गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

मोबाइल की गिरफ्त में जकड़ा आज का युवा

डॉ. महेश परिमल
आज मोबाइल युवा वर्ग के लिए एक नषे के रूप में सामने आ रहा है। मोबाइल उस पर इस तरह से हावी हो गया है कि उसे इसके बिना अपना जीवन ही अधूरा लगने लगा है। यही कारण है कि आज युवा मोबाइल के जाल में फँसता जा रहा है। मोबाइल का साथ एक बीमारी है, यह जानने में अभी वक्त लगेगा, लेकिन इसकी पदचाप से स्पश्ट है कि कुछ ही समय बाद इसका जादू सर चढ़कर बोलेगा।अभी हममें से बहुत कम लोग जानते होंगे कि सोषल एंजाइटी डिसऑर्डर नाम का कोई मानसिक रोग होता है, लेकिन कुछ समय बाद आम आदमी भी जान जाएगा कि यह रोग इंटरनेट और मोबाइल के अतिरेक से होता है। अभी तो इस रोग के केवल लक्षण ही दिखाई दे रहे हैं, लेकिन भविश्य में यह रोग एक महामारी के रूप में विष्व के सामने आएगा, इसमें कोई दो मत नहीं।
आज इस मोबाइल के कारण लोगों ने आपस में मिलना छोड़ दिया है। पूरा दिन एक कमरे में ही मोबाइल के माध्यम से मित्रों से बातचीत में ही निकल जाता है। जहाँ बातचीत नहीं हो पा रही हो, वहाँ एसएमएस से ही काम चलाया जा रहा है। कई बार कमरे में मोबाइल का सिगनल न मिलने के कारण छत या बाल्कनी मेें आकर बात करने का जुनून इस कदर हावी हो जाता है कि वे अपना संतुलन नहीं रख पाते और गिर पड़ते हैं। मुम्बई में रहने वाली 16 वर्शीय किषोरी या कह लें युवती रागिनी को कुछ समय पहले ड्रग्स नहीं, बल्कि मोबाइल के नषे की गिरफ्त में थी।यह नषा उसके लिए इतना मादक था कि 24 घंटों में से उसके 16 घंटे मोबाइल पर बात करते ही बीतता था।वह अपने सेलफोन के साथ एक कमरे में कैद होकर दिन भर कॉलेज के मित्रों से बातचीत करती या फिर एसएमएस करती।इस नषे से वह इतनी अधिक आक्रांत थी कि वह अपने मित्रों और स्नेहीजनों से मिलने से कतराती रहती। मुम्बई जैसे महानगर में जिस परिवार में पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करते हों, तो उस परिवार में आप में बात बहुत ही कम हो पाती है। रागिनी जब 12 वर्श की थी, तभी उसके माता-पिता ने उसे मोबाइल थमा दिया।उन्हें जब भी वक्त मिलता, अपनी बेटी से बात कर लेते।कुछ वर्श बाद जब रागिनी कॉलेज पहुँची, तब तक ये मोबाइल उसके लिए एक व्यसन हो गया था।एक बार रागिनी ने मोबाइल के नए सेट के लिए अपने पिता से जिद की।पिता ने अपनी विवषता का वास्ता देते हुए नया मोबाइल खरीदने से मना कर दिया।बिटिया को यह बुरा लगा।कुछ दिनों बाद उसने घर में उनके एक रिष्तेदार का आना हुआ, रागिनी ने उसके जेब से रुपए निकाल लिए। स्वाभिमान पिता के लिए यह एक आघात था। उसने अपनी बेटी के पास से मोबाइल वापस ले लिया। बिटिया के हाथ से मोबाइल क्या निकला, उसकी तो पूरी जिंदगी ही बदल गई। उसके लिए तो मानो आसमान ही टूट पड़ा।मोबाइल के बिना जिंदगी कैसे जिया जा सकता है, इसकी तो उसने कल्पना ही नहीं की थी। वह डिप्रेषन में आ गई और इस अवस्था में उसने ब्लेड से अपनी कलाई की नस काट ली। पूरे एक महीने तक उसका इलाज हुआ और वह स्वस्थ हो गई, पर मोबाइल के व्यसन से पूरी तरह से मुक्त होने में उसे एक महीने और मनोचिकित्सक की देखरेख में रहना होगा।
मोबाइल की गिरफ्त में जकड़ी यह एक किषोरी की कहानी नहीं है, इस तरह की स्थिति आज के युवा होते बच्चों में विषेश रूप से देखी जा रही है। ये बच्चे इंटरनेट और मोबाइल की दुनिया में इस तरह से रम गए हैं कि बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कटने लगे हैं।यह षराब और ड्रग्स से भी भयंकर व्यसन है। आज के पालक इस बात पर भले ही गर्व कर लें कि उनकी संतान के पास मोबाइल है, पर निकट भविश्य में यही बताते हुए उन्हें षर्म आएगी, यह तय है। जो युवा मोबाइल की इस महामारी की गिरफ्त में हैं, उनके लक्षण सामने आने लगे हैं। ऐसे लोग किसी से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते, स्वस्थ संबंध निभाना वे भूलने लगे हैं, मोबाइल के इस नषे के कारण वे उसका बिल भरने के लिए घर में ही चोरी करते हैं या फिर बाहर असामाजिक तत्वों के सम्पर्क में आने लगते हैं। आष्चर्य की बात यह है कि इस तरह की हरकतें करते हुए उन्हें बुरा भी नहीं लगता।
अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएँ, तो पाएँगे कि यह मोबाइल लोगों पर किस तरह से हावी है। नई नवेली दुल्हन के साथ पतिदेव हनीमून के लिए गए और वहाँ मोबाइल पर अपने व्यावसायिक मित्रों से बात करते रहे, इससे हनीमून का मजा ही किरकिरा हो जाता है।बाइक चलाते हुए गरदन तिरछी कर मोबाइल पर बात करते हुए हम रोज ही युवाओं को देखते हैं, इनसे अधिक दुर्घटनाएँ भी हो रहीं हैं।हम अपने किसी मित्र से मिलने जाएँ और वह मोबाइल पर अपने मित्रों से लगातार बात करता रहे, तो इसे हम अपनी उपेक्षा मानते हैं। संभव है मित्र आपकी उपेक्षा करने के लिए ही मोबाइल पर अपने तथाकथित मित्रों से बात करता हो।अस्पताल में मरीज को देखने जाने वाले अक्सर अपने मोबाइल में ही उलझे रहते हैं, मरीज का हाल-चाल पूछना एक तरफ रह जाता है।नेटवर्क न मिलने के कारण लोग अपनी बाल्कनी या छत पर इतना झुक जाते हैं कि कब क्या हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। बाजार में तो और भी अजीबो-गरीब नजारे देखने को मिलते हैं। सब्जी वाले के सामने ही पति, पत्नी से एक-एक सब्जी के बारे में पूछता रहता है। महिलाएँ तो बाजार में जाकर मोबाइल से ऐसे उलझती हैं कि वे बिना मोल-भाव के चीजें खरीद लेती हैं।इस चक्कर में कई बार वे आवष्यक चीजें खरीदना ही भूल जाती हैं।क्लॉस रूम में तो युवा मोबाइल से एसएमएस करके अपने षिक्षक की खिल्ली उड़ाते रहते हैं। कई लोग तो एक से अधिक मोबाइल फोन लेकर घूमते दिखाई देते हैं, ये भूल जाते हैं कि वे एक मानसिक बीमारी के षिकार बन गए हैं। इसी बीमारी को कहते हैं सोषल एंजाइटी डिसऑर्डर। ऐसे लोगों मेें आत्मविष्वास की बेहद कमी होती है। ये लोगोें से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते। किसी से मिलने में ये लोग अक्सर टाल-मटोल करते हैं। उनसे बात करने के लिए उनके स्वजनों को मोबाइल से सम्पर्क करना पड़ता है।फोन पर अपनी कमजोरियों को छुपाए रखने में कामयाब ये लोग रु ब रु मिलने पर कतराते हैं, क्योंकि इससे उनकी कमजोरियाँ सामने आ जाएँगी।
एक मनोचिकित्सक का कहना है कि आजकल उनके पास इलाज के लिए आने वाले 40 प्रतिषत लोग इसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं।इस रोग से ग्रस्त लोगों के षरीर से पसीना छूटना, दिल की धड़कन अचानक बढ़ जाना, सिर दर्द और घबराहट होना मुख्य लक्षण हैं। मोबाइल और इंटरनेट के बीच ये अपने आपको सुरक्षित पाते हैं।युवा तो कॉलेज जाना टालते हैं, नौकरीपेषा लोगों में आत्मविष्वास की कमी के कारण वे किसी भी काम को पूरे विष्वास के साथ नहीं कर पाते, इसलिए कई बार वे अपनी नौकरी ही गुमा बैठते हैं।महानगरों के हाल आजकल बहुत बुरे हैं। नौकरीषुदा पति-पत्नी दिन भर तो फोन पर ही बतिया लेते हैं, रात को जब घर आते हैं, तो उनके पास बात करने का कोई विशय ही नहीं होता।टीवी देखकर सोने चले जाते हैं, और रात में कई बार जाग-जागकर एसएमएस चेक करते हैं। इससे दाम्पत्य जीवन की उश्मा कम हो जाती है।ये मोबाइल सबसे तो बात करा देता है पर कभी खुद से बात नहीं करवाता। स्वजनों के साथ हमारी कम्युनिकेषन लिंक टूटती जा रही है, इस लिंक को फिर से जोड़ दे, ऐसी कोई सर्विस है, क्या आप इस बारे में जानते हैं, यदि जानते हैं, तो अवष्य बताएँ।
; डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. SAHI BAT HAI. MAIN NE APNA MOBILE BEND KIYE 2 MAHINE HUWE, AB BAGAIR MOBILE KE KHUSH HON :)

    SHUAIB.
    http://shuaib.in/chittha

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  2. मोबाइल के नुकसान जितने आपने गिनाए उनसे सहमत है पर एक फ़ायदा ये है कि आप कहीं भी रहें लोगों से आप बात कर सकते है।हर जगह एस.टी.डी.बूथ ढूँढने की जरुरत नही होती।

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