शुक्रवार, 25 जनवरी 2008

आज भी कदम थाम लेते हैं, पुराने सुरीले गीत



डॉ. महेश परिमल
उस दिन गानोें को लेकर युवा पुत्र से बहस हो गई, वह हिमेश रेशमिया के गीत सुनना चाहता था, मैं पुरानी फिल्मों के गीतों का शौकीन हूँ. आखिर बहस को विराम देने के लिए मैं पुत्र की पसंद को आगे रखा और उसकी पसंद के दो गीत सुने, उसके बाद मैंने अपनी पसंद के दो गीत सुने। उसमें से एक गीत था कवि प्रदीप का लिखा और गाया गीत- देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान और दूसरा गीत था एस.डी. बर्मन की आवाज का सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा....। इन गीतों को सुनने के बाद मैंने पुत्र से पूछा- बेटे, अब तुम ईमानदारी से बताओ कि तुम्हें कौन-से गीत अच्छे लगे? पुत्र ने जवाब दिया- पापा, आप जीत गए।
मुझे पुत्र से जीतना अच्छा नहीं लगा, मैं उससे हार जाता, तो अधिक खुशी होती। पर गीतों के माधुर्य की दृष्टि से पुत्र को पुराने फिल्मी गीतों का महत्व समझाना था, इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा। इस घटना के बाद मन में यह विचार आया कि आखिर पुराने गीत इतने अच्छे क्यों लगते हैं? क्यों नहीं हम आज के गीतों के साथ अपने आप को जोड़ना चाहते? क्या कारण है कि आज के गीत दस दिन बाद याद ही नहीं रहते और पुराने गीत बरसों-बरस बाद भी न केवल याद हैं, बल्कि उसे सुनते ही मन में अच्छे विचारों का प्रादुर्भाव भी होने लगता है। उन गीतों का संगीत ही नहीं, बल्कि गीत के शब्द भी कचोटने लगते हैं. इसके अलावा फिल्म मेें गीत जहाँ पर सुनाई पड़े हैं, उनकी सिचुएशन भी कितनी अच्छी बन पड़ी है, मानो वह गीत उसी सिचुएशन के लिए ही लिखा गया हो। पुराने गीतों में भावों की ऐसी लहरें उठती हैं कि उसमें डूब जाने का मन करता है, पर आज के गीतों को सुनकर लगता ही नहीं कि हम कोई गीत सुन भी रहे हैं।
आज कई टीवी चैनलों में फिल्मी गीतों से जुड़े कार्यक्रम और संगीत से जुड़ी प्रतिभाओं की खोज के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि आज के युवा इन कार्यक्रमों में पुराने गीतों का ही सहारा लेते हैं, इन्हीं गीतों से उनकी वास्तविक प्रतिभा की पहचान हो रही है। सुरों का उतार-चढ़ाव कहें या फिर राग की बारीकियाँ पुराने गीतों को गाने से ही समझी जा सकती हैं। पुराने गीतों में एक-एक शब्द का सही उच्चारण पूरे भाव के साथ सुनाई पड़ता है, पर आज के गीतों में संगीत इतना हावी है कि पता ही नहीं चलता कि गीत के बोल क्या हैं? फिर भाव तलाशना तो दूर की बात है।
आज यहाँ दो गायकों की ही चर्चा। इनमें से एक स्वयं गीतकार भी थे और दूसरे गायक होने के साथ-साथ संगीतकार भी थे। ये दोनों आज इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनके गीतों की मिठास आज भी पूरे विश्व में घुली हुई है। इनके गीत आज भी जहाँ भी सुनाई पड़ते हैं, लोग सहसा रुककर उसे पूरी तल्लीनता के साथ सुनना चाहते हैं। एक कवि प्रदीप और दूसरे बर्मन दा। कवि प्रदीप का कोई भी गीत सुन लो, उनके कंठ में मानों सरस्वती का वास हो। उनकी गीतों की निर्झरिणी ऐसे बहती है, मानों कोई वीतरागी अपनी ही धुन में कुछ गा रहा हो। समाज की कड़वी सच्चाई हो या फिर प्रेम की गहराई, मधुर कंठ के साथ जब मधुर भाव भी जुड़ जाते हैं, तो एक चमत्कार पैदा होता है। यही चमत्कार पुराने गीतों में आज भी दिखाई देते हैं। याद कर लें, वह गीत- सुख-दु:ख दोनों रहत जिसमेें, जीवन है वो गाँव। कभी धूप तो कभी छाँव। इसके अलावा फिल्म जागृति का वह गीत- आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो, यह धरती है बलिदान की। अधिक दूर जाने की आवश्यकता ही नहीं है। राष्ट्रीय पर्व पर हमेशा बजने वाला गीत- ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा ऑंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी। इस गीत को लिखने के पहले कवि प्रदीप ने किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, यह बहुत कम लोग जानते हैं। यह गीत तब लिखा गया था, जब भारत, चीन से युध्द हार गया था। सैनिकों के हौसले पस्त हो चुके थे, पूरा देश निराशा के दौर से गुजर रहा था। तब प्रदीप जी को लगा कि एक गीत की रचना होनी चाहिए, जिससे कम से कम सैनिकों के हौसले बुलंद हों, देश निराशा के गर्त से उबर जाए। तब केवल कुछ पंक्तियाँ ही उन्हें सूझी और उन्होंने उसे सिगरेट के पैकेट पर ही लिख लिया। आगे की पंक्तियों के लिए उन्हें एक तरह की मानसिक यंत्रणा से होकर गुजरना पड़ा। आखिर गीत तैयार हुआ, जब इसे लता जी ने दिल से गाया,तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की ऑंखों में ऑंसू आ गए। यही गीत की सफलता है कि वह आज हमारे शरीर पर सिहरन पैदा कर देता है। इस गीत के एक-एक शब्द को ध्यान से सुना जाए, तो ऑंखें भर आएँगी, यह तय है। 'तेरे द्वार खड़ा भगवान, भगत भर दे रे झोली', 'हमने जग की अजब तस्वीर देखी, एक हँसता है दस रोते हैं', 'कोई लाख करे चतुराई, करम का भेद मिटे ना रे भाई', 'पिंजरे के पंछी रे, तेरा दरद न जाने कोय' आदि मुट्ठी भर चंद गीत ही हैं, जो हमें समय-समय पर सुनाई पड़ते रहते हैं, लेकिन आज भी अपनी माटी की सौंधी महक के साथ हमारी साँसों में समाए हुए हैं।
अब दूसरे गायक को लें, ये हैं सचिन देव बर्मन। इन्होंने अपने सुरीले संगीत के माध्यम से सांथाल और भटियाली लोक संगीत के साथ बाऊल साधू संगीत की उपासना की। इनके गीतों का स्वर यह कहता है कि दिल की गहराइयों से गाया जाने वाला गीत कभी बेसुरा नहीं होता। इनके गीत आज भी हमें यह अहसास कराते हैं कि जीवन मिटने का नहीं, मिट-मिटकर उबरने का नाम है। इनका सबसे पहला हिट गीत किसे माना जाए, निश्चित ही फिल्म सुजाता का- सुन मेरे बंधु रे , सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे, इस गीत में वायब्रोफोन और इकतारा जैसे बंगला वाद्य यंत्रों के अलावा किसी अन्य का प्रयोग नहीं किया गया है, परन्तु सचिन दा के कंठ की मोहिनी क्षण भर में ही सुनने वाले को मुग्ध कर देती है। गीत की कुछ पंक्तियों में सचिन दा एक शीर्ष के गांधार तक एकाएक पहुँच जाते हैं (संगीत में सा, रे के बाद का तीसरा स्वर) प्रत्येक शब्द के भाव को सचिन दा का कंठ हू-ब-हू प्रस्तुत करता है। हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में ऐसे गीत बहुत ही कम सुनने को मिलते हैं।
सचिन दा के सभी गीतों में सुदूर गाँव की माटी का सौंधापन समाया हुआ है। सभी गीतों में कम से कम वाद्य यंत्रों का प्रयोग हुआ है। मात्र गायक का कंठ और गीतों की उर्मिल अभिव्यक्ति झलकती है। 'वहाँ कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ', अल्ला मेघ दे पानी दे, प्रेम के पुजारी हम हैं रस के भिखारी, मोरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, सफल होगी तेरी आराधना, काहे को रोये, इन सभी गीतों में मात्र गायक और उसके शब्दों की संवेदनाओं का ही अनुभव होता है। यह सच है कि इनके गीतों को ऊँगलियों में गिना जा सकता है, लेकिन इनकी बराबरी करने के लिए दुनिया के लाखों गीत भी कम हैं।
इन दोनों गायकों की अपनी शैली और अपनी भावाभिव्यक्ति है। आवाज की बुलंदी और मिठास भी सबसे अलग है। उनकी तुलना किसी और गायक के साथ नही की जा सकती। गायकों की भीड़ में ये दो अलग स्वर हैं। इनकी विशेषता भी यही है कि इनकी नकल आज तक नहीं हुई। जिस तरह से हिंदी साहित्य में कबीर की नकल नहीं हुई, ठीक उसी तरह से कवि प्रदीप और सचिन दा की आवाज की नकल नहीं हुई। पर यह सच है आज भी इनके गीत हृदय को शश्ंति देते हैं. मन जब उदास हो, तो इनके गीत कहीं न कहीं ये भाव जगतो हैं कि जीवन निराश होकर बैठने के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष करने का दूसरा नाम है. यही कारण है कि लोग आज भी पुराने गीतों के इतने अधिक शौकीन हैं कि दूसरे गीत उन्हें सुहाते ही नहीं.
सुरीले कंठ से निकलने वाले गीतों की बात यही तक..
डॉ. महेश परिमल

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