गुरुवार, 13 दिसंबर 2007

चेटिंग के समुद्र में अपनेपन की लहरें

डा. महेश परिमल
आज का युग चेटिंग का है. इसके शिकंजे में युवा पीढ़ी तो पूरी तरह से जकड़ चुकी है, परंतु इस दिशा में पालकों ने सकारात्मक सोच का प्रदर्शन किया है. अब उनके लिए चेटिंग किसी तरह का रोग नहीं है, बल्कि अपने बच्चों की खैरियत जानने का एक सस्ता सुलभ साधन बन गया है. आज के पालक इसका बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं. अब उनका बच्चा भले ही सात समुंदर पार हो, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि चेटिंग के माध्यम से वे रोज ही अपने बच्चे से घंटों तक बात कर लेते हैं. यही नहीं बच्चे के दोस्तों से भी उनकी अच्छी नोकझोंक होते रहती है. अब दूर होकर भी उनका बच्चा बेगाना नहीं है, हर पल उनके माता-पिता उसके साथ हैं.
मेरे एक परिचित हैं, जिनका बेटा ऑस्ट्रेलिया में है, पर वहाँ रहते हुए भी उनका बेटा उनसे कतई दूर नहीं है, उनका बेटा रोज ही उनसे बात करता है. उसने आज क्या-क्या किया, क्या खाया, क्या पीया, कहाँ घूमा, क्या पढ़ाई की. आदि बातें वह चेटिंग के माध्यम से अपने माता-पिता को बताता है. ये सब उनके माता-पिता भारत के एक शहर में बैठे-बैठे चेटिंग के माध्यम से सुन लेते हैं और अपने कंप्यूटर पर देख भी लेते हैं. इससे उनका बेटा विदेश में भी अकेलापन महसूस नहीं करता.
अब कंप्यूटर की आधुनिक टेक्नालॉजी के द्वारा यह सब आसान हो गया है. अपने संतानों की सतत चिंता करने वाले और कदम-कदम पर उन्हें मार्गदर्शन देने वाले अभिभावक इस टेक्नालॉजी का भरपूर उपयोग कर संतोष और राहत का अनुभव करने लगे हैं. मेरे परिचित बताते हैं कि उनका बेटा भले ही ऑस्ट्रेलिया में हो, पर हमारे लिए वह अभी भी नासमझ ही है. उसे सात समुंदर दूर भले ही भेजा हो, पर उसे कभी अकेलापन न सताए, कभी वह मुश्किलों से न घिर जाए, इसके लिए वे उसके साथ सतत टेलीफोनिक चेटिंग करते रहते हैं. केवल वे ही नहीं, बल्कि बच्चे की माँ और उसके भाई-बहन भी उसके साथ बात करके और उसे सजीव देखकर बहुत खुश होते हैं. इतनी दूरी होने के बाद भी उन्हें कभी लगा नहीं कि वह हम सबसे दूर है. कंप्यूटर की यह सुविधा वास्तव में लाभदायक है, टेक्नालॉजी का सकारात्मक उपयोग इसे ही कहते हैं.
एक बार जब उसी परिचित के घर जाना हुआ, तो उन्होंने अपने चेटिंग के माध्यम से अपने पुत्र से बातचीत करवाई. तब उनके पुत्र ने बताया कि ई-मेल के माध्यम से तो मैं सतत ही अपने घरवालों के सम्पर्क में रहता हूँ. इसके अलावा सप्ताह में दो से तीन बार वेबकेम और टेलीफोनिक चेटिंग के द्वारा एक-दूसरे से प्रत्यक्ष मिलने का भी अनुभव कर लेते हैं. इससे इतनी दूर न तो अकेलापन सालता है और न ही माता-पिता, भाई-बहन की कमी खलती है. इस टेक्नालॉजी के कारण विदेश में पढ़ाई करने वाले युवा और उनके परिवार के सदस्य विविध प्रसंगों और परिस्थितियों में साथ होने का अहसास कर लेते हैं. माँ का दूलार, भाई-बहन का स्नेह और पिता की नसीहतें भी उन्हें इस माध्यम से आसानी से मिल जाती हैं. इस बार बेटा दीवाली पर घर पर नहीं था, पर माता-पिता ने उसे लक्ष्मी पूजा से लेकर सभी धार्मिक विधियों में उसे शामिल किया, फिर तो भाई-बहनों और मोहल्ले वालों ने किस तरह से दीपावली पर खुशियाँ मनाई, इसके एक-एक पल की जानकारी चेटिंग और वेबकेम के माध्यम से अपने बच्चे को दी. इससे प्रेरणा लेकर बच्चे ने भी नव वर्ष को किस तरह से अपने दोस्तों के साथ एंज्वाय किया, इसे माता-पिता को बताया.
मजा तो तब आता है, जब बच्चा पहली बार विदेशी भूमि पर कदम रखता है. तो सबसे पहली जरुरत यही होती है कि भोजन की समस्या किस तरह से हल की जाए. चेटिंग और वेबकेम के माध्यम से वह अपनी माँ से कौन-सा खाना किस तरह से तैयार किया जाए, इसकी पूरी जानकारी लेते हैं. फिर भले ही उन्हें अपने किचन में वेवकेम सेट करवाना पड़े, पर वे अपने आपको खाना बनाने के लिए तैयार कर लेते हैं. विदेशी भूमि पर अपने हाथों से तैयार किया गया घर का खाना खाना भला किसे अच्छा नहीं लगता होगा. यह भी एक तरह का जुनून है कि अपनी दिनचर्या की जानकारी अपने घरवालों को देना और उनसे सलाह लेना, वह भी आधुनिक टेक्नालॉजी के माध्यम से, इससे भला अच्छा सकारात्मक उपयोग और क्या हो सकता है इसका. आज जहाँ चेटिंग से युवा पीढ़ी को एक तरह से जकड़ ही लिया है, तो उस स्थिति में यह एक अच्छी खबर है.
डा. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. यही इसका सुखद पहलू हैं । धन्‍यवाद ।


    माँ : एक कविता

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  2. आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं । हम जब हॉस्टेल में रहते थे तो अपने ही देश में रहकर माता पिता से अधिक दूर थे । हमारे बच्चे विदेश में रहते हुए भी अधिक पास हैं ।
    घुघूती बासूती

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