शनिवार, 15 दिसंबर 2007

केवल खाने के लिए जीते लोग

डा. महेश परिमल
उस दिन एक डॉक्टर दोस्त ने अजीब सी बात बताई. उसने बताया कि आज हमारे देश में भूख से तो कम, पर खा-पीकर मरने वालों की संख्या अधिक हो गई है. मुझे आश्चर्य हुआ, क्या कह रहे हैं ये चिकित्सक महोदय? इसके जवाब में उन्होंने जो तथ्य बताए, उससे लगता है कि आज भारतीय सचमुच अपने चटोरपन के कारण अपने शरीर में न जाने कितने रोगों को आमंत्रित कर रहे हैं. आश्चर्य इस बात का है कि विभिन्न प्रांतों के लोगों की बीमारियों के पीछे यही चटोरापन है. आइए जाने कि जीभ के वश में होकर हमारे देश के लोग किस-किस बीमारी का शिकार हो रहे हैं.
आज पूरा देश प्रगति की राह पर चल पड़ा है. हर कोई अपने क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहा है. क्षेत्र चाहे शिक्षा का हो या फिर आर्थिक हो, हर दिशा में मानव आगे बढ़ रहा है. पर इसे यदि स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें, तो स्पष्ट होगा कि आज हर मानव अपने भीतर एक न एक ऐसा रोग पाल रहा है, जिसका जन्मदाता वह स्वयं ही है. इसका मुख्य कारण है, स्वाद की लोलुपता. शायद आपको विश्वास नहीं होगा, पर यह सच है कि आज जीभ के वश में रहकर मानव अपने आप को खोखला कर रहा है. ये चटोरापन उसे कहाँ ले जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.
एक समय ऐसा था, जब लोगों की मौत का कारण बाढ़, सूखा और संक्रामक रोग था. लेकिन आज प्राकृतिक विपदाओं के साथ-साथ चटोरापन भी एक मुख्य कारण बनता जा रहा है. पंजाबी, मद्रासी, राजस्थानी, गुजराती आदि भारतीय व्यंजनों के शौकीन अब इससे भी आगे बढ़कर चाइनींज, मेक्सिकन, थाई और अन्य अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों के पीछे भाग रहे हैं. इन व्यंजनों का स्वाद उन्हें इतना भा रहा है कि वे पानीपूरी, भेलपूरी, दाल-बाटी, इडली-दोसे से आगे बढ़कर थाईसूप, नूडल्स, बर्गर, पिाा, मनचुरियन तक पहुँच गए हैं. यही कारण है कि आज भूख से मरने वालों की अपेक्षा खा-पीकर मरने वाले भारतीयों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है.
आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा कि आपके बच्चे का टिफिन रोज ही वैसा का वैसा ही वापस आ रहा है. इसका कारण टिफिन मेें आपकी रुचि का दिया हुआ नाश्ता है. बच्चे की रुचि उस नाश्ते में कदापि नहीं है, क्योंकि उसे फास्ट फूड की आदत लग गई है. उसे अब पोहा, उपमा, आलू का पराठा आदि खाने में मंजा नहीं आता, उसे तो चाहिए बर्गर, पिाा, हॉटडॉग और नूडल्स पसंद है. इन विदेशी व्यंजनों के पीछे युवा वर्ग तो ऐसे भागा जा रहा है, मानो उसे ये व्यंजन अब कभी मिलेंगे ही नहीं. उनकी रुचि में उपरोक्त व्यंजनों के अलावा पेप्सी, कोक आदि कोल्डड्रींक का समावेश हो गया है. दूसरी ओर हमारी प्रौढ़ पीढ़ी की बात ही न पूछो. सारे स्वाद चखने के बाद अब उन्हेें भी ये व्यंजन लुभाने लगे हैं. बच गए बुजुर्ग, तो यह सभी जानते हैं कि बुढ़ापा बचपन का पुनरागमन होता है. फिर भला ये बुजुर्ग इन नए-नए स्वादों से अलग कैसे रह सकते हैं?
आज सभ्य समाज में खान-पान की आदत जोर मारने लगी है. फॉस्ट फूड की दुकानों में बेतहाशा भीड़ शायद इसी चटोरेपन की ओर इंगित करती है. आश्चर्य की बात यह है कि हमारे देश में विभिन्न संस्कृतियों का मेल होने के बाद भी अलग-अलग संप्रदायों में अलग-अलग तरह की बीमारियाँ होने लगी हैं. इसका मुख्य कारण खान-पान है. गुजरातियों को डायबिटीज, सिंधियों को मोटापा और हृदय रोग, पारसी महिलाओं में स्तन कैंसर, बंगालियों को पेट के रोग, पंजाबियों को हृदय रोग, मद्रासी पुरुषों में लीवर के रोग हो रहे हैं.
गुजरातियों को मिठाई बहुत पसंद है. दोपहर और रात्रि के भोजन में उन्हें कुछ न कुछ मीठा खाने की आदत होती है. तेलयुक्त खाद्य पदार्थ भी उनके भोजन का एक हिस्सा है. यही कारण है कि उनमें डायबिटीज होता है. हाल ही में गुजराती, गुजराती जैन और मारवाड़ी समुदाय पर हुए एक सर्वेक्षण से पता चला कि इस शाकाहारी हिंदू समुदाय में अन्य की तुलना में कार्डियोडायबिटीज का प्रमाण अधिक मिलता है. इसका मुख्य कारण इनका आहार है. इनके आहार में विटामिन डी की मात्रा कम होती है. इसी कारण इनमें अस्थिरोग अधिक पाया जाता है.
यह तो हुई उनकी बात, जो मिठाइयों का अधिक सेवन करते हैं, पर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो चिकनाईयुक्त भोजन लेते हैं, जिससे उनमें मोटापा, हाईपरटेंशन, डायबिटीज और ऑस्टियो पोराइसिस आदि बीमारियाँ होती हैं. इन बीमारियों का शिकार सिंधी समुदाय होता है. ये लोग उपवास भी करते हैं, तो उस दिन वे दूध, घी, मावा और फल आदि का सेवन अधिक मात्रा में करते हैं, इससे इनमें मोटापा बढ़ता है. इस समुदाय की एक कमजोरी पापड़ भी है, इससे वे हाईपरटेंशन को बुलावा देते हैं. इस समुदाय में एक बात विशेष रूप से विद्यमान होती है, वह है संयम. इसी संयम के कारण इन्हें एड्स कम होता. ऑंकड़े बताते हैं कि अभी तक सभी जाति के लोगों में एड्स का प्रभाव बढ़ रहा है, पर इस समुदाय में एड्स के रोगी ऊँगलियों में गिने जा सकते हैं.
इसके अलावा पानी भी बीमारियों को आमंत्रित करने में मुख्य भूमिका निभाता है. पंजाब, उ?ारप्रदेश, हिमाचल प्रदेश के पानी में आयोडीन की मात्रा कम होती है. इस क्षेत्र में रहने वाले यदि भोजन में आयोडिनयुक्त नमक का प्रयोग न करें, तो उन्हेें थायरॉइड होने की पूरी संभावना होती है. आजकल पृथ्वी के भीतर भी पानी इतना प्रदूषित हो गया है कि उससे भी कई रोग होने लगे हैं. पाऊच में मिलने वाले पानी में ऐसा रसायन मिलाया जाता है, ताकि वह चमकदार दिखाई दे. पानी के चमकदार दिखने से ेलोग यही समझते हैं कि पानी साफ है,लेकिन यही कथित रूप से साफ पानी लोगों में बीमारियाँ फैला रहा है.
केवल खानपान ही नहीं, बल्कि वस्त्र और उसके पहनने का तरीका भी कई बीमारियों को आमंत्रित करता है. मुस्लिम समुदाय की महिलाएँ अधिकांश समय बुरखे में होती हैं, इससे उनकी त्वचा को सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता, जिससे उनमें विटामिन डी की कमी हो जाती है. इस कमी के कारण उनमें ऑस्टियो मलेशिया रोग हो जाता है. इस रोग में अस्थियाँ कोमल हो जाती हैं. दूसरी ओर रमजान के महीने में रोजा रखने के कारण मुस्लिम समुदाय की महिलाओं में मूत्र रोग की शिकायत मिलती है. लगातार कई घंटों तक पानी न पीने के कारण और पसीने के रूप में पानी शरीर से निकल जाने के कारण उनके शरीर में पानी की अत्यधिक कमी होने लगती है. डाक्टरों का इस संबंध में कहना है कि इससे निबटने के लिए महिलाओं को रोजा शुरू होने के पहले और खत्म होने के बाद एक-एक लीटर पानी पीना चाहिए.
थेलेसीमिया नामक रोग हमारे देश का नहीं है. यह विदेश से यहाँ आया है. इसके आने का कारण वे लोग हैं, जो विदेशों में शादी करते हैं. इससे यह रोग उनकी संतानों को विरासत में मिल जाता है. स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए, तो केरल की महिलाओं का कोई सानी नहीं. वहाँ की महिलाएँ शिक्षित होने के कारण कई बीमारियों से दूर रह जाती हैं. वे अपने शरीर की इतनी अच्छी देखभाल करती हैं कि शायद ही वह कभी बीमार होती हैं. अधिकांश महिलाएँ कामकाजी होने के कारण बीमार होकर बैठना उन्हें नहीं सुहाता. यदि कभी ये बीमार पड़ भी जाएँ, तो चिकित्सक द्वारा दी गई सलाह का कड़ाई से पालन करती हैं. इससे वे जल्दी स्वस्थ भी हो जाती हैं.
सामान्य रूप से जीने के लिए खाना आवश्यक है. आदि मानव फल खाकर अपना पेट भरता था. उसके बाद उसने खेती शुरू कर दी. अब वह स?जी, भाजी और अनाज ग्रहण करने लगा. मानव प्रयोगवादी होने के कारण उसने अपने खान-पान में लगातार सुधार किया. लेकिन यह सुधार इतना गहरा हो गया कि अब तो विदेशों का अंधानुकरण ही करने लगा है. चाइनीज भेल, चाइनीज डोसा आदि नए-नए व्यंजन आने लगे हैं. इस तरह के व्यंजनों की कल्पना भले ही कभी चीनियों ने नहीं की होगी, पर हम भारतीय स्वाद के मामले में इतना आगे बढ़ चुके हैं कि यह जानने की भी ंजरा भी कोशिश नहीं करते कि इससे कहीं शरीर को नुकसान तो नहीं पहुँचेगा? जीभ की लोलुपता बीमारियों के किस संसार में ले जाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता.
डा. महेश परिमल

1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय परिमल जी, नमस्कार!
    आपका ब्लाग देखा, अच्छा लगा , लेख "केवल खाने के लिये जीते हैं लोग' में तो आपने मन की बात कह डाली। बधई! - शम्भु चौधरी

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