मंगलवार, 24 नवंबर 2009

डर से डरो मत उसका सामना करो


व्यक्ति के जीवन में भय अनादि काल से अनन्त रूपों में व्याप्त है । डर की हालांकि कोई शक्ल नहीं होती लेकिन अगर दुनिया की कोई सबसे भयानक और डरावनी चीज है, तो वह डर ही है । डर और असुरक्षा का बडा गहरा संबंध है बल्कि यह कहना चाहिए कि दोनों एक.दूसरे के पूरक हैं । डर अपने साथ असुरक्षा लाता है । इससे पीड़ित व्यक्ति की जीवन की दिशा ही बदल जाती है । बहुत लोग इस व्याधि से पीडित है । सुबह के उजाले से लेकर रात के अंधेरे तक डर वेताल की तरह उनकी पीठ पर लदा रहता है और वे जीवन का आनन्द नहीं उठा पाते हैं । भय ने पूरे निरपेक्ष भाव से संसार के अधिकतर लोगों पर अपना दबदबा कायम किया हुआ है । जिन व्यक्तियों को संसारसफलतम मानता है. उनके जीवन पर भी इसका ह्नरभाव देखा जा सकता है । डर के इतने रूप और ह्नरकार हैं कि शायद ही कोई इससे बच पाया है। कोई सुंदर नहीं है.इसलिए डरा हुआ है तो कोई बहुत सुंदर होने की वजह से भयभीत है यानी भय व्यक्ति के जीवन में अनेक रूपों में व्याप्त है । क्रांतिकारी ध्यात्मिक संत स्वामी विवेकानन्द का एक बार कुछ उत्पाती बंदरों से पाला पडा । बंदर का स्वभाव है कि जब वह आक्रमण करता है तो तरह.तरह की भाव.भंगिमाएं बनाकर कुछ इस तरह का माहौल बनाता है कि व्यक्ति बुरी तरह डर जाताहै । विवेकानन्द भी रों से बचने के लिए भागे । उनके पीछे भयानक मुख.मुद्राओं वाली वानरों की सेना दौड रही थी । उसी दौरान दूर खडे कुछ साधुओं ने जोर से आवाज देकर कहा अरे. युवा संन्यासी. बंदरों से डरो मत. लाठी ठोंककर उनके सामने खडे हो जाओ । फिर देखना कि वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड पाएंगे । स्वामी विवेकानन्द को जैसे ही अंतज्र्ञान हुआ .वह रुके तथा बंदरों के खातिब होकर जोर से हुंकार भरी । देखते ही देखते बंदरों का हुजूम नदारद हो गया । बाद में स्वामी विवेकानन्द ने अपने किसी प्रवचन में उस प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा था जीवन में बहुत सी समस्याओं के प्रति भी व्यक्ति का इसी तरह का पलायनवादी रवैया होता है । उनके सामने आने पर वह पीठ दिखाने की तैयारी कर लेता है लेकिन जिस दिन वहखम ठोककर उस समस्या के सामने खुद को खडा कर लेता है तो तय मानिए कि फिर समस्या का समाधान भी बहुत दूर नहीं है । डर की तरफ पीठ करना या उससे भागना उसकी शक्ति को दोगुना कर देता है । व्यक्ति को सिर्फ इतना करना है कि अपने डर को अच्छी तरह से पहचान कर खुद को उसके सामने पूरी ताकत से खडा करना है । डर को हराना है तो सबसे पहले अच्छे.बुरे परिणामों के प्रति एक निरपेक्ष भाव होना जरूरी है । इस दुनिया में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसका पूरा जीवन सफलता और असफलता के झंझावातों से न घिरा हो । फर्क सिर्फ इतना है कि व्यक्ति सफलता का तो दिल खोलकर स्वागत करता है लेकिन असफलता से डरता हैं. खीजता हैं.निराश होता हैं । सफलता और असफलता का शाश्वत क्रम निरंतर चलता रहता है लेकिन कई लोग असफलता के डर को कुछ इस तरह सीने से लगा लेते हैं कि सफलता चाहकर भी उनके पास नहीं आ पाती है । स्वामी विवेकानन्द की तरह एक बार पूरी मजबूती से अपनी समस्याओं. डर और अपनी असुरक्षा के सामने खडे तो हो जाइए. फिर देखिए जीत किसकी होती है । यकीनन बाजी आपके हाथ ही होगी ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन में बहुत सी समस्याओं के प्रति भी व्यक्ति का इसी तरह का पलायनवादी रवैया होता है.

    सटीक

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  2. । डर की तरफ पीठ करना या उससे भागना उसकी शक्ति को दोगुना कर देता है बहुत दिनों बाद पढ़ा आपको ..सार्थक लिखा है सही और सच्चा ..बधाई

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