सोमवार, 5 नवंबर 2007

मेरी कविताएँ स्वागत कंप्यूटर


स्वागत कंप्यूटर

इक्कीसवीं सदी के पथ प्रदर्शक
कंप्यूटर
तुम्हारा स्वागत है
बीसवीं सदी के कगार पर खड़े
लोगों की तरफ से।
सुना है
तुम बड़े-बड़े काम कर सकते हो
ऑंकड़ो की भाषा समझते हो
समस्याएँ सुलझाते हो
अब तो शादी ब्याह भी
कराने लगे हो।
बहुत अच्छी बात है।
ऑंकड़ों की धुरी पर
टिके इस देश को
समस्याहीन शीघ्र घोषित कर दोगे तुम
पर कंप्यूटर,
तुम बता सकते हो
गरीब की भूख कितनी रोटी की है ?
उसकी बेटी के ब्याहता होने मेें
उसे कितनी बार मरना होगा?
या फिर केन्सर पीड़ित
जीवित पिता के जीने में
उसके हाथ कितनी बार कटेंगें?
यदि इसका ंजवाब है
तुम्हारे पास,
तो कंप्यूटर सचमुच
तुम्हारा स्वागत है.
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काजू के बारे में....


काजू का स्वाद जानना चाहती है
मेरी बिटिया
काजू के बारे में सबकुछ जान लेना
चाहती है मेरी बिटिया
मैं बताता हूँ
काजू विदेशी चींज है
जिसके खाने से पेट में दर्द होता है
बिटिया आश्वस्त हो जाती है
उसका आश्वस्त होना मुझे एक डर से
बाँध देता है
सोचता हूँ कभी पूछ ही लिया होता
स्वर्गीय पिता से बिटिया का प्रश्न
तो शायद यह झूठ नहीं बोलना पड़ता मुझे
अपनी बिटिया से काजू के बारे में बताते हुए...
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कांवेंट से लौटकर


मेरी बच्ची
सहमी हुई है
कॉवेंट से लौटकर
साक्षात्कार दिया है
उसने अभी-अभी
चार ननों के बीच
अकेले बैठ कर
उसे आक्रांत कर रही है
ननों की वेशभूषा
लबादा कहें या चोगा
माँ को तो कभी
नहीं देखा
उस वेश में
साड़ी में माँ तो
साक्षात् देवी
लगती है
फिर ये नन
क्यों नहीं बन जाती
माँ की तरह
वे पूछती हैं
क्या कहते हैं
इंगलिश में माँ को?
कैसे बताऊँ उन्हें
माँ तो केवल
माँ ही होती है
माँ बोलते ही
पूरा विश्व
समा जाता है
मेरे मुँह में
क्या मदर कह देने मात्र से
समा सकता है
पूरा विश्व मेरे भीतर?
उन्हें कैसे बताती
ऑंचल और गोद की परिभाषा
कितना भी कह लो
एंड ऑफ द लेडिस क्लॉथ
कितना भी तोड़-मरोड़ लो इसे
पर ऑंचल की पवित्रता
नहीं ला सकते
कंक्रीट भी उतनी सुरक्षा
नहीं दे सकते
जितना ऑंचल देता है।
माँ की गोद
आहा, कितनी सुखद अनुभूति
इंसान पैदा होता है
इसी गोद से
मरना भी चाहता है यहीं।
संपूर्ण विश्व की खुशी
माँ की गोद
कितना भी कह लें
वही सुख लैप ऑफ मदर में है
कैसे विश्वास होगा?
सारे सुख सिमट आते हैं
इन दो शब्दों में
नहीं चाहिए मुझे
एंड ऑफ लेडिस क्लॉथ
और लैप ऑफ मदर
मुझे तो प्यारा है
माँ का ऑंचल
और उसकी गोद बस ......
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आजकल

आजकल
रात में भीतर से
ताला लगाकर
सोने लगा हूँ
चोरी के भय से नहीं
क्या ले जाएँगे
यहाँ से
चारों तरफ बिखरी
ईमानदारी तो वे
ले जाने से रहे
फिर भी ताला
अवश्य लगाता हूँ
इस डर से कि
कहीं मेरे पुख्ता विचार
चोरी न चले जाएँ
इन विचारों के साथ
मेरी कलम
तेज से तेजतर
हो रही है
मेरे विचारों में
सुगबुगाहट है
स्पंदित क्रांति की
ये क्रांति
चेहरा नहीं बिगाड़ेगी
व्यवस्था का
बल्कि तार-तार
कर देगी
उन चेहरों को
जो थक चुके हैं
नकाब लगाते-लगाते
डर है कहीं
बाहर चले गए
मेरे विचार
तो टकराकर
लहूलुहान हो जाएँगे
व्यवस्था से
जिसमें लहलहा रहीं है
स्वार्थ की फसलें
हाशिये पर सिसकते
नैतिक मूल्य
मौत को गले लगाती
मानवता
और मानव?
वह होता तो
यह सब क्यों होता
आजकल?
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अगर यह सच है कि
टुकड़े-टुकड़े पर
लिखा होता है खाने वाले का नाम
तो मुझे वह टुकड़ा खोज कर ला दो
जिस पर लिखा है मेरा नाम.
ताकि मैं उसे खाकर,
अपने नाम लिखी पानी की बूंद पीकर
अपनी प्यास बुझा सकूँ.
मैं देश को गाली नहीं दे रहा,
समाज को भी नहीं कोसता,
मैं तो अपने आप से ही
पूछता हूँ कि
क्यों नहीं ढूंढ पाता हूँ मैं
अपने उस नाम लिखे टुकड़े को?
जिस पर मेरा हक है.
ये कैसी व्यवस्था है समाज की? देश की?
कि अपने नाम लिखे टुकड़े को ही
किसी और के मुख में जाता हुआ
देखता रह जाता हूँ,
पर नहीं छिन पाता हूँ मैं
अपने हिस्से का वह
नाम लिखा टुकड़ा?

डॉ. महेश परिमल

4 टिप्‍पणियां:

  1. परिमल जी
    सभी रचनाए एक से बड़ कर एक्…बहुत खूब लिख्ते है आप

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  2. आपकी टिप्पणियों के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद.
    डॉ. महेश परिमल

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  3. Excellent Poems.

    Keep it up.

    Regards

    Atulkumarsaxena
    atulkumarsaxena@gmail.com

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