होने लगी है। अमेरिका में रोजगार के अवसर बढ़ने लगे हैं। लोगों को नई नौकरियां मिलने लगी है। बेरोजगारी कम होने लगी है। इससे अमेिरका का अर्थतंत्र एक बार फिर सजग होकर उठ बैठा है। इसलिए ब्याज बढ़े, इसकी संभावना बढ़ गई है।
वैश्विक आर्थिक तंत्र छोटी-छोटी बाबतों पर आधारित है। हाल में भारत के उद्योगपतियों और प्रधानमंत्री के बीच बैठक हुई थी, तब ब्याजदर घटाने का मामला भी उठा था। भारत के उद्योगपति इस मुद्दे पर आगे बढ़ना चाह रहे थे। वे प्रधानमंत्री से इस बात की गारंटी चाहते थे कि ब्याजदर घटाई जाए। िकंतु प्रधानमंत्री ने इसे रिजर्व बैंक के ऊपर डाल दिया। इससे चर्चा का रुख ही बदल गया। ब्याज दर के मुद्दे पर वित्त मंत्री अरुण जेटली और रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के बीच शीत युद्ध जारी है। भारत में ब्याजदर घटाने की मांग की जा रही है, तो अमेरिका में ब्याज दर बढ़ाने की मांग की जा रही है। बारिश कम होने से उत्पादन पर असर होगा। कुछ लोगों का मानना है कि अगले दस दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो यह तय है कि आम जनता की दीवाली बिगड़ जाएगी। इस समय त्योहार के बाद भी बाजार ठंडा है। व्यापारी सेल की तख्ती दुकानों में लगाए बैठे हैं। पर ग्राहक दिखाई नहीं दे रहे हैं। 16-17 की बैठक में जो भी निर्णय लिया जाएगा, उसका पूरा असर भारतीय बाजारों में दिखाई देगा। फिर वह चाहे उद्योग जगत हो या शेयर बाजार। कमजाेर बारिश से देश के 90 प्रतिशत लोग प्रभावित होते हैं, यह तय है। फेड के निर्णय के बाद यदि सोना 2000 रुपए सस्ता होता है, तो इसका असर सेंसेक्स बहुत बड़ा झटका देगा।  यह भारत का दुर्भाग्य है कि विश्व बाजार में क्रूड आइल का दाम कम होता है, ताे डॉलर मजबूत होता है, यदि इस समय डॉलर के दाम 58 रुपए होते हैं, तो देेेेश में पेट्रोल-डीजल आयात करना सस्ता हो जाएगा। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। सरकार का पूरा प्रयास है कि क्रूड आइल के कम होते भाव से रुपया मजबूत हो। मुकेश अंबानी, सायरस मिस्त्री, कुमार मंगलम, बिड़ला, सुनील भारती मित्तल जैसे उद्योग जगत के बाहुबलि अधिक निवेश के लिए सहमत हों और सरकार पर भरोसा रखें, तो परिस्थितियां पलट सकती हैं।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 12 सितंबर 2015

मालधारी, पासधारियों का विश्व हिंदी सम्मेलन

डॉ. महेश परिमल
भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। इस बार यह कई कारणों से चर्चा में है। पहला तो इसमें सेलिब्रिटी का समावेश। दूसरा कई बड़े साहित्यकारों की उपेक्षा। इसके अलावा उसमें प्रवेश के लिए पास सिस्टम का होना। इन तीन कारणों से हिंदी सम्मेलन आम आदमी से दूर हो गया है। यही आम आदमी अपनी अभिव्यक्ति के लिए रोज हिंदी का प्रयोग करता है। मीडिया के लिए यह आयोजन अपनी टीआरपी बढ़ाने का अच्छा साधन बन पड़ा है। आयोजन स्थल के बाहर कई टीवी-रेडियो पत्रकार लोगों से इस आयोजन पर उनके विचार जानते रहते हैं। तरह-तरह के लोग अपने विभिन्न विचारों से लोगों को अवगत करा रहे थे। कुछ नाखुश भी थे। कुछ ने ऐसे आयोेजन को बार-बार करने का अाग्रह भी किया। पर एक बात यह उभर कर आई कि इतने बड़े आयोजन में हिंदी कहां है? वह भी भोपाल जैसे शहर में, जहां आम बोलचाल की भाषा हिंदी ही है। यदि यही कार्यक्रम दक्षिण भारत में होता, तो हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलता। हिंदी के लिए चिंता हिंदी प्रदेश से कहीं अधिक अन्य प्रदेशों में होनी चाहिए। जहां हिंदी फिल्में तो बड़े चाव से देखी जाती हैं, परजानते हुए वे हिंदी बोलना पसंद नहीं करते। हिंदी के विद्वानों को इस स्थिति पर गहराई से िवचार करना चाहिए।
जापान से भोपाल आए एक हिंदी प्रेमी रेडियो पर कह रहे थे कि हिंदी को विश्व भाषा बनाने के पहले यदि इसे देश की भाषा बनाई जाए, तो ही बेहतर होगा। उनका यह कहना कतई गलत नहीं है। आज हिंदी अपने ही देश में दुत्कारी जाती है। हिंदी को मान-सम्मान मिले, इस दिशा में विदेशों में अथक प्रयास हो रहे हैं, पर अपने ही देश में हिंदी असुरक्षित है। वह सिसक रही है, अपनी ही हालत पर। हिंदी-अंग्रेजी शब्दों को मिलाकर आज जो खिचड़ी बोली जा रही है, वह उसका सही रूप प्रस्तुत करने में पूरी तरह से असमर्थ है। भारतीय हिंदी को अपनी मां कहते नहीं अघाते, पर आज वे ही दूसरे की मां की सेवा करने में लगे हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भारत की दूसरी भाषाओं के शब्दों को हिंदी में मिलाने की बात कहते हैं, पर हिंदी में कई ऐसे शब्द हैं, जो अपनी बात कहने में पूरी तरह से सक्षम हैं, उसके बाद भी उसके बजाए हम स्वयं अंग्रेजी के शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। आज अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाला बच्चा यदि अंग्रेजी में कमजोर है, तो उसके लिए ट्यूशन की व्यवस्था कर दी जाती है, पर हिंदी में कमजोर होने पर इसकी चिंता नहीं की जाती। यह हमारी गुलामी मानसिकता का प्रतीक है। बच्चा अंग्रेजी में बात करे, तो हमें गर्व अनुभव होता है। पर उसके सबके सामने हिंदी में बोलने पर हम शर्मिंदगी महसूस होती है। आखिर इस स्थिति को क्या कहा जाए?
दरअसल बात यह है कि हमने अभी तक हिंदी को दिल से नहीं स्वीकारा। हम भले ही हिंदी के लिए कितनी भी वकालत कर ले, पर बच्चे को जब भी पढ़ाने का अवसर आएगा, तो उसे अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। भोपाल में आयोजित इस हिंदी महाकुंभ में शामिल होने वाले कितने लोग ऐसे हैं, जिनके बच्चे हिंदी माध्यम शाला में अध्ययन करते होंगे? सभी का यही तर्क होगा कि बिना अंग्रेजी के कुछ भी संभव नहीं है। आज जंगली घासों की तरह गली-मोहल्लों में ऊग आई न जानें कितनी अंग्रेजी माध्यम की स्कूलें खुल गई हैं, जहाँ बच्चा किसी को प्रणाम या नमस्कार नहीं कर सकता। अब तो उनकी पाठयपुस्तकों से राम, मोहन, सीता के नाम गुम होने लगे हैं। भारतीय संस्कृति पर यह हमला हो रहा है और हम खामोश हैं। हिंदी भाषा आज अपने ही घर में अजनबी हो गई है। उसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा रहा है। हिंदी अब केवल हिंदी दिवस पर होने वाले आयोजनों में ही अपने सही रूप में दिखती है। सरकारी संरक्षण के अभाव में वह विकृत हो रही है। जिस दिन सरकार दृढ़ता से यह संकल्प ले लें कि हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा होगी, तो उसे राष्ट्रभाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता, पर जरूरी यही है कि सरकार की नीयत में खोट न हो।
हमारे देश में ही हिंदी की स्थिति ठीक नहीं है। हमें अंग्रेजी की गुलामी की मानसिकता की जंजीरों को तोड़ना होगा, तभी कुछ बेहतर संभव हो पाएगा। हिंदी की एक शिक्षिका कहती हैं कि आज के बच्चों को हिंदी एक बोझ लगती है। हिंदी का कालखंड आता है, तो बच्चे कुछ परेशान से दिखते हैं। उनका कहना है कि यह भाषा जब हमें कुछ काम ही नहीं आएगी, तो हम इसे क्यों पढ़ें? उन्हें इस मानसिकता में लाने का काम उनके पालक ही कर रहे हैं। हिंदी की उपेक्षा की शुरुआत घर से ही होती है, उसके बाद शालाओं में उपेक्षित होती है। एक साधारण-सा मजदूर भी अपनी संतानों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाना चाहता है। घर के सामने हिंदी माध्यम की शाला होने के बाद भी वह दो हजार रुपए की वेन लगवाता है, बच्चे को अंग्रेजी माध्यम की स्कूल में भेजने के लिए। इसके लिए वह अनथक परिश्रम भी करता है। वह जानता है कि हिंदी से न तो उसका और न ही उसके बच्चे का विकास हो पाएगा। आज हमारे ही देश में हिंदी उपेक्षित है। इसे दूर करने का काम हमें ही करना है। आज हिंदी भाषी राज्यों की हिंदी माध्यम शालाओं में ताले लटकने के दिन आ गए हैं। लोग अँगरेजी माध्यम की स्कूलों में बच्चों के प्रवेश के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने लगे हैं। मोटी फीस ही नहीं, बल्कि चंदे के नाम पर भी भारी-भरकम राशि देने को तैयार है। ये लोग यह भूल जाते हैं कि मातृभाषा की मृत्यु नागरिकों की अस्मिता की मृत्यु है। हिंदी भाषा मात्र जीवित रहे, यही पर्याप्त नहीं, पर ये और अधिक समृद्ध बने, अधिक से अधिक प्राणवान बने, यह अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि किसी भी भाषा के साथ अन्य प्रदेशों के नागरिकों और उनकी संस्कृति से ओतप्रोत होती है। इमर्सन कहते हैं कि जब कोई भाषा खत्म होती है, तब एक संस्कृति नष्ट होती है। ऐसी परिस्थिति में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देना ही उचित है। मातृभाषा से बच्चों में संस्कार का सिंचन होता है।
विदेशों में हिंदी को लेकर किसी तरह का पूर्वग्रह नहीं है। वहां हिंदी बोलने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। मैंने अपने अमेरिका प्रवास में देखा कि यदि आप हिंदी जानते हैं और अंग्रेजी नहीं बोल पा रहे हैं, तो सामने वाले की पूरी कोिशश होगी कि वे आपकी बात को समझें और अपनी बात समझा सकें। मुझे आश्चर्य तब हुआ, जब मैंने अमेरिका के अपने 20 दिनों के प्रवास में अंग्रेजी से कहीं अधिक हिंदी, गुजराती, बंगला, पंजाबी और छत्तीसगढ़ी का प्रयोग करना पड़ा। अमेरिकियों को पता चल जाए कि आप अंग्रेजी नहीं जानते, तो वे बहुत ही सरल अंग्रेजी में अपनी बात कहते हैं, उनकी पूरी कोशिश होती है कि वे आपको किसी तरह से भ्रम में नहीं रखना चाहते। वैसे भी पूरे अमेरिका में कहीं भी जाएं, हिंदी बोलने वाले मिल ही जाते हैं। भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के संदर्भ में यही कहना है कि यहां आने वाले हिंदी की िकस तरह से सेवा करेंगे, यह किसी को नहीं पता। यहां आकर वे दर्शनीय स्थलों में घूमने के अधिक मजे ले रहे हैं, जिनके लिए विशेष व्यवस्था की गई है। सम्मेलन में कई ऐसे लोग मिले, जिनका उद्देश्य मेहमान बनकर अधिक से अधिक सरकारी सुविधाओं का उपभोग करना ही है। आयोजन में किस तरह की चर्चा हो रही है, इससे उनका कोई लेना-देना नहीं। सम्मेलन में कई ऐसे पासधारी दिखाई दिए, जिनका हिंदी से दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं है। वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश के लिए कई वरिष्ठ साहित्यकारों को पूरी तरह से नकार भी दिया गया। इन्होंने अपनी बात एक पत्रवार्ता में भी रखी। संभव है इन्हें सरकार किसी खेमे का साहित्यकार मानती हो, पर इसका आशय यह तो नहीं हो जाता कि उनके अवदान को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाए। आखिर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने कुछ तो योगदान दिया ही होगा?
हिंदी महज अभिव्यक्ति की ही भाषा नहीं है, बल्कि यह संस्कार देती है। विचारों का सिंचन करती है। हिंदी में वह लालित्य है, जो विचारों का सही मार्गदर्शन करती है। हिंदी में वह अपनापन है, जो किसी को भी अपना बना लेता है। अंग्रेजी में हम कितने भी गहरे अर्थों वाले शब्द ले आएँ, पर आंचल शब्द के करीब का भी शब्द वे नहीं ला पाएंगे। आंचल में जो गहराई है, वह ‘एंड आॅफ लेडिस क्लाथ’ में नहीं आ पाएगी। िववाह के तमाम संस्कार केवल वेडिंग में नहीं ही आ सकते। कपाल क्रिया का करीबी शब्द अंग्रेेजी में कभी नहीं मिल सकता। इस तरह से हिदी के हजारों शब्दों की सूची है, जिसका अंग्रेजी शब्द हो ही नहीं सकता। हां उसका सांकेतिक शब्द अवश्य मिल जाएंगे। रही बात दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध की, तो उसके लिए चिंतक के.सी. सारंगमठ का कहना है कि  दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है  कि हमारे देश में हिंदी का विरोध करने वाले कितने लोग हैं, जो हिंदी के प्रशंसक का चोला पहनकर हमारे साथ-साथ हैं।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

मानसून की बेरुखी के नतीजे

आज दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 7 सितंबर 2015

बिहार चुनाव और भूमि अधिग्रहण बिल


डॉ. महेश परिमल
भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में सभी यह समझने लगे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे छोड़कर अपनी कायरता का परिचय दिया है। लेकिन लोग यह भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री जिस तबीयत के व्यक्ति हैं, उसमें यह बात शामिल है कि किसी एक बात पर चिपके रहना उनकी आदत में नहीं है। वे हमेशा कुछ नया करने की सोचते रहते हैं। इसके पीछे भले ही बिहार विधानसभा चुनाव एक कारक हो,पर भूमि अधिग्रहण विधेयक का सहारा लेकर विपक्ष ने जिस तरह से हावी होने की कोशिश की है, उससे लगता है कि वे अब विपक्ष को कोई भी ऐसा अवसर नहीं देना चाहते, जिससे वह मुखर हो। इसलिए िवधेयक वापस लेकर उन्होंने यह बता दिया कि विपक्ष अब यह सोच ले कि वह जो चाहता है, वह नहीं हो पाएगा। उनकी इस चाल में चाणक्य नीति के दर्शन होते हैं। जिस दिन बिहार में नीतिश-सोनिया-लालू की सभा हुई, उसी दिन प्रधानमंत्री ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेकर यह साबित कर दिया कि अभी उनके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, इसलिए इस तरह का कोई जोखिम लेना उचित नहीं है। कुछ वर्ष बाद ही जब राज्यसभा में उनकी पार्टी का बहुमत हो जाएगा, तब विधेयक लाकर पारित कराया जा सकता है।
एक तरफ बिहार में प्रतिष्ठा की जंग चल रही है। सोनिया-नीतिश-लालू की जोड़ी बिहार में भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहीे है। ऐसे में भाजपा ने बिहार में जीत का झंडा फहराने का संकल्प ले लिया है। बिहार में आज सबसे बड़ा मुद्दा किसानों की जमीन छीन लेने का है। भाजपा के पास इन आक्षेपों का कोई जवाब नहीं था। राज्यसभा में बहुमत के अभाव में सरकार की लाचारी दिखाई दे रही थी। इसे कांग्रेस भले ही अपनी विजय माने, पर सच तो यह है कि इस जीत को वह किसी भी तरह से बिहार में नहीं भुना पाएगी। प्रधानमंत्री ने जब से भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेने की घोषणा की है, तब से किसानों ने राहत का अनुभव किया है। उन्हें मिली मानसिक शांति से अब वे इस पर गंभीरता से सोचने लगे हैं। प्रधानमंत्री ने अपनी इस घोषणा के बाद इस मुद्दे को ही खत्म कर ठंडा करने की कोशिश की है। जो सफल साबित हुई। भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेने को लोग भले ही प्रधानमंत्री की कमजोरी मानें, पर देर-सबेर इसका लाभ भाजपा को ही मिलेगा, यह तय है। वैसे भी एक ही मुद्दे पर चिपके रहना राजनीति का स्वभाव नहीं है। यह प्रधानमंत्री का ‘मास्टर स्ट्रोक’ था, जिसके दूरगामी परिणाम दिखाई देंगे। एक तरह से जिस भूमि अधिग्रहण विधेयक को बिहार में मुद्दा बनाकर इसके आधार पर जो रणनीति बनाई जा रही थी, उस पर प्रधानमंत्री की घोषणा ने पानी फेर दिया। एक तरह से विपक्ष के हाथ से यह मुद्दा ही छीन लिया गया। अब विपक्ष इसे प्रधानमंत्री की कमजोरी साबित करना चाहेगा, तो भाजपा यह कह देगी कि हमने यह निर्णय किसानों के हित में लिया है। अब यदि विपक्ष किसानों का सचमुच हितैषी है, तो उसे सरकार का सहयोग करना चाहिए। एक मंच पर जब सोनिया-नीतिश-लालू बैठ सकते हैं, तो फिर राहुल गांधी क्यों नहीं बैठ सकते? अब राहुल कभी भी लालू के साथ बैठने से रहे।
बिहार में राजनीति के समीकरण उलझे हुए हैं। लालू-नीतिश के बीच मन-मुटाव है। आपस में उलझते भी रहते हैं। नीतिश-लालू-कांग्रेंस का महागठबंधन भविष्य में पूरी तरह से बिखर जाएगा, यह तय है। ये तीनों अहंकारी स्वभाव के हैं, अहंकार कभी न कभी तो बाहर आएगा ही। अभी नहीं तो चुनाव के बाद। बिहार को जंगलराज की तरफ ले जाने में इन तीनों का ही हाथ है। अब वहां रैलियों का सिलसिला शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री ने कल जो हुंकार भरी, उससे माहौल एक बार फिर गरमा गया है। एक के बाद एक सभाओं और रैलियों का आयोजन हो रहा है। सभाओं में भीड़ से लोग वोट को देख रहे हैं। पर वे यह भूल रहे हैं कि भीड़ में वोट का प्रतिबिम्ब न देखें। भीड़ भरमा भी सकती है। सभाओं में लालू अपनी वाचालता से लोगों को हंसाने का सामर्थ्य रखते हैं, पर ऐसा आखिर कब तक चलेगा। अभी वे नीतिश के पक्ष में बोल रहे हैं, पर वे कब उनके खिलाफ हो जाएं, कहा नहीं जा सकता। इसके विरोध में भाजपा नीतिश-लालू की नीतियों को गलत साबित करने में जुटी हुई है। भाजपा ने बिहार में अपने कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कर दी है, जो जमीन से जुड्कर काम कर रही है। बिहार के लोग भी अब बदलाव चाहते हैं। जनता आजिज आ चुकी है, लालू-नीतिश की कार्यशैली से। इस सोच का फायदा उठाने में भाजपा कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती। वह किसी भी रूप में दिल्ली वाली गलती नहीं दोहराना चाहती।
इस चुनाव में नीतिश को अपनी नैया डूबती दिखाई दे रही है। इसलिए उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का सहारा लिया था। उधर कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी को भी अपने साथ कर लिया। बिहार के लोगों को आश्चर्य इस बात का है कि यह आदमी चुनाव जीतने के लिए अपने ही सिद्धांतों के खिलाफ जा रहा है। कांग्रेस की हमेशा बुराई करने वाला आज उनकी प्रशंसा कर रहा है। राहुल गांधी की नजरों में न तो नीतिश और न ही लालू किसी काम के हैं, इसलिए वे उनकी रैलियों से हमेशा दूर ही रहते हैं। बिहार के चुनाव को प्रतिष्ठापूर्ण बनाकर नीतिश कुमार ने एक तरह से भाजपा को चुनौती दी है। उसकी अग्निपरीक्षा ली है। भाजपा की एक-एक चाल का जवाब नीतिश कुमार दे रहे हैं। किंतु अभी चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई है। भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अभी तो प्रत्याशियों का चयन भी नहीं हुआ है। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भाजपा ने नीतिश-लालू के सामने घुटने टेक दिए हैं। भाजपा सधे कदमोंे से बिहार कूच की तैयारी कर रही है। वह अपनी गलतियों को दोहराना पसंद नहीं करती, इसलिए अभी से यह नहीं कहा जा सकता कि बिहार चुनाव का ऊंट किस करवट बैठेगा।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

सोती पकड़ी गई गुजरात सरकार

डॉ. महेश परिमल
इस बार हमेशा सचेत रहने वाली गुजरात सरकार ऊंघती पकड़ी गई है। इससे सरकार को यह सबक लेना होगा कि राजनीति बंद कमरों में नहीं, बल्कि खुले मैदानों में होती है। अब तक सरकार स्वयं को बहुत ही सयानी समझ रही थी। अब उसे यह अहसास हो गया है कि उससे कहीं कोई चूक अवश्य हो गई है। अभी तो चूक का पता नहीं चल पाएगा, पर सरकार यदि शांति से विचार करे, तो उसे यह समझ में आ जाएगा कि जो नेता दस लाख से अधिक की भीड़ जमा कर सकता है, उसमें कहीं न कहीं तो नेतृत्व क्षमता होगी ही। उसकी बातें सुन ली जाती, तो शायद आज यह हालात नहीं होते। हार्दिक पटेल की उपेक्षा कर सरकार स्वयं ही उपेक्षित हो गई है। अब हालत यह है कि सांसद-विधायक अपनी प्रजा के पास जाने के लिए छटपटा रहे हैं। प्रधानमंत्री की शांति की अपील कोई काम की नहीं रही। पुलिस की बर्बरता सामने आ गई है। सरकार और पुलिस दोनों को ही संयम की आवश्यकता थी, पर दोनों ही इसमें विफल रहे।
गुजरात में आरक्षण को लेकर चल रहे पाटीदारों के आंदोलन से यह बात तय हो गई है कि अब समझ ठंडे कमरे में गर्म बहस का नहीं रहा। अब तो खुले मैदान की राजनीति की जानी चाहिए। हार्दिक पटेल ने मैदान की राजनीति की है। आंदोलन के पहले चरण में उसकी विजय हुई है और सरकार ऊंघती हुई पकड़ी गई है। हार्दिक पटेल को अनदेखा करना महंगा पड़ा। भाजपा सरकार के पास मैदान में राजनीति करने का अनुभव नहीं है। वह ठंडे कमरों में गर्म बहस करती रही है। इस आंदोलन में सरकारी तंत्र बुरी तरह से विफल रहा है। पुलिस विभाग भी आंदोलन का सही आकलन करने में विफल रही। 25 की रैली को देखते हुए गलियों-चौराहों में पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था थी। पुलिस की तैनाती ही काफी नहीं होती, विवेकशील पुलिस की तैनाती होनी चाहिए थी, जो नहीं हो पाई। यदि इस दौरान पुलिस ने दिमाग से काम लिया होता, तो शायद हालात इतने बेकाबू नहीं होते। दोपहर तीन बजे से ही यह पता चल गया था कि हालात बेकाबू हो सकते हैं। दोपहर बाद दुकानें बंद कराने वाली भीड़ के सामने पुलिस चुपचाप बैठी तमाशा देखती रही। आश्रम रोड पर भी पुलिस मूकदर्शक बनी बैठी रही। पुलिस को यह आदेश था कि सभी आंदोलनकारियों को शांति से आगे बढ़ने देना चाहिए। पर आगे चलकर संयम का अभाव पुलिस और पाटीदारों दोनों में ही दिखाई दिया। इसमें नेताओं को भी शामिल किया जा सकता है।
पूरे गुजरात में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में जिन पाटीदारों का नाम सम्मान के साथ लिया जाता रहा हो, वही पाटीदार समाज आज एक विवादास्पद मामले को लेकर आंदोलन कर रहा है, इससे उनकी छवि खराब हुई है। ऐसा कोई भी देश नहीं बचा, जहां इन पाटीदारों ने ख्याति का झंडा न गाड़ा हो। 25 की शाम को हुए दंगे ने यह साबित कर दिया कि जो पालता है, वही बरबाद भी करता है। गुजरात का ऐसा कोई गांव नहीं है, जहां कोई पाटीदार न हो। भाजपा जिनके बल पर आगे बढ़ी है, उन्हीं की उपेक्षा कर उनकी मांगें न सुनकर, उन्हें अनदेखा कर जो गलती की है, उसका खामियाजा उसे भुगतना ही होगा। इस आंदोलन से एक बात विशेष रूप से सामने आई है, वह यह कि  दोनों ही दंभ के शिकार हैं। सरकार यह मानती है कि आरक्षण न देकर हम पाटीदारों को मना लेंगे और पाटीदार यह मानते हैं कि आखिर सरकार हमारे ही दम पर चल रही है। इसे तो हम मनवाकर ही रहेंगे। इस दंभ ने ही आज गुजरात की हालत खराब कर दी है। इसमें सबसे अधिक पीसे गए हैं, रोज कमाने-खाने वाले। पाटीदार एक सम्पन्न जाति है, उनके पास अथाह सम्पत्ति है। यही नहीं उनके पास आत्मबल की कतई कमी नहीं है। अगर वे वास्तव में आरक्षण चाहते हैं, तो अपने साथियों को ही ऊपर उठाने का काम करें, तो सरकार भी उन पर नाज करेगी। आज वे ऐसा कर भी रहे हैं, पता नहीं आरक्षण पाकर वे कितने बाहुबलि हो जाएंगे।
ये पाटीदार गुजरात के गौरव हैं। गुजरात में अपना उद्योग लगाने के लिए सरकार इनके लिए लाल जाजम बिछाती है। इन्हें तमाम सुविधाएं देने का वादा करती है। तब सब कुछ अच्छा लगता है। पर इन्हें आरक्षण देने के नाम पर सरकार इनसे बात ही नहीं करना चाहती। आखिर यह सरकार की दोमुंही नीति नहीं, तो और क्या है? अन्ना हजारे ने जब अपना आंदोलन शुरू किया था, तब कई मंत्री उनसे मिलने जाते थे, पर जब पाटीदारों ने अपना आंदोलन शुरू किया, तो किसी ने उनसे बातचीत की पहल नहीं की, आखिर क्यों? क्या गुजरात सरकार के मंत्रियों को अपने केबिन में बैठे रहना ही पसंद है। यदि ऐसा है, तो वे कब सीख पाएंगे, जमीन की राजनीति? गुजरात ने पूरे 13 वर्षों बाद कर्फ्यू के दर्शन किए हैं। ये सरकार की ढीली नीति का परिणाम है। परिस्थितियों पर तुरंत काबू पाने में अक्षमता का जीता-जागता प्रमाण है। इन्हीं हालात ने आज गुजरात को अशांत कर दिया है। सरकार भले ही हार्दिक पटेल को दुश्मन नम्बर वन माने, पर उसे अनदेखा कर बहुत बड़ी गलती की है। सरकार उससे बात करने को ही तैयार नहीं है। पाटीदारों के कई आवेदन आए और रद्दी की टोकरी में चले गए। सरकार के पास उन आवेदनों को पढ़ने का समय ही नहीं है। सरकार ने यह नहीं सोचा कि जो इंसान अमदावाद में दस लाख और सूरत में सात लाख लोगों को इकट्‌ठा कर सकता है, उसमें कुछ तो दम होगा। क्या उनके मंत्रिमंडल में ऐसा कोई नेता है, जो इतनी भीड़ इकट्‌ठी कर सके। इस स्थिति में हार्दिक पटेल की उपेक्षा करना उचित होगा? सरकार यही नहीं समझ पाई। यही चूक उसके लिए गले की फांस बन गई।
सरकार को गुजरात के युवाओं की ताकत को समझने की आवश्यकता है। अगर सरकार प्रजा के साथ नहीं चल सकती, तो फिर उसका काम ही क्या है? जिस प्रजा ने सरकार को सत्ता सौंपी, यदि उसकी बात न मानी जाए, तो प्रजा विरोध तो करेगी ही। बिहार के चुनाव सामने हैं। प्रधानमंत्री अपने भाषण में गुजरात मॉडल जिक्र करते हैं, ऐसे में अब यदि वे गुजरात मॉडल की बात करें, तो कौन उनकी बात मानेगा? सरकार का पुलिस पर नियंत्रण नहीं रहा। यदि कहीं पुलिस शराब के अड्‌डे बंद करने जाती है, तो महज कुछ लोग ही उन्हें खदेड़ देते हैं, ऐसे में पुलिस की लाचारगी सामने आती है। वही पुलिस आम जनता के सामने इतनी अधिक हिंसक हो जाती है कि मानो देश में तानाशाही चल रही हो। तस्वीरों में पुलिस जिस तरीके से महिलाओं पर डंडे फटकारती दिखाई दे रही है, उससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका मानवीयता से कोई वास्ता नहीं है। उनका गुस्सा उनके चेहरे पर ही दिखाई देता है। अब यह समझ नहीं आता कि गुस्सा आम आदमी के प्रति है या सरकार के प्रति। अब यह भी माना जाने लगा कि एक सोची-समझी साजिश के तहत गुजरात को बदनाम करने की योजना तैयार की गई है। ताकि बिहार चुनाव पर भाजपा किसी भी तरह से जीत न पाए। यह भी कहा जा रहा है कि हार्दिक पटेल केजरीवाल के इशारे पर चल रहे हैं। पिछले दो महीनों से वह अरविंद केजरीवाल और बिहार के मुख्यमंत्री के सम्पर्क में हैं। पर जो केजरीवाल अपनी दिल्ली ही नहीं संभाल पा रहे हों, वे किसी को क्या सुझाव दे सकते हैं। यह समझ से परे है। हां दूसरे आरोप में कुछ दम है।
सभी जानते हैं कि बिहार में बिना जाति की गोटी बिठाए चुनाव नहीं जीता जा सकता। इसलिए गुजरात के माध्यम से प्रधानमंत्री की छवि को खराब किया जा सके। ताकि आम जनता में यह संदेश जाए कि जिस सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री अपने ही राज्य में आरक्षण आंदोलन को दबा नहीं सकते, वे भला देश को कैसे और किस तरह चला पाएंगे? कुछ भी हो, इतना तो तय है कि गुजरात में पाटीदार आंदोलन को लेकर यदि सरकार कुछ सबक ले सके, तो बेहतर, अन्यथा आरक्षण की यह आग पूरे देश में फैलते देर नहीं लगेगी।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

विश्व फलक पर चमकते भारतीय हीरे

  भारत के गौरव  सत्य और सुंदर
  डॉ. महेश परिमल
 विश्व की शक्तिशाली आईटी कंपनी में भारतीयों के दबदबे से आत्ममंथन का अवसर बनना चाहिए। जो हमेशा अपने वेतन पर ध्यान रखते हैं, वे सुंदर पिचाई से यह सबक ले सकते हैं कि वेतन ही सब-कुछ नहीं होता, इसके साथ यह भी आवश्यक है कि आप सतत अपडेट रहें और रोज कुछ नया करते रहें। आपके मस्तिष्क में हमेशा नए-नए विचार आते रहें, प्रतिभा को वेतन का मापदंड न मानें। सुंदर पिचाई ने यदि वेतन को ही आगे रखा होता, तो वे आज इस ऊंचाई पर नहीं होते। पिछले दिनों जैसे ही गूगल ने यह घाेषणा की कि सुंदर पिचाई अब कंपनी के सीईओ होंगे, तो पूरे भारत देश में खुशी की लहर दौड़ गई। इसी के साथ सोशल साइट पर यह चलने लगा कि दुनिया की किन-किन श्रेष्ठ कंपनिनयों में भारतीयों का दबदबा है। विश्व की सबसे बड़ी आईटी कंपनी के सीईओ सुंदर केवल 43 साल के हैं, इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी उपलब्धि बहुत कम हो हासिल होती है। अाज सुंदर ने जो कुछ हासिल किया है, वह उन्हें ऐसे ही प्राप्त नहीं हुआ है, उसके लिए उन्होंने जो श्रम किया है, वह भी पूरी खामोशी और शिद्दत से, वही उनकी श्रेष्ठता है, जो उन्हें औरों से कुछ अलग करती है। संुदर पिचाई ने आईआईटी खडगपुर से मेटलर्जी इंजीनियर होने के बाद अमेरिका चले गए, वहीं उन्हें विश्वविख्यात व्हार्टन बिजनेस स्कूल से एमबीए किया। पिछले दस वर्षों से वे गूगल के साथ जुड़े हैं। जब सुंदर पिचाई ने गूगल में अपना काम शुरू किया, तब उन्हें न्यू जेनरेशन कंज्यूमर प्रोडक्स का काम सौंपा गया। यहां उन्होंने आगामी 20 वर्ष तक ग्राहकों की बदलती मानसिकता और आवश्यकताओं का गहन अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा रोड मेप तैयार किया, जिसे आज तक गूगल उसका अनुशरण करता है। पिचाई द्वारा तैयार किया गया रोड मेप गूगल ने सबसे पहले जी मेल एप्लीकेशन पर काम किया। इसकी पूरी जिम्मेदारी पिचाई की टीम को दे दी। इसमें सफल होने के बाद मेप का एप्लीकेशन भी पिचाई ने सफलतापूर्वक तैयार किया। पिचाई ने जब गूगल के सभी प्रोडक्ट के लिए एंड्रोइड एप्लीकेशन से मोबाइल की पूरी दुनिया ही बदल दी, तब उनकी लगातार सफलता को पूरे विश्व ने सराहा। पिचाई की सफलता के क्रम में गूगल का वेब ब्राउजर क्रोम को भी शामिल किया जा सकता है। दस साल में पांच बड़ी सफलता की वजह से ही वे गूगल के सीईओ पद तक पहुंच पाए। आज आईटी के क्षेत्र में पूरे विश्व में गूगल के सर्जेई ब्रिन, लेरी पेज, एपल के टीम के कूक के बाद सुंदर पिचाई का नाम अपनी अनोखी सिद्धि के लिए लिया जा रहा है। सुंदर गूगल जैसी बड़ी कंपनी के सीईओ तो हैं ही, इसके अलावा ऐसी ही दूसरी आईटी ज्वाइंट माइक्रोसाप्ट के सीईओ के पद पर संुदर के ही राज्य तमिलनाड़ु के पड़ोसी कर्नाटक के सत्या नाडेला भी हैं। तमिलनाड़ु की इंदिरा नूई को कैसे भुला जा सकता है। आज वे पेप्सी की सीईओ हैं। सुंदर की सीईओ के पद पर नियुक्ति हुई, इसके पहले जिनके साथ उनकी प्रतिस्पर्धा थी, वे निकेश अरोरा भी भारतीय हैं। गूगल से लंबे समय तक जुड़ेे रहने के बाद पिछले साल ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। अब वे जापान की विख्यात साफ्टबैंक में वाइस चेयरमेन हैं। प्रसिद्ध सिटी बैंक के सीईओ रह चुके विक्रम पंडित भी एक जाना-पहचाना नाम है। भारतीय मूल के महानुभाव अपने तेजस्वी मस्तिष्क के कारण जब ऊंचे पद पर पहुंच जाते हैं, तो हमें गर्व होता है। यह स्वाभाविक भी है। अमेरिका प्रतिभा को अवसर देता है। हमारे यहां हालात एकदम ही अलग हैं। यहां प्रतिभा नहीं, बल्कि जुगाड़ और संबंध काम आते हैं। हमारे यहां की बहुत सी विभूतियां ऐसी हैं, जिन्हें हमने तो नकार दिया, पर उन्होंने अपनी बुद्धि का लोहा दूसरे देशों में मनवा लिया। इस पर ही एक शोध हो सकता है कि वे कौन सी परिस्थितियां थी, जिसने हमारे देश के महान लोगों को देश छोड़ने के लिए विवश किया। यदि उन्हें हमारे ही देश में अवसर मिले होते, तो हमारे देश का नाम बहुत ऊंचा होता। यह विचारणीय है कि जो देश छोड़कर चले गए, उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया गया। आखिर क्यों उन्हें देश छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। आज भी हमारे देश में व्यापार और नौकरियों के बेहतर अवसर हैं, उसके बाद भी प्रतिभाएं देश से बाहर ही जा रही हैं। 90 के दशक में जींस की खोज करने वाले डॉ. हरगोविंद खुराना, के. एस. चंद्रशेखर को देश छोड़ने के बाद नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। आज भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं। इसकी वजह हमारी झूठी खूनपरस्ती है। मूल रूप से हम अपने आराध्य में किसी हीरो, मॉडल, मूर्ति में देखते हैं। हम भूल जाते हैं कि असली हीरो तो खुराना, सत्या नाडेला, भरारा, या रामकृष्ण ही हैं। इन्हें गुमाने के बाद हम यह अहसास ही नहीं कर पाते कि अभी भी हमारे बीच बहुत से ऐसे लोग हैं, जो प्रतिभाशाली हैं, पर उनकी प्रतिभा हमें दिखाई नहीं दे रही है। हमारी स्थिति शुतुरमुर्ग की तरह हो गई है। प्रतिभा को नहीं देख पाते, साथ ही उन अवसरों को भी देख नहीं पाते, जो हमें हमारे देश से नहीं, बल्कि दूसरे देशों में मिलते हैं। हमारी व्यवस्था, काम करने की पद्धति, शिक्षा के अवसर, शिक्षा प्राप्ति के बाद काम के असवर, काम मिलने के बाद अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए पारदर्शिता आिद मामलों में हम काफी पीछे हैं। कल्पना करें कि यदि आज डॉ. खुराना, सत्या नाडेला, संुदर पिचाई, इंदिरा नूई, निकेश भारत में ही रहते, तो उनकी क्या स्थिति होती? अधिक से अधिक इंफोसिस, विप्रो, टीसीएस जैसी कंपनियों में ऊंचे वेतन प्राप्त करने वाले साफ्टवेयर डेवलवपर से विशेष कुछ बन सकते क्या? एनडीए सरकार एम्स, आईआईएम और आईआईटी जैसी उच्च कोटि की शिक्षण संस्थाओं को शुरू कर रही है, तब यह जानना आवश्यक हो जाता है कि सुंदर पिचाई आईआईटी खड़कपुर पहुंचे उसके पहले वे साधारण सरकारी स्कूल में ही पढ़ते थे और माइक्रोसाफ्ट के सत्या नाडेला तो मध्यम स्तर के निजी विश्वविद्यालय के छात्र थे। मानव संसाधन विकास के लिए हम वैश्विक नियमों को सीख रहे हैं, पर बरसों पुरानी मानसिकता को बदलना नहीं चाहते। अब भी समय है कि ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को हम अपने ही देश में ऐसे अवसर दें, ताकि उनकी प्रतिभा से हमारा देश ही आलोकित हो। दूसरे देशों से यह सीखें कि वे किस तरह से बिना भेदभाव के प्रतिभाओं का न केवल सम्मान करते हैं, बल्कि उन्हें ऊंचा पद देने में भी पीछे नहीं रहते। देखा जाए तो सुंदर पिचाई और सत्या नाडेला हमारे लिए मंथन का विषय हैं। इन प्रतिभा को हमने नहीं, किसी दूसरे देश ने पहचाना। प्रतिभा पहचानने की हमारा चश्मा ही खराब है। हमें वही दिखता है, जो हमें दिखाया जाता है। यह दृश्य सच से काफी दूर होता है। हमें चाहिए सिफारिश वाला प्रतिभावान, जुगाड़ से बनाया गया प्रतिभाशाली या फिर किसी मंत्री का पुत्र या फिर उसका रिश्तेदार। आज भी देश के उच्च पदों पर बहुत से नाकारा लोग बैठे हैं, जिन्हें हम नहीं पहचान रहे हैं, यदि इन्हें ही पहचान लिया जाए, तो ही देश के प्रतिभावानों को सामने आने में देर नहीं लगेगी।
 डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 26 अगस्त 2015

मंगी की बाजार में वापसी

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 17 अगस्त को प्रकाशित आलेख http://epaper.jagran.com/epaper/17-aug-2015-262-National-Page-1.html

सोमवार, 10 अगस्त 2015

अमेरिका में प्रतिबंधित, भारत में खुले आम

डॉ. महेश परिमल अमेरिका जैसी पाश्चात्य देशों से हम बहुत कुछ सीखते हैं। कभी फैशन के नाम पर हम उनका अनुकरण करते हैं, तो कभी फिल्मों के नाम पर। वहां बहुत कुछ ऐसा भी होता है, जिससे हम काफी कुछ सीख सकते हैं। समय की पाबंदी के अलावा वहां बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जिसे हमें अपनाना चाहिए। हम फैशनपरस्त हो सकते हैं, पर समय के पाबंद नहीं। हममें जागरूकता का अभाव है, इसलिए हम यह नहीं जान पाए कि अमेरिका ने अपने देश की स्कूलों में कोक-पेप्सी के उत्पादों को बेचना बंद कर दिया है। अब वहां फलों के ताजा रस मिलेंगे। वहां अब जाकर यह मान लिया है कि उक्त उत्पाद बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह है। इसलिए फौरन यह आदेश दिया गया। इतनी चिंता करते हैं, वे अपने देश के बच्चों की। लेकिन हमारे देश में अभी मैगी को लेकर जो जागरूकता दिखाई दी, वैसी जागरूकता अन्य उत्पादों में भी देखी जाए, तो पूरे देश के बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाए। पर ऐसा संभव नहीं दिखता। विश्व के कई देश अभी तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चंगुल में फंसे हुए हैं, उनमें हमारा देश भी एक है। इसके लिए दोषी है हमारी संकुचित मानसिकता और काम न करने की प्रवृत्ति। इन दो कारणों से कई अच्छे कार्य नहीं हो पाते। आजकल बच्चे जिस तरह से जान हथेली पर रखकर स्कूल जा रहे हैं, यदि उस हालात का ही बारीकी से निरीक्षण कर लें, तो समझ में आ जाएगा कि इसके लिए पालक ही दोषी हैं। पालक ही बच्चों को फास्ट फूड के लिए प्रेरित करते हैं। आलसी मांओं के कारण ही मैगी इतनी लोकप्रिय हो पाई। इसके अलावा अन्य कई ऐसी चीजें हैं, जो देश के भविष्य को बरबाद कर रही हैं, लेकिन इसका असर अभी नहीं, बरसों बाद पता चलेगा। अमेरिका से यह खबर आई है कि वहां की स्‍कूलों में कोकाकोला और पेप्‍सी की बिक्री बंद कर दी गई है। उसे अब जाकर यह समझ में आया है कि इन पेय पदार्थों से बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य को खतरा पैदा हो गया है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों ने भी अमेरिका की हां में हां मिलाते हुए इसे बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा बताया है। इन पेयपदार्थों को लगातार पीने से वहां के बच्‍चों में मोटापा छाने लगा है। उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ने लगी है। इसे पालकों ने भी समझा और इसका उग्र विरोध करने लगेा यह विरोध इतना अधिक तीव्र हुआ कि पेप्‍सी और कोला की कंपनियों को अपनी इज्‍जत बचाने के लिए उन्‍होंने निर्णय लिया कि अब स्‍कूलों में इन पेय पदार्थों की वेडिंग मशीन में फलों के ताजा रस होंगेा अमेरिकन बिवरेज एसोसिएशन की नई नीति के अनुसार अब स्‍कूलों में ऐसे पेय पदार्थ नहीं बिकेंगे, जिनमें अधिक से अधिक कैलोरी होंा कैलोरी वाले साफ्ट ड्रिंक, जिसमें केवल 5 प्रतिशत या उससे कम फलों का रस हो, ऐसे जूस की बिक्री नहीं की जाएगीा अब ऐसे पदार्थों की ही बिक्री होगी, जिससे बच्‍चों को अच्‍छा पोषण मिलेा इसमें 100 प्रतिशत फलों का रस ही होगा। एक अमेरिकी नागरिक एक वर्ष में करीब 600 बोतलें कोला ड्रिंक्‍स पी जाता है। इसमें बालकों की संख्‍या अधिक है। इसी ड्रिंक्‍स के कारण बच्‍चों में अनुपात से अधिक मोटापा देखा जा रहा है। इस मोटापे का दोष इन बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों पर लगे, इससे पहले उन्‍होंने यह निर्णय लेकर अपनी साख बचा ली है। लेकिन भारत में इस तरह का कोई कदम उठाया जाएगा, इसमें शक है। मल्‍टीनेशनल कंपनियों के खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं। उनके पास अमेरिकियों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मापदंड हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका की स्‍कूलों में भले ही कोकाकोला और पेप्‍सी पर प्रतिबंध लगा दिया गया हो, पर भारत में कहीं भी इसकी गूंज तक सुनाई नहीं दी। राजनीतिक गलियारों में भी इसकी चर्चा नहीं है। हमारे देश की स्‍कूलों के सामने कई प्रतिबंधित चीजों की बिक्री होती है। देश में गुटखे पर प्रतिबंध के बावजूद वह सभी स्‍थानों पर खुले आम बिक रहा है। इसीलिए बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां भारत के लिए अलग से कानून बनाती हैं। ये कंपनियां भारतीय स्‍कूलों से पेप्‍सी और कोला जैसी घातक चीजों की बिक्री पर रोक लगाने की दिशा में कोई कदम उठाने ही नहीं देंगीा उनके लिए भारत एक प्रयोगशाला है। जहां वे अपने उत्‍पादों का परीक्षण करते हैं। जब बहुराष्‍ट्रीय कंपनी के एक अधिकारी से पूछा गया कि क्‍या अमेरिका के बाद भारतीय स्‍कूलों से भी कोक एवं पेप्‍सी के उत्‍पाद वापस लिए जाएंगे, तो उसने बड़ी बेशर्मी से कहा कि कंपनी ने निर्णय लिया है, वह केवल अमेरिकी स्‍कूलों के लिए ही है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां मानती हैं कि भारत के लिए परिस्‍थितियां भिन्‍न हैं। आखिर भारत के लिए परिस्‍थितियां अलग कैसे हो सकती हैं, इस पर कोई ध्‍यान नहीं देताा कोला कंपनी के एक प्रवक्‍ता के अनुसार भारतीय बच्‍चों में अभी मोटापे की बीमारी इतनी अधिक नहीं फैली है कि इसे गंभीर माना जाएा इसका आशय यही है कि ये कंपनियां इस बात का इंतजार कर रही हैं कि भारतीय बच्‍चों को उनके द्रव्‍य पदार्थों का गंभीर असर हो, उसके बाद ही कोई कार्रवाई कर पाएंगेा यह तो सिद्ध हो चुका है कि कोला इतना अधिक खतरनाक है कि उससे टायलेट साफ किया जा सकता है। इसमें जो रसायन मिलाए गए हैं, उससे अभी तो नहीं, पर भविष्‍य में खतरनाक दुष्‍परिणाम सामने आएंगेा भारतीय बाजार इन बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के आगे नतमस्‍तक हैं। इनकी पहुंच राजनीतिक गलियारों तक है। यही कारण है कि अमेरिका में प्रतिबंधित चीजों का हमारे यहां धड़ल्‍ले से खुले आम व्‍यापार हो रहा है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनी कोला के एक प्रवक्‍ता के अनुसार भारत में कोला ड्रिंक्‍स की जितनी बिक्री होती है, उसमें से एक प्रतिशत की बिक्री शालाओं में हो पाती है। कोला ड्रिंक्‍स की बिक्री अरबों रुपए की है। भारतीय स्‍कूलों में अभी जो कोला बिक रहा है, उससे भी ये कंपनियां अरबों रुपए कमा रहीं हैं। आखिर वे क्‍यों चाहेंगी कि उनके उत्‍पादों की बिक्री कम हो, वे तो इसकी बिक्री अधिक से अधिक बढ़ाना ही चाहेंगेा अभी भारतीय बच्‍चों पर इसके प्रभाव पर किसी प्रकार का शोध नहीं हुआ है। यदि शोध से कुछ नया निकलता है, तो भारतीय जनमानस सचेत हो जाएगाा संभव है, पालक सड़कों पर उतर आएं, पर ऐसा संभव दिखाई नहीं देताा जिस तरह से मेगी नूडल्‍स के प्रति सरकार ने सचेत होकर सख्‍त कदम उठाए, उसे देखते हुए यदि पेप्‍सी और कोला के उत्‍पादों के खिलाफ भी कदम उठाए, कुछ संभव है। इसके लिए पहले तो पालकों को सचेत होना होगाा पालकों की सतर्कता के कारण ही मुम्‍बई और दिल्‍ली की कई स्‍कूलों में इस तरह से साफ्ट ड्रिंक्‍स पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। नई दिल्‍ली की प्रतिष्‍ठित स्‍प्रिंगडेल्‍स स्‍कूल की प्रिंसीपल ज्‍योति बोस कहती हैं कि हमने चार साल पहले ही इस तरह के प्रेय पदार्थों पर रोक लगा दी है। हमारी स्‍कूल की केंटीन में नीबू पानी और फलों का रस ही मिलता है। बच्‍चों में चर्बी बढ़ने के खतरे को देखते हुए ही हमने पेप्‍सी और कोला के उत्‍पादों पर प्रतिबंध लगा दिया है। नई मुम्‍बई के वाशी के फादर अग्‍नेल मल्‍टीपरपज स्‍कूल ने एक वर्ष पहले ही इस तरह के द्रव्‍य पदार्थों पर रोक लगाई है। स्‍कूल के प्राचार्य फादर अल्‍मिडा कहते हैं कि शहरों में बच्‍चों के बढ़ते वजन और उनका मोटापा हमारे लिए चिंता का कारण है। इसलिए स्‍कूलों पर इस तरह के द्रव्‍यों पर रोक लगानी ही चाहिएा अमेरिका में इस समय जिस तरह से पेप्‍सी और कोला के उत्‍पादों को लेकर आंदोलन चल रहे हैं, उससे हमें सीख लेनी चाहिएा बात कुछ भी हो, पर सच तो यह है कि आज हमारे देश में बहुत कुछ ऐसा भी हो रहा है, जिसे नहीं होना चाहिएा सुप्रीम कोर्ट का सख्‍त आदेश है कि सड़कों के किनारे लगने वाले ठेलों पर जो खाद्य सामग्री बेची जाती है, उस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगना चाहिएा पर ऐसा नहीं हो पाताा मिलावट करने वाले पर सख्‍त कार्रवाई होनी चाहिए,पर अभी तक किसी मिलावटखोर को सख्‍त सजा हुई हो, ऐसा सुनने में नहीं आयाा हर साल लाखों रुपए का नकली मावा पकड़ा जाता है, पर कभी किसी की धरपकड़ हुई हो, उस पर मुकदमा चला हो, ऐसे किस्‍से कम ही सुनने को मिलते हैं। आज हमारे देश में लोगों मे कानून का खौफ कम होता जा रहा है, इसलिए अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। मीडिया रोज ही इस तरह से मामलों को सामने ला रहा है, फिर भी अपराधों की संख्‍या में किसी प्रकार की कमी दिखाई नहीं देती। डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

छद्म आतंकवाद का खतरा


हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

महँगाई की मार


आज दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 3 अगस्त 2015

फाँसी देने के नियम

अजा हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख

Post Labels