मंगलवार, 13 नवंबर 2007

मासूम हाथों की बात....

डा. महेश परिमल
शमशेर की एक कविता है, 'कब आएँगे हाथों के दिन'. आज हाथों के दिन तो हमारे करीब हों या न हों, पर मासूम हाथों के दिन अभी तक लद नहीं पाएँ हैं, वे आज भी शिवाकाशी में पटाखों से झुलसते हैं, खड़िया मिट्टी का काम करते हुए अपने हाथों को गला रहे हैं, बीड़ी बनाते हुए तम्बाखू की जहरीली गंध को अपने नथूनों में पाल रहे हैं या फिर नरम कालीन बनाते हुए अपने हाथों को कठोर कर रहे हैं. उनकी साँसों या तो बारुदी गंध समाई हुई है या फिर महीन रेशे के रूप में मासूम फेफड पर जम रही है.
शायद आपने कभी नहीं सोचा होगा कि शिक्षक को जब भी अपनी कोई बात समझानी होती है, तब चॉक का इस्तेमाल करते हैं, दूसरी ओर कभी कहीं भी कोई खुशी का अवसर आता है, तब लोग पटाखे चलाकर अपनी खुशियाँ जाहिर करते हैं. दीप पर्व पर तो यह पूरे देश मे खुले रूप में दिखाई देता है, पर क्या कभी किसी ने सोचा कि इसके पीछे कई नन्हे हाथों का कमाल है. ये वही नन्हे हाथ हैं, जिनकी ऑंखों में एक सपना पलता है, कुछ करने का, पढ़ने और आगे बढ़ने का, लेकिन रोटी के संघर्ष में उनकी ऑंखों में पलने वाले सपने धुँधले हो गए हैं. छोटी उम्र में ही अपने अभिभावकों को अपने होने की कीमत अदा करते हैं. सरकारी भाषा में इन्हें बाल श्रमिक कहा जाता है. बाल श्रमिक या बाल मंजदूर यानि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे अपनी आजीतिका चलाने के लिए स्वयं या अपने माता-पिता के साथ काम पर जाते हैं या काम करते हैं.
बाल श्रमिकों के नाम पर चाहे कितनी भी योजनाएँ बनें या कितनी भी घोषणाएँ हों, लेकिन कुछ हो नहीं पाता. हाँ सरकारी ऑंकड़ों पर निश्चित ही कुछ ऐसा हो जाता है, जिससे लगे कि हाँ हमारे देश में बाल श्रमिकों की संख्या में कमी आई है. लेकिन देखा जाए, तो हमारे देश में बाल श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है. भारत के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार देश में साढ़े चार करोड़ से लेकर करीब ग्यारह करोड़ के बीच बाल श्रमिक हैं. इस संख्या को देखते हुए शासन द्वारा बाल श्रम को रोकने के लिए जहाँ कानूनी प्रावधान किए गए हैं, वहीं ऐसे बच्चों की शिक्षा के लिए सुविधाएँ उपल?ध कराने हेतु ठोस पहल के रूप में बाल श्रमिक शालाओं की भी स्थापना की गई है.
अब यह बहुत कम लोग जानते हैं कि बाल श्रमिकों के लिए प्रारंभ की गई शालाएँ कैसी चल रही हैं. जब शिक्षकों की फौज होने के बाद भी सरकारी शालाओं की स्थिति दयनीय है,तो बाल श्रमिकों के लिए स्थापित की गई शालाओं की क्या स्थिति होगी, इसे बताने की जरूरत नहीं है. होने को तो कई विभागों में एक श्रम विभाग भी है, पर वहाँ किसी श्रमिक का एक आवेदन कितने वर्षों तक फाइलों में कैद रहता है, इसे भी बताने की आवश्यकता नहीं है. कुछ गैर सरकारी संस्थाओं ने निश्चित ही इस दिशा में कुछ ठोस कार्य किए हैं, पर उनके कार्य 'ऊँट के मुँह में जीरा' के समान हैं.
खतरनाक उद्योग एवं कानूनी प्रावधान
कुछ उद्योगों एवं कार्यों को खतरनाक श्रेणी में रखा गया है. इन उद्योगों में बच्चों का संलग्न होना अनुचित और विनियमन अधिनियम 1986 के अधीन निषिध्द है. ऐसे उद्योगों की संख्या लगभग 51 है. इसमें बीड़ी बनाना, कालीन बुनना, सीमेंट का निर्माण, कपड़ा छपाई व रँगाई, आतिशबाजी, विस्फोटक, माचिस का निर्माण, अभ्रक (माइका) का कढ़ाई और खंड करना, चपड़ी-लाख का निर्माण, साबुन का निर्माण, चमड़े और ऊन की सफाई, भवन निर्माण, स्लेट-पेंसिल का निर्माण, संगमरमर या काँच से बने उत्पाद का निर्माण, ंजहरीली घातु और पदार्थ जैसे मरक्यूरी, क्रोमियम, एस्बेस्टस से निर्माण प्रक्रिया कारखाना अधिनियम 1948 की धारा 2 (ग घ) में परिभाषित घातक प्रक्रिया और धारा 1 के अंतर्गत बनाए गए नियमों में परिभाषित खतरनाक प्रक्रिया कारखाना अधिनियम 1948 की धारा 2 (डी) (4) के अंतर्गत परिभाषित मुद्रण, काजू का छिलने और अन्य प्रक्रिया, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में टाँका लगाने की प्रक्रिया, अगरब?ाी निर्माण, ऑटो मोबाइल मरम्मत आदि अन्य घातक उद्योग हैं. बाल श्रमिकों की समस्त परिस्थितियों को देखते हुए केंद्रीय सरकार द्वारा पारित बाल श्रम (प्रतिबंध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 पूरे देश में लागू है. इस नियम के अनुसार जो हानिकारक और असुरक्षित उद्योग एवं प्रक्रियाएँ हैं, उनमें बच्चों को लगाना पूर्णत: वर्जित है, इस नियम का उल्लंघन करने वाले को दो वर्ष तक का कारावास एवं 20 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है. जिन उद्योगों में हानिकारक प्रक्रियाएँ नहीं हैं, उनमें यदि बाल श्रमिक का नियोजन किया जाता है, तो उसे दिन भर में 6 घंटे से अधिक काम पर नहीं लगाया जा सकता तथा उसे साप्ताहिक अवकाश दिया जाना जरूरी है.
श्रम विभाग का दायित्व- श्रम विभाग के अधिकारियों का यह र्क?ाव्य है कि वे यह देखें रेल्वे स्टेशन आदि जैसे सार्वजनिक स्थानों पर बोर्ड लगाकर यह प्रदर्शन किया गया है कि नहीं कि ऐसे स्थानों पर बच्चों को कार्य पर लगाया जाना पूर्णत: वर्जित है. भारत अधिनियम की धारा 39 (ड) में उल्लेख है कि शासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महिलाओं एवं बच्चों की शारीरिक दशा का दुरुपयोग करने वाले रोजगारों से उन्हें दूर रखा जाए.
आज हम सब देख रहे हैं कि हमारा स्कूटर यदि खराब हो जाए, तो मेकेनिक के पहले उसे एक छोटा सा लड़क़ा देखता है, वही अपने उस्ताद को बताता है कि स्कूटर में क्या खराबी है. होटल में हमारे सामने नाश्ता भले ही कोई दूसरा लाए, पर पानी लाने और जूठी प्लेट उठाने के लिए एक बालक अवश्य होगा. चाहे साइकिल दुकान हो, होटल हो, मेकैनिक हो, या फिर छोटे-छोटे उद्योगों में लगे इन मासूमों को हर समय झिड़की या मार पड़ते रहती है. सरकारी नियमों का खुले आम उल्लंघन हो रहा है और सरकार केवल नियम कायदों की दुहाई देकर अपना पल्ला झाड़ रही है.
सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय
घातक काम धंघों में लगे बच्चों को वहाँ से निकालकर बाल श्रमिक शालाओं में उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए व्यवस्था करने संबंधी निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक निर्णय 10 दिसम्बर 1996 में दिया. इन निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि एसे घातक कार्यों में लगे हुए सभी बच्चों का सर्वेक्षण किया जाए. इसके पश्चात् प्रति बच्चे के लिए 20 हजार रुपए उसके नियोजक से वसूल किए जाएँ, तथा ऐसी राशि से एक निधि निर्मित की जाए. बाल श्रमिक के अभिभावक को रोंजगार सुलभ कराने की जिम्मेदारी राज्य शासन को सौंपी गई है. यदि शासन इन्हें रोंजगार नहीं दिला पाए, तो ऐसी परिस्थितियों में प्रति बच्चे के लिए पाँच हजार रुपए के हिसाब से राशि उक्त निधि में शासन द्वारा मिलाई जाए. इस राशि से प्राप्त ?याज से बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की जाए.
हम सभी देख रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का किस तरह खुलेआम उल्लंघन हो रहा है. शासन के ठीक नाक के नीचे बच्चे आज भी होटलों और कारखानों में काम कर रहे हैं. जहाँ वे अपना बचपन भूल गए हैं. पढ़ने की उम्र में ही ये कमाने लगे हैं. इन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि बचपन के खेल कौन-कौन से हैं. अपनी मासूम ऑंखों के साथ स्कूल यूनिफार्म में सजे बच्चों को स्कूल जाते हुए ये केवल सिसककर ही रह जाते हैं. इनकी ऑंखों में पलने वाला सपना वहीं मर जाता है, जब वे अपने काम पर निकलते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश आज भी धूल खाते किसी फाइल में दबे पड़े हैं और उधर बिका हुआ बपचन न जाने कितनी गर्द को अपनी साँसों में ले रहा है.
केवल कानून की दुहाई देने और सरकार का मुँह ताकने से ही कुछ नहीं होगा. इसके लिए जनजागरुकता अतिआवश्यक है. हम न तो स्वयं ही अपने घरों में किसी मासूम को काम पर लगाएँ और न ही किसी अन्य के घर मासूम को काम पर रखने की सिफारिश करें. बच्चों से काम न लेने की शुरुआत खुद से ही करनी होगी. इस दिशा में उद्योगपति और समाजसेवी संस्थाएँ आगे आकर शासन से यथासंभव सहायता प्राप्त कर इस कार्य में अपना हाथ बँटाएँ. इस दिशा में भारत सरकार की राष्ट्रीय बाल श्रम (निर्मूलन) योजना के अंतर्गत बाल श्रमिक शालाओं का संचालन एक उदाहरण हो सकता है. ये शालाएँ अच्छे से संचालित हो, यही समाज का मकसद होना चाहिए. नहीं तो मासूम सपने मासूमी ऑंखों में ही पलकर वहीं खत्म हो जाएँगे. हमारे सामने ही एक बच्चा काम करते-करते थककर चूर हो जाएगा, शायद हमारे ही सामने अपना दम तोड़ दे, तो भी हमारी संवेदना नहीं जागेगी. क्योंकि हमने ही तो इसी तरह अपनी संवेदनाओं को मारने का एक उपक्रम किया है.
डा. महेश परिमल

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Labels