मंगलवार, 25 दिसंबर 2007

खुशियों को गले लगाएँ

भारती परिमल
इंसान को हर क्षण जिसकी तलाश होती है, वह उसे पाना चाहता है, पर उसे मिलती नहीं, उसे पाने के लिए इंसान एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है, पर उसके हिस्से में वह चीज कम ही आ पाती है. जानते हैं क्या है वह चीज, वह अदृश्य चीज हे खुशी. होती तो यह हमारे भीतर ही है, पर हम उसे तलाशते रहते हैं वहाँ, जहाँ वह होती ही नहीं. बल्कि उसे तो हमारे भीतर ही पाया जा सकता है.
खुशी एक अहसास है, एक ऐसा अहसास जिसे केवल महसूस किया जा सकता है, इसे दिखाया नहीं जा सकता क्योंकि जो दिखाया जाता है, वह केवल उसका बनावटीपन ही होता है. प्रदर्शन में खुशी अपनी मौलिकता खो देती है. लेकिन फिर भी यह जीवन की रीत है कि इंसान की खुशी भी उसके स्वभाव में झलकती है और उसका गम भी छुपाए नहीं छुपता.
आखिर यह खुशी है क्या? इसे बाजार में तो बिकते नहीं देखा? न किराने की दुकान, न सुपर मार्केट और न ही इंटरनेट कैफे पर यह मुँहमाँगी कीमत पर भी देखने को नसीब हुई. फिर आखिर इसे हम लाएँ कहाँ से? बड़ी सीधी और सच्ची बात है, यह जो दो अक्षर की छोटी-सी खुशी है, वह न तो सुपर मार्केट की शोभा है और न ही इंटरनेट पर क्रेडिट कार्ड पर बिकने वाला खुबसूरत उपहार. यह तो मनुष्य के मन के भीतर की आवाज है, एक गुनगुनाहट है, सुर है, ताल है और झंकार है. खुशी बाहर ढूंढ़ने से नहीं मिलती. यह कस्तूरी मृग की तरह मन के भीतर छुपी होती है. इसकी सुगंध जब बिखरती है, तो पूरा जीवन महक उठता है. खुशी एक कुदरती शक्ति है, जो जीवन को सबल बनाती है.
कई बार ऐसा होता है कि मनुष्य जीवन के कुएँ को आंसुओं से लबालब देखकर दु:खी हो जाता है, हताश हो कर वह कुछ भी नहीं सोच पाता किंतु इसी कुएँ के जगत के पास उग आई छोटी सी दूब को देखोगे, तब उसे एक बार अपने हाथों से छूकर देखने की कोशिश करना, कितना मुलायम सा अहसास होगा. यही है खुशी. अब इसी दूब को प्यार से सहलाओ, तब आपको लगेगा कि अरे! इसे ही तो मैं ढूँढ़ रहा था. काश पहले ही कुएँ के बजाए इसे देख लेता, तो हताशा ही फटक नहीं पाती.
खुशी और गम एक सिक्के के दो पहलू हैं, इन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. जीवन के तराजू में हम खुशी और गम के बीच लटक रहे हैं. कभी खुशी का पलड़ा भारी होता है, तो कभी गम का, लेकिन दोनों ही हालात में हमारा लटकना तय है. हम जिस छोटे से मिट्टी के गमले में फूल उगाकर उसकी महक से खुश होते हैं वही गमला कभी कुम्हार की भट्टी में तपकर गम के अहसास को छूकर पकता है और हमें इस सुगंध का हकदार बनाता है. बंसी की जो धुन मन को मोह लेती है, हमें आत्मिक सुख या खुशी देती है, उसी बंसी को अपनी छाती में तेज धारदार चाकू का प्रहार झेलना पड़ता है. पीड़ा की यही छटपटाहट ही बाद में कोमल संगीत पैदा करती है. जब यही बंसी किसी दु:खी इंसान के होठों से लगती है, तो दर्द की रागिनी छेड़ती है.
आशय यह है कि हम केवल परिणाम को ही देखते हैं. सृजन के पीछे की पीड़ा हम देखना ही नहीं चाहते या देखकर भी अनदेखा कर जाते हैं. ये सच्चाई हमारी ईमानदारी पर चोट करती है, नतीजा यह कि हम न तो पूरी तरह से खुश हो पाते हैं और न ही पूरी तरह से दु:खी.
कहते है कि स्त्री धरती की तरह होती है, किंतु केवल स्त्री को ही नहीं इस पूरे मानव समुदाय को धरती की तरह होना चाहिए. धरती जो अपनी छाती पर हल की नोक से एक टीस के साथ पीड़ा झेलती है, इसके परिणाम में वह हल चलाने वाले को देती है एक लहलहाता विश्वास. उसी तरह इंसान को भी अपना दु:ख-दर्द छुपाकर हमेशा खुशियों को बिखेरने वाला होना चाहिए. खुशी को जितना बाँटोगे, वह दोगुनी हो कर हमारे पास आएगी.
खुशी वहीं हैं, जहाँ हमारी इच्छाएँ हैं, हमारे सपने हैं यानि कि हमारे मन में, हमारी ऑंखों में, विचारों में, व्यवहार में, पल-पल बीतते पलों में और लम्हों में. बस जरुरत है चिंताओं की लकीरों को कुरेद कर इस खुशी को नया आकार देने की. हमारे आसपास का वातावरण जो हमें उदासी या गम देता है, कई बार उसी वातावरण में पूरी तरह से डूब जाने पर, उसके प्रति स्नेह जगाने पर हमें उसी गम में बेपनाह खुशी महसूस होती है.
खुशी को अपना बनाए रखने के कुछ टिप्स :-
1. जब आप बेहद उदास हाें, तो कोई गीत गुनगुनाएँ या अपनी पसंद का संगीत सुनें. गीत या संगीत भी ऐसा, जो उदासी से भरा न होकर खुशियों से सराबोर हो.
2. प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है, एकांत में बैठ कर प्रार्थना करें या उन लोगों को दिल से दुआ दें, जिन्हें आप बिल्कुल नहीं जानते. एक नन्हीं चींटी से लेकर अनदेखा- अनजाना रोबोट भी अपनी दुआ में शामिल करें.
3. दृढ़तापूर्वक यह सोचें कि खुश होना सबका हक है और उन सभी में मैं भी शामिल हूँ.
4. जीवन में बीते हुए दिनों के खुशी के पलों को याद करें, यदि पुरानी डायरी या एलबम भी होें, तो उसकी मदद लें.
5. छोटे बच्चों के साथ समय बिताएँ और उनकी समस्याओं को ध्यान से सुनें.
6. स्वयं को प्रकृति से जोड़ें. पक्षियों का कलरव, बादलों का आकार, उगते या डूबते सूरज की रक्तिम आभा से लाल हुए आकाश को निहारें.
7. आप जब अपने ध्येय को लेकर डटे हुए थे, तब कितनों ने आपका साथ दिया था, और उसे पूरा करने में आप कितने सफल रहे थे, उसे याद कर फिर से अपने भीतर नई ऊर्जा लाने का प्रयत्न करें.
8. जीवन में प्राप्त की गई सफलताओं को याद करें.
9. अपने बचपन के दिनों को याद करें, जो आपको सबसे प्यारे हों.
10. अपने पुराने शौक जिन्हें आप छोड़ चुके हैं, उन्हें फिर से उभारने का प्रयास करें.
11. अपनी असफलताओं को याद करें, यहीं हमें बताएँगी कि हमने किस तरह उन पर विजय प्राप्त की थी.
12. महापुरुषों की जीवनी पढ़ें, आप पाएँगे कि ये तो हमसे भी अधिक विफल हुए हैं.
13. अपने आप से बात करें. इस स्थिति में हम खुद के साथ होंगे. तब हमारे भीतर का इंसान बातचीत में बाहर आएगा और हमें नए रास्ते सुझाएगा.
14.बचपन की वह मार याद कीजिए, जो आपको किसी गलती पर पड़ी थी. आप सोच-सोचकर रोमांचित हो उठेंगे.
15. अपनी तमाम बेवकूफीभरी शरारतों को याद करें, आप पाएँगे कि कितने सुहाने थे वे दिन. इन्हीं दिनों की याद आपको अतीत की सैर करा देगी, और आप तरोताजा हो जाएँगे.
भारती परिमल

1 टिप्पणी:

  1. बहुत प्रभावशाली लेख.... एक एक वाक्य राह दिखाता है.

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