गुरुवार, 10 जनवरी 2008

मासूम सपनों से खिलवाड़



डॉ. महेश परिमल
आज का दौर रिकॉर्ड का है। एक रिकॉर्ड तैयार करो फिर उसे तोड़ने के लिए दूसरा रिकॉर्ड बनाओ। बस यूं ही एक के बाद एक रिकॉर्ड बनाते जाओ और सुर्खियों में छा जाओ। इसमें अब बड़े ही नहीं बच्चे भी शामिल हो गए हैं या यूं कहें कि शामिल कर लिए गए हैं। आज रिकॉर्ड बनाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। देखें इन रिकॉर्डो की एक झलक इन सुर्खियों में-
-नन्हें बुधिया द्वारा लगातार 64 किलोमीटर तक दौड़ने का रिकॉर्ड।
-एक बच्ची द्वारा चालीस घंटे तक रोटियाँ सेंकने का रिकॉर्ड।
-सात साल की बच्ची द्वारा भोपाल के बड़े ताल का एक बड़ा हिस्सा बिना रूके तैरकर पार करने का रिकॉर्ड।
-इंदौर की एक बच्ची ने बनाया लगातार गाने का रिकॉर्ड।
-इसी रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए खंडवा की एक बच्ची द्वारा लगातार गाने का रिकॉर्ड
-लगातार कई घंटो तक हनुमान चालीसा लिखने का रिकॉर्ड।
हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार 57 प्रतिशत लोगोेंं का मानना है कि बच्चों में रिकॉर्ड बनाने की भावना के पीछे माता-पिता दोषी हैं। समझ में नहीं आता कि इस तरह के रिकॉर्ड बनाकर ये मासूम समाज में किस तरह का बदलाव लाने की सोच रहे हैं। ये मासूम आज अपने पालकों की अपेक्षाओं के बोझ से इतने अधिक लद गए हैं कि कई बार उन्हें अपना आत्मसम्मान ही नहीं, बल्कि अपनी जान भी देनी पड़ रही है। कलकत्ता का ही उदाहरण हमारे सामने है, जिसमें पालक दीपक भट्टाचार्य अपने ही पुत्र विश्वदीप भट्टाचार्य की हत्या के आरोप में इन दिनों जेल में बंद हैं। विश्वदीप टेबल-टेनिस का होनहार खिलाड़ी था। जिला एवं राज्य स्तरीय खेलों में अपने अनूठे प्रदर्शन से उसने कई प्रतियोगिता जीती। होनहार पुत्र को अभिभावकों की तरफ से प्रोत्साहन तो दिया ही जाता है। किंतु विश्वदीप को उनके पिता द्वारा प्रोत्साहन के रूप में पाशविक दबाव मिला। कई बार जब उसका प्रदर्शन ठीक नहीं होता, तब उसके पिता उसे खूब मारते, पिटाई इतनी अधिक हो जाती कि वह दर्द से बिलबिला उठता। अभी कुछ दिन पहले ही एक स्पर्धा में विश्वदीप हार गया। इससे उसके पिता दीपक भट्टाचार्य ने उससे जमकर प्रेक्टिस करवाई। यह प्रेक्टिस उसे महँगी पड़ी, वह हाँफने लगा। उसकी हालत देखकर उसकी माँ और बहन ने उसे अस्पताल पहुँचाया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी, डॉक्टर ने विश्वदीप का परीक्षण कर बताया कि विश्वदीप की जान जा चुकी है। उसका नाता इस दुनिया से टूट चुका है। सोचो, उसकी माँ पर क्या गुजरी होगी? उनका एकमात्र कुल दीपक बुझ गया। विश्वदीप की माँ और बहन के ही बयानों के आधार पर दीपक पर पुत्र विश्वदीप की हत्या का आरोप है।
ये एक उदाहरण है, आज के प्रतिस्पर्धी समाज की अतृप्त भूख और प्यास का। इस चक्कर में न जाने कितने मासूम अपने अभिभावकों के अत्याचार का शिकार हो रहे हैं। जहाँ निठारी में हुए मासूमों के जीवन के साथ होने वाले खिलवाड़ की चारों ओर निंदा हो रही है, वहीं अपने ही कुलदीपक को बुझाने की तैयारी करने वालों पर किसी की दृष्टि ही नहीं जा रही है। ये मासूम अपने ही घर में प्रताड़ित हो रहे हैं, अपनों द्वारा ही ठुकराए जा रहे हैं, अपनों से ही प्यार और दुलार के बजाए उन्हें मिल रहा है सख्त अनुशासन के नाम पर पिटाई का तोहफा।
अक्सर ऐसा होता है कि पालक अपनी इच्छाओं को अपने ही संतानों के माध्यम से पूरी करने का सपना देखते हैं। उनका मानना होता है कि जो हम नहीं कर पाए, वह हमारी संतान के माध्यम से हो, तो बुरा क्या है? लेकिन अनजाने में ही वे अपनी संतान पर किस तरह से अपनी अपेक्षाओं का बोझ लाद देते हैं, इसका उन्हें जरा भी आभास नहीं होता। वे समझते हैं कि हमारी अपेक्षाओं को उनकी संतान ने अच्छी तरह से समझा है, इसलिए वे उन पर अनजाने में ही एक प्रकार का दबाव बनाने लग जाते हैं। यही अनजाना दबाव ही मासूमों पर किस कदर भारी पड़ता है, यह उपरोक्त उदाहरण से ही स्पष्ट है।
भोपाल के ताल को काफी हद तक तैरकर पार करने वाली नन्हीं मासूम रिकॉर्ड बनाने के दौरान लगातार रोती और चीखती रही, पर उसकी मासूम चीखें ताल की लहरों में ही खो गई। उसके अभिभावकों पर उन चीखों का कोई असर नहीं हुआ। वे तो उस सात साल की मासूम से रिकॉर्ड बनवाना चाहते थे। रोटियाँ सेंकने वाली मासूम लगातार गैस के सम्पर्क में आने से बेहोश हो गई, पर उसका बेहोश होना उनके पालकों को होश में नहीं ला पाया। इसी तरह लगातार गाने का रिकॉर्ड बनाने वाली किशोरी की स्वर नलिका में कुछ खराबी आ गई, पर इस खराबी ने भी उनके अभिभावकों को सावधान नहीं किया। ये कैसा जुनून है, जिसकी चकाचौंध तो पालकों के भीतर है, पर भेंट उनके मासूम चढ़ते हैं।
आने वाला समय उन अभिभावकों के लिए चेतावनी भरा है, जो अपने बच्चों पर अपनी अपेक्षाओं और इच्छाओं का बोझ लाद रहे हैं। अभी तो मानव अधिकार आयोग का ध्यान इस दिशा में नहीं गया है। उधर मेनका गांधी भले ही जानवरों पर होने वाले अत्याचारों पर अखबारों में स्तंभ लिख रहीें हों, पर सच तो यह है कि घर की ही चारदीवारी के भीतर सिसकते और छटपटाते मासूमों की अनसुनी चीखों को कोई समझने को ही तैयार नहीं है। यही हाल रहा और पालकों अपने मासूमों पर अत्याचार करते रहे, तो वह दिन दूर नहीं, जब अनसुनी चीखों का शोर सोए हुए समाज को झंझोड़कर रख दे। पालकों से यही आग्रह है कि मासूमों पर अपेक्षाओं का बोझ लादने के पहले यह सोच लें-
अभी तो ये कोरी मिट्टी है
अभी तो इसमेें पानी डालना है
अभी तो इसे ठीक से सानना है
अभी तो इसे एक आकार देना है
मत रौंदो इसे अपने क्रूर हाथों से
इन्हीं हाथों से सहलाना अभी बाकी है
टूटती हुई जिंदगियों को जोड़ना अभी बाकी है।
डॉ. महेश परिमल

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