शुक्रवार, 23 नवंबर 2007

खेल जारी है मौत के सौदागरों का..
डा. महेश परिमल
ंजहर, जहर, ंजहर पानी में ंजहर, दूध में ंजहर, अनाज में ंजहर, हवा में ंजहर, यहाँ तक कि दवा में भी ंजहर. आज जीवन का ऐसा कोई भी खाद्य या पेय पदार्थ नहीं बचा, जिसमें ंजहर न हो. मौत के सौदागरों ने इस क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा, अब यह क्षेत्र भी मौत बेचने वाले सौदागरों के शिकंजे में फँस गया है. सारे कानून इनके सामने बौने साबित होते हैं. इसका प्रमाण है कि आज तक किसी भी दवा कंपनी के मालिक को संजा नहीं हुई. भले ही उसके खिलाफ कितनी ही मौतों का मामला हो.
इंसान यदि ंजहर का सेवन कर भी लेता है, तो बच जाता है, इस खुशी में जब वह मिठाई बाँटता है, तब मिठाई विषाक्त हो जाती है. ये हाल हैं, आज मिठाइयों और दवाओं के. मिठाइयों के बारे में यही कहा जा सकता है कि एक निश्चित समय बाद वह विषाक्त हो जाती है, पर दवाओं की कौन कहे, जिसमें जीवन देने के बजाए जीवन लेने की शक्ति छिपी हो. आज हमारे देश में ऐसी सैकड़ों दवाएँ हैं जो, विदेशों में प्रतिबंधित हैं, पर यहाँ खुले आम मिल रही हैं. अगर आपको यह पता चल जाए कि जो भोजन आप ले रहे हैं, उसमें किस मसाले में किसकी मिलावट की गई है, तो आप को आश्चर्य होगा, संभव है आप उस चीज से तौबा कर लें, पर कब तक? वह ंजहर तो आपकी रगो में इस कदर समा गया है कि आप चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते. खुले आम मिलावट की चींजें बिक रहीं हैं, पर आम नागरिक कुछ कर नहीं सकता. कुछ ने अपनी जागरुकता का परिचय दिया भी, लेकिन हुआ वही, जो होना था. मिलावटी माल बेचने वाले पर तो कोई कार्रवाई नहीं हुई, पर जिस जागरुक उपभोक्ता ने शिकायत की, उसे बेवजह काफी परेशान होना पड़ा. एक सामूहिक जागरुकता की आवश्यकता है, जिससे पूरे समाज में हलचल मच जाए, पर यह सामूहिक जागरुकता आएगी कहाँ से?
आज हालत यह है कि थोड़ा सा सरदर्द हुआ कि नहीं, आम आदमी पहुँच जाता है, मेडिकल स्टोर और कोई बढ़िया सा पेन किलर देने की माँग करता है. याद करें, कुछ वर्ष पहले नावेलजीन नाम की एक दवा आती थी, जो अब विदेशों में प्रतिबंधित है. जानते हैं क्यों? क्योंकि उसके लगातार सेवन से इंसान के बोनमेरो को नुकसान होता था. इससे बच्चों में जानलेवा बीमारी ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) की शिकायत मिल रही थी. यही नावेलजीन अब भी बन रही है, पर दूसरी दवा कंपनियाँ इसे दूसरे नाम से बना रही हैं. दूसरी दवा है 'सींजाप्राइड' नाम की है, जो सींजा और सीसप्राइड ब्रांड नाम की थी. यह दवा गैस और कव्ज दूर करने के लिए थी, किंतु इससे हृदय की धड़कन अनियमित हो जाती थी. 'ड्रोप्रिडोल' नामक दवा भी हृदय की धड़कन को अनियमित करती थी, इस दवा का सेवन लोग अपना डिप्रेशन दूर करने के लिए करते थे. इसका ब्रांड नाम 'ड्रोपेरोल' था, यह भी अब विदेशों में प्रतिबंधित है. पतले दस्त के लिए उपयोग में लाई जाने वाली दवा 'फ्यूरा ंजोलिडोन' कैंसर की घातक बीमारी के कारण अब विदेशों में प्रतिबंधित कर दी गई है. 'नीमे मेसुलाइट' नामक दवा 'नाइंज और निमुलीड' ब्रांड के नाम से बनती थी. उसे भी बुखार उतारने और पेन किलर के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, किंतु इसका दुष्प्रभाव यह होता था कि इंसान का लीवर काम करना बंद कर देता था. इसे भी अब विदेशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है. बैक्टिरिया को मारने वाली एक दवा क्रीम 'नाइट्रोफुरांजोन' से बनती थी, इससे भी कैंसर का खतरा होने के कारण विदेशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है. टी.वी. पर सर्दी और कफ दूर करने वाले 'विक्स एक्शन 500' और 'डी-कोल्ड' का विज्ञापन दिखाया जाता है, जानते हैं इसे विदेशों में क्यों प्रतिबंधित कर दिया गया? क्योंकि इसमें 'फेनिलप्रोपेनोलेमाइन' नामक दवा का इस्तेमाल होता था. जिससे हृदयाघात की शिकायतें मिल रहीं थीं. आपको आश्चर्य होगा कि उपरोक्त सारी दवाएँ विदेशों में प्रतिबंधित हैं, किंतु हमारे देश में अब भी बनती है और आसानी से मिल जाती हैं.
आज ऐसा हो रहा है कि डाक्टरों द्वारा बताई गई दवाओं को लम्बे समय तक लेने के बाद भी जब कोई फायदा नहीं होता, तब मरीज उनसे पूछता है कि रोग ठीक क्यों नहीं हो रहा है? तब डाक्टर उसे गोलमोल जवाब दे देता है. वास्तव में मरीज उन दवाओं के 'साइड इफैक्ट' से ग्रस्त हो जाता है. अपनी इस भूल को डाक्टर किसी भी रूप में स्वीकार नहीं करता, बल्कि कई अन्य दवाएँ लिखकर दे देता है और यह आश्वासन देता है कि इससे निश्चित रूप से लाभ होगा. अंत में होता यह है कि मरीज मृत्यु को प्राप्त होता है और डाक्टर फिर दूसरे मरीज को वही दवाएँ देना शुरू कर देता है.
ये तो हुई दवाओं की बात. आपको याद है पानी में विषाणु की बात हम सब सुनते रहे हैं, फलस्वरूप हमारे देश में 'मिनरल वॉटर' का प्रचलन बढ़ गया. कुछ समय पहले ही इसी 'मिनरल वॉटर' में शरीर को हानि पहुँचाने वाले तत्व पाए गए, काफी हो-हल्ला हुआ, पर कुछ दिनों बाद सब शांत हो गया. 'मिनरल वॉटर' का इस्तेमाल आज भी शुध्द पेयजल के रूप में खुले आम हो रहा है.
हमारे देश में आज कुछ भी शुध्द नहीं मिल रहा है. पॉलिथीन खाने वाली गाय का दूध कभी शुध्द हो सकता है किसी ने सोचा है भला? यही हाल घी, तेल, सव्जी-भाजी, अनाज, दालें आदि का है. आप जानते हैं कि चना दाल, उड़द दाल, तुवर या अरहर दाल में हानिकारक तत्व मिलाए जाते हैं. चने की दाल में मक्के का आटा, दाल और चावल को चमकीला बनाने के लिए रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जो शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है. दूध और उससे बनी मिठाई में पोस्टर कलर, सोडा, शैम्पू, स्टार्च मिलाए जाते हैं. इसके अलावा मावे में कपड़ा रँगने का रंग और सिंथेटिक दूध मिलाया जाता है. सव्जी-भाजी को पकाने के लिए रासायनिक इंजेक्शन का प्रयोग होता है. उसे रासायनिक पावडर में रखा जाता है. गोभी को सफेद और चमकदार रखने के लिए सिल्वर नाइट्रेट का उपयोग किया जाता है. बैंगन को चमकीला बनाने के लिए उसे मेलाथियान से भीगे कपड़े से पोंछा जाता है. इसी तरह दूसरी फलों को पकाने के लिए ताम्बे और सीसे के पावडर का प्रयोग किया जाता है. इसे जानने के लिए कभी आप 'कोल्ड स्टोरेज' का दौरा कर वहाँ की गतिविधियों को समझने का प्रयास करें, तो सब कुछ आसानी से समझ में आ जाएगा.
मिर्च के पावडर में ईंट का बारीक चूरा, सौंफ और साबूत धनिए में हरा रंग, हल्दी में लेड क्रोमेट और पीली मिट्टी, धनिया पावडर में गंधक मिलाया जाता है. आज तक किसी को मिलावट के आरोप में सजा नहीं हुई, इसका आशय यही है कि हमारे यहाँ इस संबंध में बनाए गए कानून काफी लचीले हैं. इस दिशा में कभी सख्ती नहीं हुई, सरकार की इसी कमजोरी का लाभ मिलावटखोर बरसों से उठा रहे हैं. सामान्य नागरिक इसी दुष्चक्र में फँसते जा रहे हैं, न चाहते हुए भी उन्हें मिलावट का ंजहर अपने भीतर लेना पउ रहा है. इससे बीमारी तो बढ़ ही रही है, पर मौत भी कम नहीं हो रही है. पर मौत के सौदागर कब ठहरने वाले हैं, वे नित नए प्रयोग कर रहे हैं और मौत बाँट रहे हैं. सरकार भी इनके सामने बेबस है.
होने को हमारे देश में खाद्य नियंत्रक जैसा एक विभाग भी है, पर उसकी कार्यशैली किसी से छिपी नहीं है. इस विभाग की सक्रियता कभी देखने को नहीं मिली, यदि कभी इस विभाग ने सक्रिय होना भी चाहा, तो उस पर लगाम कस दी गई है. इतएव यह भी सरकार की तरह विवश और पंगु बनकर रह गया है. समय आ गया है कि अब यदि सामूहिक जागरुकता का परिचय नहीं दिया गया, तो मौत के ये सौदागर किसी को भी नहीं छोड़ेंगे, ये तो वे सौदागर हैं, जो इंसान के लाश बनने के बाद उसके अंगों की बोल भी बोली लगा दें. अतएव एक प्रयास हो जाए, तो संभव है मिलावटखोर सरेआम बेइज्जत हों और दवाओं के नाम से ंजहर बेचने वालों के पीछे पूरी भीड़ दौड लगाए, तभी हम समझेंगे कि हाँ एकता में ताकत है. पर यह ताकत कब आएगी, इसका जवाब किसी विद्वान या ज्योतिषी या भविष्यवक्ता के पास भी नहीं होगा.
एक तथ्य
क्या आप जानते हैं कि पूरे विश्व की सरकार को अपनी ऊँगली में नचाने वालों में सबसे ऊपर कौन हैं? वे हैं शस्त्र उत्पादक, उसके बाद नम्बर आता है फार्मा कंपनियों का. जो विभिन्न दवाएँ बनाती हैं. सरकार पर इनका वर्चस्व इतना अधिक हे कि ये चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं. सरकार बदलना इनके बाएँ हाथ का खेल है. ये दवा कंपनियाँ पत्रकारों और लेखकों को अपने प्रभाव में लेकर दवाओं के विक्रय के लिए लालायित करने वाले आलेख तैयार करवाती हैं. एड्स, वियाग्रा आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. अब तक एड़स के प्रचार में दुनिया के देशों ने खरबों रुपए बरबाद कर दिए हें, पर इसकी तुलना में यह रोग किसी को हुआ है, इसके बहुत ही कम प्रमाण मिले हैं. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यदि वास्तव में एड्स इतनी ही खतरनाक बीमारी है, तो प्रचार के बजाए उस रोग के अनुसंधान और शोध पर रुपए खर्च किए जाते, तो हालात कुछ दूसरे ही होते. यह उन दवा कंपनियों का एक षडयंत्र ही है, जिसके झाँसे में कई सरकारें आ गई.
डा. महेश परिमल

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