सोमवार, 30 नवंबर 2015

असंभव है राइट टू एजुकेशन एक्ट को अमल में लाना

डॉ. महेश परिमल
इस सच से कोई इंकार कर ही नहीं सकता कि सरकार के सभी निर्णय प्रजा के हित में ही होते हैं। यह भी सच है कि अदालत के सभी निर्णय अमल में लाने लायक होते हैं। हमारे देश में बाल विवाह पर रोक लगी है, इसके बाद भी देश भर में बाल विवाह हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने द्विचक्रीय वाहनों के चालकों को हेलमेट पहनना अनिवार्य कर दिया है, उसके बाद भी लाखों लोग बिना हेलमेट के वाहन चला रहे हैं। इससे यातायात पुलिस की कमाई बढ़ गई है। राइट टू एजेकेशन के मामले में भी सरकार ने यह साबित कर दिया है कि अब उसके पास यह क्षमता नहीं है कि वह गरीब वर्ग के बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सके। सरकार की इसी कमजोरी का लाभ निजी शिक्षण संस्थाएं उठा रही हैं। आज ये संस्थाएं पालकों को लूटने का साधन बन गई हैं। शिक्षा का व्यवसायीकरण भी इसी कारण हो गया है। समाज में भी आज पालक अपने बच्चों के लिए मोटी रािश की फीस देकर गौरवान्वित होते हैं। समाज की यही प्रवृत्ति आज गरीब-अमीर के बीच की खाई को चौड़ा कर रही है। जब तक समाज की यह प्रवृत्ति नही बदल जाती, तब तक आरटीआई जैसे कई कानून आ जाएं, शिक्षा की स्थिति बदलने वाली नहीं है। इस स्थिति में शिक्षा का उद्धार तो संभव ही नहीं है।
केंद्र सरकार ने 2009 में राइट टू एजुकेशन एक्ट बनाया और सुप्रीम कोर्ट ने इसका अनुमोदन कर दिया। इस कारण देश के सभी बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल जाएगी और उनके लिए निजी शालाओं के दरवाजे खुल जाएंगे। यह मानना गलत होगा। आरटीआई के मार्ग में अनेक बाधाएं हैं। एक बाधा तो स्वयं सरकार है। एक अंदाज के अनुसार देश के सभी गरीब बच्चों को निजी शालाओं में मु त शिक्षा देनी हो, तो सरकार को उसके पीछे हर वर्ष 2.3 लाख करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। अभी सरकार सर्व शिक्षा अभियान के तहत हर वर्ष 21 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान किया है। इसका उपयोग राज्य सरकारों की निष्क्रियता के कारण नहीं हो पा रहा है। हमारी सरकार बरसों तक इस सपने के साथ जीवित है कि गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की जवाबदारी सरकार की है। इस समझ के आधार पर सरकार द्वारा गांव और शहरों में लाखों की सं या में प्राथमिक और माध्यमिक शालाएं बनवाई और उसके संचालन के लिए अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसके अलावा सरकार हजारों निजी शिक्षण संस्थाओं को ग्रांट देकर उसे जिंदा रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। एक तरफ सरकारी स्कूलों एवं सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की हालत और गुणतत्ता लगातार बिगड़ रही है, तो दूसरी तरफ ऐसी निजी शिक्षण संस्थाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो सरकार से किसी प्रकार की सहायता नहीं लेती। सरकारी स्कूलों से गरीब और मध्यम वर्ग का विश्वास इस कदर उठ गया कि भले ही कर्ज लेना पड़े, पर बच्चों को निजी संस्थाओं से ही शिक्षा दिलवानी है। इस कारण ऐसी शालाओं को और भी बल मिला, वह मनमाने डोनेशन और फीस लेकर बच्चों को शिक्षा देने लगी। इससे शिक्षा का एक समानांतर अर्थतंत्र खड़ा हो गया। सरकारी संस्थाओं के शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के मामले में सरकारी तंत्र पूरी तरह से विफल साबित हुआ। उनका आत्मविश्वास इतना गिर गया कि वे गरीब बच्चे भी निजी शालाओं में पढ़ सकें, इसके लिए सरकार को राइट टू एजुकेशन एक्ट बनाना पड़ा।
सभी निजी शालाओं में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को प्रवेश देने का आदेश सुप्रीमकोर्ट ने दिया, सरकार ने इसे अमल में लाने का बीड़ा उठाया। इससे सरकार की ही फजीहत हुई। यदि सरकारी शालाओं में शिक्षा का स्तर और गुणवत्ता बेहतर होती, तो क्या गरीब और मध्यम वर्ग के पालकों को मोटी राशि की फीस देकर निजी शालाओं में पढ़ाने की आवश्यकता होती? सुप्रीमकोर्ट के आदेश में निजी शालाओं के संचालकों को चिंतित कर दिया है। इसमें भी कुछ शाला संचालक ऐसे हैं जो इस बात पर गर्व करते हैं कि उनकी शाला में केवल उच्च पदस्थ अधिकारियों एवं ऐश्वर्यशाली लोगों की संतानें ही शिक्षा प्राप्त करती हैं। इसके लिए वे उन पालकों से मोटी रकम भी वसूलते हैं। आज भी यदि कोई निजी शाला शुरू करता है, तो उसका उद्देश्य केवल धन कमाना ही होता है। ऐसे में संचालक यदि गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को अपनी शाला में प्रवेश देते हैं, तो एक पॉश स्कूल के रूप में बनाई गई छवि दागदार हो जाएगी। इससे उनका मुनाफा कम हो जाएगा। ऐसे में इन बच्चों की शिक्षा का भार उन धनाढ्य बच्चों के पालकों पर आ जाएगा, जिनके बच्चे उन शालाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं। पालकों की चिंता वाजिब है, क्योंकि शाला का मुनाफा घटेगा, तो उसकी भरपाई शाला के अन्य बच्चों से ही तो होगी। आज पॉश शालाओं के संचालकों ने अपनी स्कूल की छबि एक हाईप्रोफाइल स्कूल के रूप में तैयार की है, तो यह उनके धंधे के लिए अच्छी नीति हो सकती है, पर इससे उनकी शाला में शिक्षा का स्तर और गुणवत्ता सुधर जाएगी, यह आवश्यक नहीं है। न तो सरकार यह समझने को तैयार है और न ही शाला संचालक कि शिक्षा कभी बेची नही जाती। आज पॉश स्कूलों के संचालक इस बात पर गर्व करते हैं कि उनकी शाला में श्रेष्ठीजन की संतानों को ही शाला में प्रवेश दिया जाता है। शाला संचालक के इस अहंकार में पालकों का  ाी अहंकार शामिल है, इसी कारण वे शाला को मनचाही फीस और डोनेशन देने में नहीं हिचकते। इस कारण वे कभी नहीं चाहेंगे कि गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को भी उसी शाला में प्रवेश मिले, जहां उनकी संतानें शिक्षा प्राप्त करती हैं। इससे उनके अहम को चोट भी लग सकती है। पर वे यह भूल जाते हैं कि उसी शाला में भ्रष्ट व्यापारी, अधिकारी, नेता, मंत्री और तस्कर, माफियाओं के बच्चे भी शिक्षा प्राप्त कर रहे होते हैं। इनके कुसंस्कार से उनके बच्चे भी तो प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए यह मानना आवश्यक नहीं है कि जिन शालाओं की फीस मोटी होती है, उन्हीं शालाओं के विद्यार्थियों का स्तर ऊंचा होता है।
निजी शाला संचालकों को यह भय है कि 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को अनिवार्य शिक्षा के तहत प्रवेश दिए जाने पर उनकी फीस का भुगतान उन्हें ही करना होगा। सच्चाई यह है कि आरटीआई के तहत इन बच्चों की फीस सरकार को ही चुकाना है। अब यह बात अलग है कि सरकार के पास अपनी ही शालाओं को देने वाले ग्रांट के लिए धन नहीं है, तब वह निजी शाला संचालकों को किस तरह से गरीब बच्चों की फीस चुका पाएगी। एक अंदाज के मुताबिक यदि देश भर में आरटीआई एक्ट को अमल में लाया जाए, तो सरकार को उसके पीछे 2.3 लाख करोड़ करने होंगे। केंद्र और राज्य सरकार मिलकर अब तक 21 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। बाकी की राशि कैसे और कहां से आएगी,इसका खुलासा सरकार नहीं कर रही है। आरटीआई के तहत स्कूल में विद्यार्थी और शिक्षकों का गुणोत्तर 30:1 होना चाहिए, आज 60 प्रतिशत शालाएं ऐसी हैं, जो इसे नहीं मानतीं। इस अमल में लाया जाए, तो उन्हें और शिक्षकों की भर्ती करनी होगी यानी और अधिक खर्च करना होगा। आज देश में आधुनिक शिक्षा प्राप्त शिक्षकों की कमी को देखते हुए शाला संचालक ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। राइट टू एजुकेशन एक्ट आदर्श रूप में एक नायाब कानून है, पर सभी आदर्श व्यवहार में लाएं जाएं, यह आवश्यक नहीं है। आरटीआई की भावना ऐसी है कि गरीब और अमीर बच्चे एक साथ स्कूल में शिक्षा प्राप्त करें और अपने घर के करीब की ही शाला में जाएं। यह सच्चाई तभी संभव है, जब सभी शालाओं में उत्तम शिक्षकों की व्यवस्था हो। श्रेष्ठ सुविधाओं से युक्त हो। सभी स्कूलों में गुणवत्तायुक्त शिक्षा दी जाती हो। यह आदर्श स्थिति निकट भविष्य में हमारे देश में देखने को मिलेगी, ऐसा नहीं लगता। जब तक यह स्थिति साकार नहीं होती, तब तक धनाढ्य वर्ग के बच्चों के पालक मोटी रकम देकर अपने बच्चों को निजी शालाओं में भेजते रहेंगे। कोई भी कानून नागरिकों और समाज के सहयोग के बिना सफल हो ही नहीं सकता। देखना यह है कि सरकार का यह आरटीआई किस हद तक गरीब और मध्यम वर्ग को राहत दे सकता है।
डॉ. महेश परिमल
 

डॉ. महेश परिमल - एक लहर की गुजारिश

डॉ. परिमल के इस लेख में भोपाल के बड़े तालाब की एक लहर की गुजारिश को कोमल संवेदनाओं के साथ प्रस्‍तुत करने की एक अनूठी पहल देखने को मिलती है -

नल-दमयन्‍ती की अमर प्रेम कथा

राजा नल और दमयन्‍ती के नाम से हम सभी परिचित हैं। उनके प्रेम प्रसंग से संबंधित पौराणिक कथा को यहॉं प्रस्‍तुत किया जा रहा है -

बुधवार, 25 नवंबर 2015

बाल कहानी - बिना गणित का शहर

गणित विषय से नफरत करनेवाला लल्‍लू पहूँच गया बिना गणित के शहर में। पहले तो काफी खुश हुआ लेकिन धीरे-धीरे परेशानियॉं बढ़ने लगी और वह दुखी हो गया। क्‍यों, कैसे आदि सवालों के जवाब जानिए इस बाल कहानी के माध्‍यम से -

ईश्‍वर की पाती हमारे नाम

जब इंसान अपनी भागती-दौड़ती दिनचर्या में इतना अधिक व्‍यस्‍त हो जाता है कि स्‍वयं के लिए भी समय नहीं निकाल पाता है, तो ईश्‍वर को भी एक पत्र द्वारा अपनी बात उस तक पहुँचानी पड़ती है, किस तरह से, वो आप ही सुन लीजिए -

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

फिल्‍म अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के बारे में -

एक संवेदनशील अभिनेत्री के रूप में शर्मिला टैगोर की बंगला और हिंदी सिनेमा जगत में अपनी एक अलग पहचान रही है।

महाशक्तियों की अवैध संतान है आतंकवाद

डॉ. महेश परिमल
लम्बे समय से भारत पाकिस्तान द्वारा प्रायाेजित आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज उठाता रहा है। पर अमेरिका एवं अन्य देशों ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। इस समय जब फ्रांस में हुए आतंकी हमले के बाद रुस के साथ मिलकर फ्रांस ने सीरिया में जो तबाही मचाई है, उसके बाद यह उम्मीद बंधती है कि अब भारत के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार होगा। वेसे देखा जाए, तो आतंकवाद सत्तालोलुप महाशक्तियों की अवैध संतान का ही एक रूप है। इस समय आतंकवाद को पुन: परिभाषित करने की मांग उठ रही है। ऐसे में आतंकवाद पर विचार करते समय यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि सत्तारूढ़ दल के खिलाफ यदि विद्राेह किया जाए, तो उसे क्रांति कहा जाए या आतंकवाद। अक्सर ऐसा होता है कि शासकों द्वारा किए गए अत्याचारों के खिलाफ जब आवाज उठाई जाती है, विरोध किया जाता है, तब शासक इसे आतंक या विद्रोह की संज्ञा देते हैं, पर एक लम्बे संघर्ष के बाद विरोधी शक्तियां जीत जाती हैं, तो पहले किए गए उनके विद्रोह को क्रांति कहा जाता है। इसलिए आतंकवाद की परिभाषा मुश्किल है। आज हम भगतसिंह, चंद्रशेखर, सुभाष चंद्र बोस को भले की क्रांतिकारी कहें, पर अंग्रेज उन्हें क्रांतिकारी न मानकर हमेशा आतंकवादी ही मानते रहे। इसलिए जो शासक पक्ष की दृष्टि में आतंक है, वह कथित आतंकियों की  दूष्टि में एक क्रांति है। आज फ्रांस ने रुस के साथ मिलकर आईएसआईएस के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सीरिया पर हमला कर दिया है। अभी फ्रांस भले ही इस लड़ाई में रुस का साथ ले रहा हो, पर उसने यूरोपियन यूनियन से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया है। अगले सप्ताह होने वाली यूरोपियन यूनियन की बैठक में यह मुद्दा विशेष रूप से उछलेगा। यदि इस बैठक में कोई महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया जाता है, तो निश्चित रूप में आतंकवाद पर अंकुश रखने के लिए एक भूमिका तैयार हो ही जाएगी। ऐसा होने से यूरोप की संयुक्त सेना सीरिया के मोर्चे पर आईएस का सामना करेगी। इस दौरान आईएस ने अपने नए वीडियो में अमेरिका, यूरोप के देशों को शोषक, साम्राज्यवादी और अपना हित साधने वाला बताया है। यह भी तय है कि उपरोक्त सभी देश इस्लाम विरोधी होने के कारण आईएस इनका सामना करता रहेगा। अभी आईएस के निशाने पर वाशिंगटन और रुस हैं, इन पर हमले की चेतावनी भी उसने दी है। पहले भी वह इस तरह की धमकी देता रहा है, पर पेरिस पर हुए हमले के बाद अब इसे गंभीरता से लिया जा रहा है।
फ्रांस पर हमले के बाद जी 20 की बैठक में भी आर्थिक मामलों के बदले आतंकवाद का मुद्दा छाया रहा। एक बार फिर भारत को अपने पुराने आतंकवाद विरोधी प्रस्ताव काे याद दिलाने का मौका मिला है। इसके पहले भी भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में आतंकवाद के संबंध में वैश्विक स्तर पर उठाने का प्रयास कर चुका है। विडम्बना यह है कि अमेरिका और यूरोप समेत कई देश आतंकवाद का शिकार होने के बाद भी आतंकवाद पर वैश्विक स्तर पर व्याख्या करने की कोशिश तक नहीं हुई। आतंकवाद किसे कहा जाए, यह एक गंभीर प्रश्न है। स्थापित सत्ता के खिलाफ आवाजें उठती ही रहती हैं। सत्ता के खिलाफ हथियार उठाना यदि आतंकवाद है, तो आवाज उठाने वाले इसे गुलामी की जंजीरें तोड़ना बताते हैं। आजादी प्राप्त करने का एक हथियार है सशस्त्र विरोध। इसलिए आतंकवाद की व्याख्या करते समय इस बात पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है कि सशस्त्र विरोध किन हालात में हुआ? एक की नजर में जो आतंकवाद है, दूसरे की नजर में वही गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए की गई क्रांति। इसके बाद भी यह तय है कि आतंकवाद के खिलाफ पूरा विश्व कभी भी एकजुट हो ही नहीं सकता। इसका मुख्य कारण यही है कि जो एक देश के लिए आतंकवाद है, वही दूसरे देश के लिए आजादी की लड़ाई है। यदि यह न भी हो, तो अंतत: वैश्विक राजनीति का एक हिस्सा तो है ही। उदाहरण के रूप में पाकिस्तान भारत के साथ हमेशा दुश्मनी बनाए रखता है, इसके लिए वह आतंक का सहारा भी लेता है, स्पष्ट है कि आतंकवाद के नाम पर वह भारत को हमेशा परेशान करता है और करता रहेगा। सऊदी अरब का एक चेहरा बहुत ही सीधा-सादा है, जिसमें वह आतंकवाद का विरोध करता दिखाई देता है। पर दूसरी ओर वही आतंकवादियों को हरसंभव मदद भी करता है। यही ईरान भी कर रहा है। क्योंकि यह दोनों देशों ने अपने आप को िशया और सुन्नी के धार्मिक रक्षक घोषित कर रखा है। हालात जब ऐसे हों, तो बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? इससे ही भारत ने संयुक्तराष्ट्र संघ में सीसीआईटी (काम्प्रेहोन्सेव कन्वेशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म) प्रस्ताव लाने का प्रयास किया है। भारत का लक्ष्य पाकिस्तान और उससे जुड़े आर्गेनाइजेशन आफ इस्लामिक को-ऑपरेशन के रूप में पहचाने जाते मुस्लिम देशों का संगठन है, जो भारत में कार्यरत आतंकवादियों को शरण दे रहा है। सीसीआईटी का प्रस्ताव पारित होने से आतंकवाद की
व्याख्या स्पष्ट होगी और आतंकी समूहों पर कार्रवाई करने की दिशा में मार्ग प्रशस्त होगा। इसके बाद भी ऐसा नहीं लगता कि अमेरिका भारत के इस प्रस्ताव को पारित होने देगा। आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने में अमेरिका इसलिए खिलाफ है, क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब से आतंकवाद ने अपने पैर पसारने शुरू किए हैं, उसके पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों की कुत्सित विचारधारा ही है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूरे विश्व में अपना एकछत्र राज स्थापित करने के लिए अमेरिका और रुस जैसी महाशक्तियों के बीच होड़ जम गई, इसी के साथ दोनों देशों के बीच शीत युद्ध शुरू हो गया। दोनों देशों में अणु शस्त्रों के भंडार करने शुरू कर दिए। पूरा विश्व पूंजीनिवेशवाद और साम्यवाद की तर्ज पर छावनी में विभक्त हो गया। इस शीतयुद्ध के दौरान रुस समर्थक देशों में क्यूबा, उत्तर कोरिया, वियेतनाम आदि देशों को अमेरिका आतंकखोर देश लगता था। अमेरिका ने इन सभी देशों के खिलाफ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से युद्ध शुरू कर दिया। रुस के विघटन के साथ ही शीतयुद्ध की समाप्ति हो गई। इस दौरान अमेरिका ने स्थानीय यहूदीलॉबी को राजी रखने के लिए अरब विरुद्ध इजरायल के जंग में इजरायल की खूब मदद की। परिणामस्वरूप अलग-थलग पड़े अरब राष्ट्रों ने इजरायल को सबक सिखाने के लिए और उसे गोद में बिठाने वाले अमेरिका के खिलाफ आतंकवादी संगठन तैयार किए। ब्लेक सेप्टेम्बर समेत अन्य कई संगठनों ने जिस तरह से आतंक मचाया, उसके पीछे मुख्य रूप से अमेरिका ही जवाबदार था। 80 के दशक में रशिया के सहयोग से अफगानिस्तान में काफी खून-खराबा हुआ। अफगानिस्तान में अपने पांव पसारने के लिए अमेरिका और रुस दोनों ने ही अपने-अपने समर्थक देशों को मैदान मं उतारा। उस समय रुस के िखलाफ लड़ने वाले देशों को नार्दन एलायंस तालिबान के रूप में पहचाना जाता था। इसी तालिबान को अमेरिका ने भारी मात्रा में शस्त्र और आर्थिक रूप से सहायता की थी। समय के साथ ही तालिबान ने अलकायदा को जन्म दिया और आज वही अल कायदा अमेरिका के लिए खतरा बन गया है। इसके अलावा आज जो इस्लामिक स्टेट्स आफ ईराक एंड सीरिया पूरे देश का ध्यान खींच रहा है, वह भी अमेिरकी करतूतों का ही परिणाम है। अमेरिका की नीति मुख्य रूप से खनिज तेल की प्राप्ति के आसपास घूमती रहती है। विकास की प्रेरक शक्ति के रूप में खनिज तेल का महत्व अच्छी तरह से समझने वाले अमेरिका ने तेल से भरपूर वाले देशों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। उदाहरण के रूप में सऊदी अरब इस समय खनिज तेल का सबसे बड़ा उत्पादक है। ये अमेरिका का हितैषी है। इसके बाद भी यह देश इस्लामिक विश्व में सबसे प्रभावशाली माना जाता है। 9/11 के हमले के बाद सऊदी अरब द्वारा मदरसों को धार्मिक कारणों से दी जाने वाली मदद के नाम पर दी जाने वाली राशि आतंकियों तक पहुंचने की जानकारी हाथ लगी। इससे अमेरिका सचेत हो गया, अब उसने सऊदी अरब पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी है। उधर सुन्नी देश सऊदी अरब को काबू में रखने के लिए अमेरिका ने अपनी कट्‌टर शत्रुता भुलाकर शिया देश ईरान को हवा देने की नीति अपनाई। ईरान के साथ ही अमेरिका के संबध खनिज तेल के कारण ही बिगड़ते रहे हैं। 80 के दशक में अयातुल्ला खुमैनी ने अमेरिकी कंपनियों के आदेश की परवाह न करते हुए उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया। ईरान के शाह रजा पहलवी को अमेरिका की शरण लेनी पड़ी। तब से दोनों देशों के बीच कट्‌टर शत्रुता का सूत्रपात हुआ। अमेरिका की यह नीति है कि जो देश खनिज तेल से भरपूर हैं, वे उसकी दासता स्वीकार करे, या फिर संघर्ष के लिए तैयार रहें। ईराक में सद्दाम हुसैन ने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोल था। लिबिया में कर्नल गद्दाफी भी अमेरिका को अपना कट्‌टर दुश्मन मानता था। सीरिया में बशर अल असद की सरकार ने भी अमेरिकी कंपनियों के उस आदेश का विरोध किया था, जिसमें खनिज तेल की कीमत लिबिया नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियां तय करेंगी। इससे अमेरिका ने वहां आंतरिक विद्रोेह को जगा दिया और कर्नल गद्दाफी को भी मरवा दिया। ईरान में सद्दाम हुसैन का भी खात्मा करवा दिया। सीरिया में बशर अल असद का तख्तापलट हो रहा था, तब वहां आईएस का तूफान आ खड़ा हुआ। वास्तव यह आईएस सद्दाम हुसैन के वही साथी हैं, जिनके पास कोई काम नहीं था और अमेरिका से बदला लेना चाहते हैं। इनके पास सशस्त्र संसाधन हैं, इसलिए अल कायदा ने उसे अपनी तरफ से सहायता की। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अल कायदा कमजोर होने लगा था, इसलिए अल बगदादी के नेतृत्व में आईएस ने अपना जाल फैलाया। आज उसी आईएस अमेरिका समेत कई देश परेशान हैं। दरअसल तो इन सभी देशों की सीमाहीन सत्तालोलुपता, विस्तारवाद और अतिशय शोषणखोरी के कारण ही आतंकवाद का जन्म होता रहा है। चोर के घर में मुंह छिपाकर रोने वाली कहावत अमेरिका एवं यूरोपीय देशों पर सही उतरती है।  अब जब उस पर आतंकी हमला हुआ है, तब वह समझ रहा है कि आतंकवाद खराब है। इसके पहले भारत ने कई बार आतंकवाद पर अपना रोना रोया था, तब उस पर कोई असर नहीं हुआ। आज वही आतंकवाद को कोसने में सबसे आगे है।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 23 नवंबर 2015

गाेपालदास नीरज की कुछ ग़ज़लें

कवि गोपलदास नीरज वे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया। पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। यहॉं प्रस्‍तुत हैं उनकी कुछ यादगार ग़ज़लें -

गुलज़ार की कुछ कविताऍं -

गुलज़ार नाम से प्रसिद्ध सम्‍पूर्ण सिंह कालरा हिंदी फिल्‍मों के प्रसिद्ध गीतकार होने के साथ ही साथ एक कवि, पटकथा लेखक, फिल्‍म निर्देशक हैं। उनकी रचनाऍं मुख्‍य रूप से पंजाबी, उर्दू तथा हिंदी में हैं। इसके अलावा ब्रजभाषा, हरियाणवी और मारवाड़ी में भी रचनाऍं लिखी हैं। यहॉं उनकी कुछ प्रसिद्ध कविताओं का आनंद लीजिए -

शनिवार, 21 नवंबर 2015

लघुकथाऍं

कुछ शिक्षाप्रद लघुकथाऍं -

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

सुभद्राकुमारी चौहान की कहानी - हींगवाला

सुभद्राकुमारी चौहान हिंदी की प्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका के रूप में जानी जाती हैं। उन्‍होंने स्‍वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेलयात्रा सहने के पश्‍चात अपनी अनुभूतियों को कहानी के माध्‍यम से भी व्‍य‍क्‍त किया। हींगवाला एक ऐसी ही मार्मिक कहानी है। इसमें उन्‍होंने सहज और सरल भाषाशैली का प्रयोग किया है।

सूर्यकान्‍त त्रिपाठी 'निराला' की कविताऍं

सूर्यकान्‍त त्रिपाठी 'निराला' हिंदी कविता के छायावादी यु्ग के प्रमुख चार स्‍तंभों में से एक माने जाते हैं। अपने समकालीन कवियों से अलग उन्‍होंने अपनी कविता में कल्‍पनाशीलता का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है। वे हिंदी में मुक्‍त छंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं।

मैथिलीशरण गुप्‍त की कविताऍं

मैथिलीशरण गुप्‍त हिंदी के कवि थे। आपने खडीबोली को एक काव्‍य भाषा के रूप में निर्मित करने के लिए अथक प्रयास किया। हिंदी कविता के इतिहास में गुप्‍त जी का सबसे बडा योगदान है। पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय संबंधों की रक्षा गुप्‍त जी के काव्‍य के विशेष गुण हैं।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

कविता - कुरूक्षेत्र कथा

यह कविता महाभारत की पौराणिक कथा से संबंधित है।

सुभद्राकुमारी चौहान की कविताऍं

हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की कविताओं में उमंग और उत्‍साह का सतत प्रवाह समाया होता है। आप भी इन कविताओं का आनंद लीजिए -

बुधवार, 18 नवंबर 2015

हरीश परमार की बाल कविताऍं - 3

बालमन की जिज्ञासाओं को समझते हुए कविताओं के माध्‍यम से एक सुंदर प्रस्‍तुति -

हरीश परमार की बाल कविताऍं - 2

हरीश परमार ने बाल मन को समझते हुए सहज और सरल शब्‍दों में अपने विचारों को कविता में प्रस्‍तुत किया है।

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

बाल कविता - सर्दी आर्इ

सर्दी का मौसम छोटे-बडे् सभी को प्‍यारा लगता है। रंग-बिरंगे गरम कपडे पहनकर झूमते-गाते बच्‍च्‍ो इस मौसम का भरपूर मजा लेते हैं। तो आप भी मजा लीजिए सर्दी से जुडी इस बाल कविता का -

घमंड हारा, सादगी जीती

 डॉ. महेश परिमल
 बिहार चुनाव के बाद यह साफ हो गया है कि वहां यदि कुछ हारा है, तो वह है घमंड और जीता है, तो वह है आम आदमी। बिहार की जनता को मूर्ख मानना ही सबसे बड़ी मूर्खता साबित हुई। बिहार की जनता ने बता दिया कि हम आपका भाषण सुन तो लेंगे, पर करेंगे वही, जो हम चाहते हैं। बिहार की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक तरह से आईना दिखा दिया है। 1990 में लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोका था, इस बार उसने मोदी का विजयी रथ रोक दिया। आडवाणी का रथ रोके जाने पर सरकार पलट गई थी। पर नरेंद्र मोदी का रथ रोककर लालू यादव का पूरा परिवार ही किंग मेकर बन गया। शिकारी को किस तरह से उसके ही जाल में फंसाया जाता है, यह लालू ने इस चुनाव में बता दिया है। इस जीत से लालू ने कई मरणासन्न लोगों को जीवनदान दिया है। विशेषकर कांग्रेस को, अब तक कांग्रेस हाशिए पर थी, पर इस जीत से कांग्रेस में भी जोश आ गया है। वह भी अब खुलकर मोदी का विरोध करने लगी है। अब तो उसने लालू-नीतिश की सरकार में शामिल होने का भी फैसला ले लिया है। कांग्रेस के मुंह में हंसते-हंसते मानो बताशा आ गया हो। उसे एक मोटीवेशनल इंजेक्शन की आवश्यकता थी, जो अब बिहार में भाजपा की करारी हार से मिल गया है। देश में असहिष्णुता के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले एक तरफ होंगे और सारे विपक्ष एक साथ मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे, यह तय है। बिहार को खोना मोदी सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। अब तक राज्यसभा कोई विधेयक पारित करवाने में जितनी परेशानी आती थी, उससे भी अधिक परेशानी अब आएगी। राज्यसभा में भाजपा का बहुमत न होने के कारण जो फजीहत होगी सो अलग। अब सानमे आने लगा है कि मोदी आवश्यकता से अधिक आत्मविश्वासी हो गए थे। बिहारियों को यह बिलकुल भी पसंद नहीं आया कि कोई बाहरी उनके आदमी को ‘इडियट’ कहे। उस समय तो उन्होंने उन्हें सुन लिया, पर समय आने पर अपनी बात रख दी। इसके अलावा मोदी ने अपने भाषण में जो कुछ कहा, लालू-नीतीश ने उसे दूसरे ही स्वरूप में जनता के सामने लाया। पेकेज देने के मामले में मोदी कुछ अधिक ही उदार दिखने लगे थे। जबकि इसके पहले कांग्रेस शासन में राहुल गांधी कहते थे कि हमने इस राज्य का इतन धन दिया, तो उसके एवज में मोदी कहते थे कि यह धन क्या उन्हें उनके मामा ने दिया था। देश का धन है, देश में ही लगाया, तो इसमें कौन-सा बड़प्पन दिेखा रहे हो। यह बात वे बिहार के लिए पेकेज की घोषणा करते समय भूल गए। उन्होंने जिस तरह से पेकेज की घोषणा की, उससक लगा कि वे यह राशि अपनी जेब से दे रहे हैं। जबकि वे बिहार को उसका हक दे रहे थे। वै कोई खैरात नहीं बांट रहे थे। पेकेज का यह पासा भी उलटा पड़ गया। भाजपा को उसकी यह तिकड़ी भारी पड़ी। मोदी, जेटली और शाह ने मिलकर जो व्यूह रचना तैयार की थी, वह धूल-धूसरित हो गई। पूरी पार्टी में इसी तिकड़ी की ही चल रही है। इस आशय की शिकायत गृहममंत्री राजनाथ सिंह ने संघ प्रमुख से भी की थी। आज भी यह तिकड़ी पूरी पार्टी को दिशा-निर्देश दे रही है। भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है। आगे चुनाव को देखते हुए उसे अपना दंभ छोड़ना होगा। न तो अच्छे दिन आए, न आएंगे। क्योंकि अच्छे दिन लाने की संभावनाएँ होने के बाद भी सरकार ऐसा कुछ नहीं कर पाई, जिससे आम लोगों को महंगाई से राहत मिले। क्रूड आइल जब सस्ता था, तब जो रािश बची, उसे ही यदि महंगाई पर अंकुश लगाने में खर्च कर दिया गया होता, तो हालात ऐसे न होते। महंगाई की मार झेलते हुए चुनाव हुए, तो जनता अपना रोष तो प्रकट करेगी ही। दालों की महंगी स्थिति को भी काबू करने में सरकार ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया, जिससे लोगों को राहत मिलती। न मुनाफाखोरों पर कार्रवाई की, न ही जमाखोरों पर अंकुश लगाया। सभी को खुली छूट मिल गई। भाजपा की काफी बदनामी हुई, इसे वह भले ही विदेशी षड्यंत्र माने, पर सच तो यह है कि महंगाई से जूझती जनता के लिए सरकार के कदम नाकाफी थे। विदेश प्रवास कर प्रधानमंत्री देश की साख बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, पर वे यह भूल रहे हैं कि देश में ही उनकी साख धूमिल हो रही है। देश में आज जो अराजकता की स्थिति है, उसे दूर करने के लिए भी ऐसा कुछ नहीं किया, पहले तो उन्हें अपने ही नेताओं की जबान बंद रखनी थी। इस दौरान भाजपा नेताओं की जबान से मानों अंगारे निकल रहे हों। कोई लगाम ही नहीं। कुछ भी बोले जा रहा है। जिसने पार्टी के खिलाफ कुछ भी कहा, नेता उसी को निशाना बनाने लगते हैं। जरा उसकी सुन तो लेते, कहीं वह सच तो नहीं बोल रहा है। पार्टी में सच बोलने की सजा बहुत ही सख्त है, यह तो अब तक कांग्रेस में देखा जाता था, पर लगता है भाजपा ने इसे अपना लिया है। बिहार एक अनुत्पादक राज्य है। यहां बेरोेजगारी बहुत है। कई ऐसी शकर मिलें हैं, जो बंद पड़ी हैं। लोग रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में जा रहे हैं। आज शायद ही कोई ऐसा राज्य हो, जहाँ बिहारी अपनी रोजी-रोटी की तलाश में न पहुंचे हों। महाराष्ट्र और गुजरात में बिहारियों की भरमार है। इससे ही बिहार की बेराजगारी का पता चल जाता है। फिर भी बिहार सबको प्यारा है। इसलिए वोट देने के लिए सुदूर प्रांतों से बिहारियों ने आकर अपना वोट दिया और इतिहास ही रच डाला। इन्हें अपने क्षेत्र में बुलाने के लिए लालू यादव ने जो अनुनय-विनती की, उसी के कारण मतदाता एक तरह से उसकी गोद में ही बैठ गए। समय बड़ा बलवान है, यह भी इस चुनाव से पता चलता है। भाजपा ने यहां भी अपनी ढुल-मुल नीति जारी रखी। आखिर तक उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला। अंदर ही अंदर भाजपा में कलह थी। वह इससे उबर नहीं पाई। इसके अलावा भाजपाध्यक्ष ने कई ऐसे लोगों को टिकट दे दी, जो आपराधिक प्रवृत्ति के थे, इससे लोगों को लगा कि यदि ये जीत गए, तो फिर गुंडागर्दी शुरू हो जाएगी। इसलिए भाजपा को हराया जाए। दूसरी ओर प्रचार के लिए लोग दिल्ली से बुलाए गए। स्थानीय लोगों की घोर उपेक्षा की गई। इससे लोगों में भाजपा के प्रति नाराजगी दिखाई दी। दिल्ली में जिस तरह से किरण बेदी को सामने लाया गया था, एक तरह से वही गलती फिर दोहराई गई। इस बार उसके पास मुख्यमंत्री का चेहरा ही तय नहीं था। दिल्ली चुनाव से भाजपा को सबक लेना था, जो वह नहीं ले पाई। भाजपा महागठबंधन की व्यूह रचना को नहीं समझ पाई। एक तरफ लालू-नीतिश ने बिहार संभाला, तो दिल्ली में भाजपा को बदनाम करने का काम कांग्रेस ने किया। असहिष्णुता के नाम पर आंदोलन चलाने में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उधर अरुण शौरी ने पार्टी को बदनाम कर दिया। शत्रुघ्न सिन्हा भी अपने बड़बोलेपन के कारण पार्टी को निशा बनाते रहे हैं। उन्हें पार्टी ने अलग करने का काम भाजपा ने ताक पर रख दिया। इससे उसकी कमजोरी सामने आ गई। उन्हें चुनाव से दूर रखा गया। अपनी अवहेलना वे सहन नहीं कर पाए, अब भाजपा की करारी हार के बाद वे खुलकर नीतिश की प्रशंसा कर रहे हैं। चुनाव में हार-जीत तो चलती ही रहती है, इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हारने वाला चुपचाप बैठ जाए। ऐसा लगता है कि भाजपा में अब कीलर इंस्टीक्ट ढीला पड़ गया है। अरुण शौरी, राम जेठमलानी, शत्रुघ्न सिन्हा जेसे लोगों ने भाजपा को बदनाम किया। सिन्हा को पार्टी ने अलग करने का मन बना लेने के बाद भी उसकी घोषणा को ताक पर रख दिया गया। अब तो काफी देर हो गई है। उन्हें अब पार्टी से निकाला जाता है, तो वे हीरो बन जाएंगे। इस बार भाजपा को गलत रास्ते पर लाने वाले तमाम कारक जो परिणाम के पहले भाजपा की जीत का सर्वेक्षण कर रहे थे, वे सभी चारों खाने चित्त हो गए। ज्योतिषियों ने भी खूब कहा था कि भाजपा को बहुत आगे जाना है, अब वे स्वयं ही अपने लिए रास्ता तलाश कर रहे हैं। कमल कीचड़ में ही खिलता है, अब भाजपा ऐसा कहना छोड़कर जो वादे किए हैं, उसके कमल खिलाए, तो लोगों को कुछ राहत मिले। चुनाव परिणामों ने भाजपा के गाल पर जो तमाचा जड़ा है, उसकी गूंज दूर तक जानी चाहिए, ताकि सभी को पता चल जाए कि अहंकार का अंत किस तरह से होता है। देखा जाए, तो इस चुनाव में घमंड हारा है, सादगी की जीत हुई है।
 डॉ. महेश परिमल

सुधा नारायण मूर्ति की कहानी - बंबई से बैंगलूर तक का एक टिकट

जानीमानी समाज सेविका एवं लेखिका सुधा नारायण मूर्ति की यह कहानी मानवीय संवेदना एवं उदारता का परिचय देती है। किसी के आंसूओं को पोंछना और मुस्‍कान देना ही सच्‍ची मानवता है। यही हमारा सामाजिक कर्तव्‍य भी है।

सोमवार, 16 नवंबर 2015

भीष्‍म साहनी की कहानी - माता-विमाता

भीष्म साहनी को हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है। वे मानवीय मूल्यों के लिए हिमायती रहे और उन्होंने विचारधारा को अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया। वामपंथी विचारधारा के साथ जुड़े होने के साथ-साथ वे मानवीय मूल्यों को कभी आंखो से ओझल नहीं करते थे। आपाधापी और उठापटक के युग में भीष्म साहनी का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। उन्हें उनके लेखन के लिए तो स्मरण किया ही जाएगा लेकिन अपनी सहृदयता के लिए वे चिरस्मरणीय रहेंगे। भीष्म साहनी हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे। उन्हें १९७५ में तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, १९७५ में शिरोमणि लेखक अवार्ड (पंजाब सरकार), १९८० में एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड, १९८३ में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड तथा १९९८ में भारत सरकार के पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया गया। उनके उपन्यास तमस पर १९८६ में एक फिल्म का निर्माण भी किया गया था। भीष्म जी एक ऐसे साहित्यकार थे जो बात को मात्र कह देना ही नहीं बल्कि बात की सच्चाई और गहराई को नाप लेना भी उतना ही उचित समझते थे। वे अपने साहित्य के माध्यम से सामाजिक विषमता व संघर्ष के बन्धनों को तोड़कर आगे बढ़ने का आह्वाहन करते थे। उनके साहित्य में सर्वत्र मानवीय करूणा, मानवीय मूल्य व नैतिकता विद्यमान है। प्रस्तुत है, उनकी एक संवेदनशील कहानी...

शनिवार, 14 नवंबर 2015

ज्ञानप्रकाश विवेक की कविताऍं

आठवें दशक के उत्‍तरार्ध में उभरे ज्ञानप्रकाश विवेक लोकप्रिय एवं बहुचर्चित रचनाकारों में से एक हैं। यहॉं उनकी कुछ कविताऍं प्रस्‍तुत की जा रही हैं।

बुधवार, 11 नवंबर 2015

बाल कहानी - कंचा

कहानीकार टी. पद़मनाभन की यह कहानी कल्‍पनालोक की सैर कराते हुुए अप्‍पू की बालसुलभ जिज्ञासा का परिचय देती है।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

घाटी से आया ठंडी हवाओं का झोंका

 डॉ. महेश परिमल
 देश के प्रधानमंत्री की जब चारों तरफ से आलोचना हो रही है। लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार और विपक्ष के नेता आदि सभी उन्हें खुले आम चुनौती दे रहे हों, अपना विरोध प्रकट कर रहे हों, तो ऐसे में यह सोचा जाना भी मूर्खता होगी कि कोई पराया उनकी प्रशंसा भी करेगा। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा उस अशांत क्षेत्र से की गई है, जो हमेशा दर्शनीय तो रहा है, पर किसी विस्फोटक से कम नहीं। यह क्षेत्र है घाटी, जी हां कश्मीर की घाटी से, वहां के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने प्रधानमंत्री की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। इससे ऐसा लग रहा है कि भयंकर दावानल से घिरे व्यक्ति को ठंडी हवाओं के झोंके मिल रहे हों। सहिष्णुता के मामले पर आज आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू है, ऐसे में घाटी से आई ठंडी हवा राहत दे गई। किसी ने तो सोचा कि वे कुछ अच्छा भी कर रहे हैं। मुफ्ती के बयान से न केवल मोदी बल्कि अन्य लोग भी चौंक गए। सचमुच यह भारतीय राजनीति के इतिहास की बहुत बड़ी घटना है, जब किसी ने संकट में घिरे व्यक्ति की इस तरह से तारीफ की। जम्मू-कश्मीर में भाजपा के सहयोगी और पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को लेकर एक बड़ी टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि वे इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं कि नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक व्यक्ति हैं। दादरी घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी सबका साथ सबका विकास की बात करते हैं, अत: उन्हें थोड़ा समय दिया जाना चाहिए। मुफ्ती मोहम्मद ने उक्त बातें एक अंग्रेजी अखबार को दिये इंटरव्यू में कही. ्उन्होंने कहा कि मुझे उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी जल्दी ही भाजपा नेताओं द्वारा दिये जा रहे विवादित बयानों पर रोक लगा देंगे। गोमांस पर हुए विवाद के लिए भी उन्होंने नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार मानने से इनकार कर दिया.उन्होंने कहा कि हमारे प्रदेश में गोहत्या पर प्रतिबंध है, इसलिए इस मुद्दे को तूल देना बेमानी है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अक्सर उनके विपक्षी यह आरोप लगाते रहे हैं कि वे सांप्रदायिक हैं और उन्हें अल्पसंख्यकों के दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है। जो केवल विरोध करते हैं, उनके बारे में यह कहा जा सकता है कि उनका और कोई काम ही नहीं है, वे केवल विरोध करना ही जानते हैं। कुछ लोग केवल उनका साथ देते हैं, ताकि लोग यह न समझें कि उन्हें विरोध करना नहीं आता। कुछ लोग केवल मौन रहते हैं, वे जानते हैं कि केवल विरोध करने से ही कुछ नहीं होता, विरोध के लिए ठोस मुद्दा होना जरूरी है। देश के बुद्धिजीवी, साहित्यकारों के अलावा राम जेठमलानी और अरुण शौरी प्रधानमंत्री की कार्यशैली की निंदा कर रहे हैं। जेठमलानी को अब कोई गंभीरता से नहीं लेता। अरुण शौरीे की कुंठा केवल उन्हें मंत्रीपद न मिलने की वजह से बढ़ गई है, यह स्पष्ट हो गया है। उस बयान के बाद उनकी हालत यह हो गई है कि अब उनसे भाजपा का कोई नेता नहीं मिलता। एकदम अलग-थलग हो गए हैं, वे इन दिना। इनके अलावा जब प्रधानमंत्री पर चारों तरफ से प्रहार हो रहे हों, तब उनके पार्टी के लोगों को उनका बचाव करना पड़ रहा है, ऐसीे स्थिति में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर उन्हें चौंका दिया है। पिछले दिनों सामने आए उनके बयानों ने और किसी को राहत दी हो या नहीं, पर स्वयं प्रधानमंत्री को इससे राहत मिली है, यह कहा जा सकता है। यह इसलिए भी आश्चर्यजनक है कि उनकी तरफ से इस तरह के बयान की कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। प्रधानमंत्री का बचाव करने वालों की भीड़ में एक भी मुस्लिम चेहरा नहीं था। सभी मुस्लिम नेताओं के निशाने पर केवल नरेंद्र मोदी ही हैं। इसलिए प्रधानमंत्री खेमे को आश्चर्य हो रहा है। जबकि अभी कुछ दिनों पहले ही कश्मीर विधानसभा में भाजपा के एक नेता द्वारा विपक्ष के नेता को थप्पड़ मारने की घटना हो चुकी है। मोदी द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान लोगों को दिए गए वचनों को अमल में लाने का समय अब समाप्त हो चुका है। इसके बाद महंगाई के लगातार बढ़ने से लोग त्रस्त हो गए हैं। एक तरफ महंगाई की चीख-पुकार और दूसरी तरफ बीफ पर लोगों के विवादास्पद बयान। इस आशय के बयान जब भी किसी ने जारी किए हैं, उन बयानों ने विवाद तो पैदा किया ही है, इसके अलावा लोगों में कटुता भी पैदा की है। केवल पुरस्कार और सम्मान वापस कर देने से ही विरोध व्यक्त हो जाता हो, तो यह बहुत बड़ी बात नहीं होती। जो इस तरह से विरोध कर रहे हैं, उनके पास विरोध करने का कोई तय माद्दा ही नहीं है। वे इस बात का ख्ुलासा ही नहीं कर पा रहे हैं कि पुरस्कार-सम्मान वापस कर देने मात्र से क्या कुछ लोग बीफ खाना बंद कर देंगे। यह प्रधानमंत्री इस आशय की अपील भी करें, तो क्या उसका उन लोगों पर कोई असर भी होगा? ये सब लोग मिलकर केवल प्रधानमंत्री को बदनाम करना चाहते हैं। इस देश में ऐसी बहुत सी घटनाएँ हुई हैं, जब इन बुद्धिजीवियों को अपनी सक्रियता का अहसास दिलाना था। उस समय वे सभी खामोश थे, जो आज बुरी तरह से चीख रहे हैं। यही लोग जब अभिनेत्री विद्या बालन के पास जाकर उससे पुरस्कार वापसी की मांग करने लगे, तो विद्याबालन ने बहुत ही सादगी के साथ उन्हें यह कहते हुए विदा कर दिया कि मुुझे मिला सम्मान देश का सम्मान है। यह किसी व्यक्ति विशेष के कहने पर नहीं मिला है, देश में शौचालय बनाने और उसका उपयोग करने का जो अभियान चला, उसका मैं हिस्सा बनी, लोग जागरूक हुए, तो सरकार ने मुझे सम्मानित किया। यह सम्मान मेरा नहीं, देश का सम्मान है, जो मुझे सामाजिक कार्यों को देखते हुए दिया गया है। मैं इस सम्मान का वापस नहीं करने वाली। दादरी कांड जैसी घटनाएं तो इस देश में पहले भी हुई हैं, तब तो इतना अधिक बवाल नहीं हुआ। इस समय ही ऐसा क्यों किया जा रहा है? इसका जवाब उनके पास नहीं था, इसलिए वे लौट आए। विद्याबालन ने ऐसे लोगों को एक नई राह दिखाई है। पर जिनकी मानसिकता संकीर्ण हो, वे ऐसी राह पर कभी नहीं चलना चाहेंगे। विद्याबालन का सवाल आज भी वहीं के वहीं है, उसका जवाब कोई देने को तैयार नहीं है, न तो ये बुद्धिजीवी और न ही विपक्ष का कोई नेता। कांग्रेस अपना विश्वास लगातार खो रही है। अब उसे अपनी अस्मिता का खयाल आने लगा है। अपनी सक्रियता को वह इस तरह से विरोध कर बताना चाहती है। सरकार के हर फैसले का विरोध करना उसने अपना एक सूत्रीय अभियान बना लिया है। समय-समय पर प्रधानमंत्री उनका जवाब देते रहते हैं, पर वह अपनी आदतों से बाज नहीं आ रही है। केवल कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली बनी कांग्रेस आज अपना खोया हुआ विश्वास प्राप्त करना चाहती है, उसके पास विरोध के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। लेकिन वह भूल रही है कि एक समय ऐसा भी आया था, जब जनता ने ही कांग्रेस को उखाड़ फेंका था। जनता ही सर्वशक्तिमान है, उसके पास केवल वोट देने का अधिकार है, इस प्रजातंत्र में वही सबसे बड़ा हथियार है। लोग कांग्रेस के घोटालों से आजिज आ चुके थे, इसलिए उन्होंने भाजपा के हाथों में देश की बागडोर सौंपी। यदि भाजपा ने भी वही किया, तो वह इसे भी उखाड़ फेंकने में संकोच नहीं करेगी। आज राज्यसभा में भाजपा का बहुमत न होने के कारण कई बिल अटक गए हैं। भविष्य में यदि कांग्रेस के हाथ में देश की बागडोर आती है, तो तय है कि राज्यसभा में भाजपा का बहुमत हो जाए, वह भी उस समय वही करेगी, जो आज कांग्रेस कर रही है, तो शायद उसे समझ में आ जाएगा कि केवल विरोध के लिए विरोध करना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है। जिस घाटी में 70 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी हो, वहां के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री की तारीफ की, तो यह निश्चित रूप से राहत देने वाली खबर है। प्रशंसा तो सभी की होती है। पर वास्तव में जब उसे प्रशंसा की आवश्यकता होती है, तब नहीं मिलती, तो अखरता है, पर जब विपत्तियों से घिरे व्यक्ति को कोई ऐसा व्यक्ति सहारा दे, जिससे कोई अपेक्षा ही नहीं रखी गई थी, तो ऐसा लगता है कि किसी ने उनके लिए अच्छा सोचा।
 डॉ. महेश परिमल

बाल कहानी - अपूर्व अनुभव

यह कथा मूल रूप से जापानी भाषा में लिखा गया संस्‍मरण है। इसमें तोमोए में पढ्नेवाले दो बच्‍चों के विषय में बताया गया है।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

महादेवी वर्मा की कहानी - गिल्‍लू

गिल्‍लू कहानी का एक ऐसा पात्र है, जिसे पढते हुए मन संवेदनाओं से भर उठता है। महादेवी वर्मा ने अपनी लेखनी के चमत्‍कार से इस नन्‍हे पात्र को इतना प्रिय बना दिया है कि स्‍वयमेव इस पात्र से रिश्‍ता जुडता-सा प्रतीत होता है।

महादेवी वर्मा की कहानी - बिन्‍दा

हिंदी साहित्‍य जगत की प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा की यह कहानी मानवीय संवेदनाओं का सशक्‍त उदाहरण है। जिसमें उन्‍होंने बाल सखी बिन्‍दा के प्रति स्‍वयं की मनोव्‍यथा को चित्रत किया है।

बुधवार, 4 नवंबर 2015

जयशंकर प्रसाद की रचना - आँसू

छायावादी काव्‍यधारा के कवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति ऑंसू केवल विरह या पीडा का काव्‍य नहीं है, बल्कि वह जीवन और जगत के प्रति एक रचनाकार की दृष्टि का परिचायक और उन्‍नायक है। हिंदी काव्‍य जगत में 'ऑसू' का विशेष महत्‍व है।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

कविता - तुम्‍हारा शहर

अभिमन्‍यु सिंह चारण की कविता तुम्‍हारा शहर को पढ्ते हुए शहर की सच्‍चाई और गॉंव की सौंधी महक का अंतर भावनाओं में उतर आता है। आप भी आनंद लीजिए, इस कविता का।

साहिर लुधियानवी की नज्‍म

साहिर लुधियानवी उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रगतिशील शायर हैं। आज बरसों बाद भी उनकी लेखनी की जादूगरी लोगों को अपनी ओर खींचती है।

रविवार, 1 नवंबर 2015

रेडियो फीचर : सिसकता बचपन

12 जून को अंतरराष्‍ट्रीय बालदिवस मनाया जाता है। वर्ष 2015 में उन बच्‍चों पर केंद्रित फीचर का प्रसारण आकाशवाणी भोपाल ने किया। इसे तैयार किया राकेश ढौंडियाल ने, और लिखा डॉ. महेश परिमल ने।

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कविताऍं - 4

अमृता प्रीतम सिर्फ नाम ही काफी है, इसलिए नाम पढ्कर आनंद लीजिए कविताओं का -

अमृता प्रीतम की प्र‍तिनिधि कविताऍं - 3

अमृता प्रीतम सिर्फ नाम ही काफी है, इसलिए नाम पढ्कर इनकी कविताओं का आनंद लीजिए -

अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कविताऍं - 2

अमृता प्रीतम सिर्फ नाम ही काफी है, इसलिए आनंद लीजिए कविताओं का -

अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कविताऍं 1

अमृता प्रीतम सिर्फ नाम ही काफी है, इसलिए नाम पढ्कर आनंद लीजिए कुछ प्रतिनिधि कविताओं का-

जानबूझकर हुआ गिरफ्तार


दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख


 http://www.peoplessamachar.co.in/index.php/epaper/book/3729-31102015/5-e-bhopal

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

रविन्‍द्रनाथ टैगोर की कहानी - काबुलीवाला

महान साहित्‍यकार रविन्‍द्रनाथ्‍ा टैगार की कहानी काबुलीवाला एक मर्मस्‍पर्शी कहानी है। परदेस में रहते हुए अपनों से दूर होना और खास करके अपनी प्‍यारी बिटिया से दूर होने का दुख इस कहानी में सजीव हो उठा है।

जयशंकर प्रसाद की कहानी - छोटा जादूगर

साहित्‍यकार जयशंकर प्रसाद का नाम हिंदी साहित्‍य जगत में काफी जाना पहचाना है। उनकी रचित कहानी छाेटा जादूगर एक मार्मिक एवं भावपूर्ण कहानी है।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

नुक्‍कड नाटक ब्रेकिंग न्‍यूज

इस नाटक में दहेज प्रथा, बेटा बेटी में भेदभाव, भ्रष्‍टाचार, गिरते नैतिक मूल्‍य जैसी सामाजिक समस्‍याओं को उजागर किया गया है।

गीत मा बाप ने भूलशो नहीं

जीवन में कितनी भी सफलता मिल जाए, उन सफलताओं का महत्‍व तभी होता है, जब उनके साथ माता‍ पिता की दुआएँ शामिल होती हैं। माता पिता की दुआएँ तभी शामिल होती हैं, जब हम जीवन के हर मोड पर उन्‍हें याद रखें और उनका दिल न दुखाऍं। कुछ इन्‍हीं भावों से भरा है ये गुजराती गीत मा बाप ने भूलशो नहीं...

नरोत्‍तमदास की कविता सुदामा चरित

कवि नरोत्‍तमदास ने सरल ब्रज भाषा में अपना काव्‍य लिखा है। सुदामा चरित, ध्रुव चरित और विचारमाला उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। उनमें से केवल सुदामा चरित ही उपलब्‍ध है। अन्‍य दो कृतियॉं उपलब्‍ध नहीं है। तो आनंद लेते हैं, सुदामा चरित काव्‍य रचना का...

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

गिरीश पंकज की कुछ गजलें

गिरीश पंकज मूल रूप से व्‍यंग्‍यकार हैं। इनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। विदेशों में आयोजित कई हिंदी सम्‍मेलनों में इन्‍होंने शिरकत की है। अभी उनकी कृतियों पर पी-एच.डी. हो रही है।

मन्‍नू भंडारी की कहानी अकेली

अकेली एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। कहानीकार ने कहानी के पात्र सोमा बुआ की मनोव्‍यथा का बडा मार्मिक चित्रण किया है।

नागार्जुन की कविता अकाल और उसके बाद

कवि नागार्जुन की इस क‍विता में अकाल और उसके बाद की स्थिति का वर्णन किया गया है कि किस तरह अकाल का प्रभाव न केवल घर के लोगों पर पडता है, बल्कि छोटे छोटे जीवधारी भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते हैं।

अपना पासवर्ड डायरी में अवश्य लिखें

डॉ. महेश परिमल
आज का युग डीजिटल है। सब कुछ कंप्यूटर में कैद होने लगा है। कंप्यूटर का छोटा संस्करण मोबाइल के रूप में हमारी हथेली में है। मोबाइलधारकों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा होता जा रहा है। अब बैंकों के कई काम भी इसी मोबाइल के माध्यम से होने लगे हैं। इसमें नेट बैंकिंग प्रमुख है। इन सुविधाओं के साथ कुछ समस्याएं भी सामने आ रही हैं। कुछ दिन पहले मेरे एक साथी का अचानक ही हृदयाघात से देहांत हो गया। अब उसके परिवार वाले इस बात को लेकर चिंतित है कि उनके सारे पासवर्ड कहां से लाएँ। िमत्र अपना अधिकांश कार्य कंप्यूटर के माध्यम से करते थे। इसमें नेट बैंकिंग प्रमुख था। अब उनके न रहने पर पासवर्ड परिवार के किसी सदस्य को नहीं मालूम। अब परिजनों को यह पता नहीं चल पा रहा है कि टैक्स, प्रीमियम, लोन आदि की जानकारी किस तरह से प्राप्त की जाए? इसलिए अब यह कहा जा रहा है कि यदि आप नेट बैंकिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो अपना पासवर्ड, वेबसाइट आदि की जानकारी एक डायरी में लिखकर रखें, ताकि उनके न रहने पर परिजनों को किसी तरह की परेशानी न हो।
आज के डीजिटल युग में एक नई समस्या उभरकर सामने आई है। इसमें इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोग शामिल है। सामान्य रूप से हम अपना पासवर्ड, यूजर्स नेम आदि गोपनीय रखते हैं। हमें शुरू से ही यही कहा गया है कि अपना पासवर्ड किसी को भी न बताया जाए। पत्नी को भी नहीं। यह गोपनीय है, इसकी गोपनीयता बनाए रखी जाए। ऐसी स्थिति में हमारा वह अपना अचानक ही हमारे बीच न रहे, तो फिर उनके बैंक एकाउंट से लेकर अन्य कई लेन-देन की जानकारी उनके साथ ही चली जाती है। ऐेसे में अब यह सलाह दी जाने लगी है कि अपना यूजर्स नेम,पासवर्ड आदि एक डायरी में अवश्य लिखकर रखेे। इसी तरह इंटरनेट पर भी किए जाने वाले कार्यों की जानकारी भी एक डायरी में लिखी होनी चाहिए। निजी बैंक तो अपने उपभोक्ता को हर महीने बैंक स्टेटमेंट भेजती हैं, पर सरकारी बैंकें ऐसा नहीं कर पाती। इसलिए परिवार वालों को यह पता ही नहीं होता कि घर के मुखिया का एकाउंट कहां-कहां है। उसमें कितनी राशि है। एकाउंट से किस तरह के बिलों का भुगतान हर महीने इंटरनेट बैंकिंग के तहत किया जाता है। हाल ही एक घटना हुई, जिसमें इंटरनेट पर पे-पाल में एक व्यक्ति ने खाता खुलवाया। उसमें विदेशी करेंसी ट्रांसफर हो सकती थी। पे-पाल में खाता खुलवाने वाला यदि चाहे, तो अपने अन्य किसी खाते में राशि ट्रांसफर कर सकता था। घर में किसी को इस संबंध में पता नहीं था। अचानक उस व्यक्ति की मौत हो गई। तब उसके परिजनों को बैंक से खाते का स्टेटमेंट मिला। पर पे-पाल से सभी अनजान थे। एक बार परिवार के एक सदस्य को बैंक स्टेटमेंट देखते हुए यह खयाल आया है कि पे-पाल से खाते में धनराशि जमा हुई है। पहले तो पे-पाल क्या है, यही पता नहीं था, जब पता चला कि पे-पाल से खाते में डॉलर जमा हुए हैं। तब पे-पाल के एकाउंट के संबंध में जांच हुई। पे-पाल पर 5-6 बार यूजर नेम और पासवर्ड के लिए प्रयास किया गया। इसे पे-पाल ने यही समझा कि कोई हेकर्स इस तरह का प्रयास कर रहा है। इससे एकाउंट अपने ही आप ब्लॉक हो गया। पे-पाल को ई मेल कर कई तरह की जानकारियां दी गई। पहले तो पे-पाल ने कोई जवाब नहीं दिया, पर जब इफर्मेशन टेक्नालॉजी एक्ट के माध्यम से नोटिस दिया गया और अपना ई मेल भेजा गया, तो पे-पाल से सहयोग करते हुए वन टाइम पासवर्ड भेजा, जिससे पता चला कि खाते में 1500 डॉलर हैं। अंतत: वह राशि अन्य खाते में ट्रांसफर कर दी गई।
यह दुर्भाग्य है कि कितने ही खाते न्यूनतम बेलेंस के साथ बरसों से बैंकों में पड़े रहते हैं। कितनी ही बैंकें हर 6 महीने में खातेदार को स्टेटमेंट भेजती हैं, पर सरकारी बैंकें ऐसा नहीं कर पाती। फलस्वरूप कई खातों में ब्याज की राशि जुड़ती चली जाती है और राशि दोगुनी भी हो जाती है। यही हाल आजकल पीएफ खाते का भी है। यदि आपने कहीं एक साल काम किया है, तो आपके खाते में कितनी राशि है, इसकी जानकारी पीएफ विभाग से नहीं मिलती। इस तरह से कई लोगों की राशि जमा होते हुए भी सही व्यक्ति को नहीं मिल पाती। इसलिए यह प्रावधान होना चाहिए कि यदि किसी व्यक्ति की एक निश्चित राशि कहीं जमा हो रही है, तो उसे स्टेटमेंट भेजकर व्यक्ति को इसकी जानकारी देते रहना चाहिए।
डेटा जनरेटर:-अाजकल जब हर कोई डीजिटल के साथ-साथ चल रहा है, तो हम यह मानकर चलें कि हम भी डेटा जनरेटर के साथ-साथ डेटा ट्रांसमीटर्स भी हैं। सोशल नेटवर्किंग हो या फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन हो या तीन-चार ई मेल एकाउंट हो, परंतु इस सब से जुड़े डेटा स्टोरेज को भी महत्व दिया जाए। जिनके डेटा स्टोरेज उड़ जाते हैं, उनके पास सर पकड़कर रोने के सिवाय और कोई चारा नहीं होता। गूगल-याहू जैसे ज्वाइंट सर्च इंजन डेटा स्टोरेज जैसी सुविधाएं देते हैं। अापके कंप्यूटर में भी यदि आवश्यकता से अधिक डेटा हों, तो आप उसे गूगल या याहू के डेटा स्टोरेज पर डाल सकते हैं। डेस्कटॉप की बिक्री घटी:- स्मार्ट फोन, टेबलेट और लेपटॉप की मांग बढ़ने से डेस्कटॉप काे अब कोई पूछने वाला नहीं रह गया है। पहले जो घर पर डेस्कटॉप पर काम करते थे, वे अब लेपटॉप का इस्तेमाल करने लगे हैं। जिन्हें अपने काम से दिन भर घर से बाहर रहना हो, तो उनके लिए लेपटॉप से सुविधा रहती है। इसलिए लोग अब डेस्कटॉप का इस्तेमाल नहीं करते। इससे उसकी बिक्री प्रभावित होने लगी है। अब इसकी बिक्री में 10 प्रतिशत की कमी देखी गई है। एक साल पहले जो डेक्सटॉप का बाजार 25,117 करोड़ रुपप का था, वह घटकर 21,058 करोड़ रुपए हो गया है। डेक्सटॉप की बिक्री घटने से इसका असर स्मार्टफोन पर पड़ा है। स्मार्ट फोन की बिक्री 33 प्रतिशत बढ़ी है। टेबलेट की बिक्री भी 4 प्रतिशत बढ़ी है इंटरनेट की सुविधा ने पूरे देश को एक हथेली में बंद कर दिया है। स्मार्टफोन के कारण अब लाेग ई कामर्स, ऑनलाइन ट्रांजेक्शन, ऑनलाइन शेयरबाजार ट्रेडिंग आदि आसानी से कर रहे हैं। अब फोर जी ने इस सुविधा को और भी आसान कर दिया है। इसका इस्तेमाल करने वाले भी निश्चित रूप से बढ़ेंगे। तब यह होगा कि लोग डाउनलोडिंग की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

कविता बाबुल की गलियॉं

इस कविता में बचपन की यादें समाई हुई हैं। हम कितने भी बडे हो जाएँ, माता पिता एवं अपनों के साथ्‍ा गुजारे बचपन के दिन कभी नहीं भूल सकते। ये दिन हमारे एकांत का खालीपन भरते हैं। इन्‍हीं यादों को कविता में उतारा गया है।

कहानी उपहार

लेखिका आरती रॉय की ये कहानी नारी विवशता को उजागर करती है। हमारा समाज आज विकास के पथ पर कितना भी आगे बढ जाए लेकिन पुरुष की नजरों में कहीं न कहीं वह केवल भोग्‍या की वस्‍तु ही है। इस विवशता को कहानी में उजागर करने का प्रयास किया गया है।

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

कविता युग जननी भारत माता

इस कविता में भारत माता देश के नौनिहालों से पुकार कर रही है और उन्‍हें देश के महापुरुषों जैसा बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

कविता लिखो नहीं इतिहास बनो तुम

श्रीकृष्‍ण सरलजी की ओजपूर्ण कविता लिखो नहीं इतिहास बनो तुम वास्‍तव में देश के नौजवानों के लिए एक आह़वान है कि वे देश्‍ा और समाज के प्रति अपना कर्तव्‍य समझें और उन्‍हें पूरा करने के लिए दृढप्रतिज्ञ बनें।

कविता धरती को श्रृंगार दो

क्रांतिकारी कवि श्रीकृष्‍ण सरल जी की कविता धरती को श्रृंगार दो को यहॉं प्रस्‍तुत किया गया है। यह कविता उनके काव्‍यप्रेम के साथ साथ देशप्रेम को भी उजागर करती है।

गीत आ जा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले

फिल्‍म चोरी चारी में अभिनेता राजकपूर एवं अभिनेत्री नरगिस पर फिल्‍माए गए गीत आ जा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले का संस्‍कृत अनुवाद आपका मन मोह लेगा। इसी विश्‍वास के साथ इसे यहाँ सहेजा गया है।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

कविता मैं अमर शहीदों का चारण

क्रांतिकारी कवि श्री कृष्ण सरल जी की यह देशप्रेम से भरी एक ओजपूर्ण कविता है। मैं अमर शहीदों का चारण कविता के माध्‍यम से वे देश के नौनिहालों में देशप्रेम जगाने का प्रयत्‍न करते हैं। देश के प्रति हमारे कर्तव्‍य की याद दिलाते हैं।

बाल कहानी तलवार और गीत

बच्‍चों की मासूमियत में वो सच्‍चाई और भोलापन होता है कि उसके सामने एक कठोर दिल भी पिघल जाता हैा जब सिकंदर दूसरे नगर में आक्रमण करने आता है, तो वहाँ के भोलेभाले बच्‍चों की मधुर मुस्‍कान और मासूमियत भरी बातें सुनकर उसका मन बदल जाता है और वह लडाई का इरादा त्‍याग देता है।

दाल बनी वीआईपी, सरकार निष्क्रिय

डाॅ. महेश परिमल
डिजिटल इंडिया का नारा लगाने वाली सरकार के सामने देखते ही देखते दाल आम आदमी की पहंुच से दूर हो गई। सरकार की निष्क्रियता सामने आ गई। अच्छे दिन की कल्पना करने वाले अब बुरे दिन भी देखने लगे। महंगी दाल ने दीवाली का उत्साह की खतम कर दिया है। लोगों को दिखाए जाने वाले सारे सपने दिवास्वप्न हो गए। सरकार न तो जमाखोरों पर अंकुश रख पाई और न ही मुनाफाखोरों पर किसी प्रकार की सख्ती दिखा पाई। प्रधानमंत्री का नारा ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ यहां आकर सच साबित हो रहा है। सचमुच दाल को भोजन की थाली से गायब पाकर अब यह सोचना जायज हो जाता है कि भोजन की थाली से अब क्या-क्या चीजें गायब होने वाली हैं। यह सच है कि सरकार भ्रष्ट नहीं है, पर भ्रष्टों का संरक्षण देना भी एक अपराध ही है, इस अपराध से मोदी सरकार खुद को अलग नहीं कर सकती। नेताओं को विवादास्पद बयान देने से ही फुरसत नहीं है। दाल के भाव को अंकुश में रखने के सारे सरकारी प्रयास विफल साबित हुए। अपने आप को साहसी सरकार कहने वाली यह सरकार दाल के बढ़ते दामों पर कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस के जमाने में दाल ने कीमतों के इतने ऊंचे ग्राफ नहीं छुए थे। इस सरकार ने हद ही कर दी।
जिन हिंदू संगठनों के बूते पर यह सरकार बनी है, अब वे ही सरकार का विरोध करने लगे हैं। यह भी तय है कि एक दिन यही समर्थक संगठन सरकार को मुसीबत में भी डाल सकते हैं। यह सब होगा, नेताओं के बेतुके बयानों से। क्योंकि इतनी सख्ती के बाद भी प्रधानमंत्री की सलाह को न कोई मान रहा है, न ही उसे गंभीरता से ले रहा है। एक तरफ स्वयं प्रधानमंत्री के बयान संयत होते हैं, वही दूसनेताओं के बयान आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। कभी आरएसएस के प्रमुख मोदी की विचारधारा के विरुद्ध बोलते हैं, तो कभी विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर बनाने के लिए विवादित बयान देती है। गौमांस के मामले पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि इस चक्कर में सरकार यह भूल गई कि महंगाई दबे पांव बढ़ गई है, उस पर लगाम कसनी है। इस दौरान जमाखोरों की तो बन आई। पूरे डेढ़ वर्ष के मोदी शासन में किसी जमाखोर या मुनाफाखोर पर सख्त कार्रवाई हुई, ऐसा न तो सुना गया और न ही पढ़ा गया। अनजाने में वह इन समाजविरोधी तबकों को संरक्षण ही दे रही है। ऐसे में भाजपा पर विश्वास कर वोट देने वाला मतदाता ठगा सा रह जाता है।

आज की महंगाई पर यदि किसी की जवाबदारी बनती है, तो वह है मोदी सरकार। यूपीए सरकार के तमाम सलाहकारों को बेदर्दी से हटा दिया गया। मंत्रियों के कार्यालयों में काम करने वाले कांग्रेस समर्थक सभी लोगों को हटा दिया गया। योजना आयोग पर ताला लगा दिया। यह सब काम इसलिए किया गया कि मोदी सरकार स्वतंत्र होकर काम कर सके। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार महंगाई तो कम नहीं कर पाई, उल्टे महंगाई दोगुनी हो गई। जब प्रधानमंत्री स्वयं यह कहते हैं कि वे गरीबी में पले-बढ़े हैं, तो फिर उन्हें महंगाई क्या होती है, यह अच्छी तरह से पता होना चाहिए। जो गरीबी में पले-बढ़े होते हैं, वे ही जानते हैं कि महंगाई बढ़ने से इस परिवार पर क्या बीतती है? अपने नारों में प्रधानमंत्री निवेश, विदेशी निवेश, डिजिटल इंडिया, साइन इंडिया आदि शब्दों का उच्चारण करते हैं, तो लगता है कि यह तो आम आदमी की आवाज कतई नहीं है। विदेशी यदि भारत में निवेश करें, तो इससे आम आदमी को क्या? वह तो यही चाहता है कि किसी भी तरह से महंगाई कम हो। जीने लायक कमा सकें और आवश्यक वस्तुओं को खरीद सकें। विदेशों से अच्छे संबंध एक चुनौती है, पर उससे बड़ी चुनौती यह है कि देश में क्या चल रहा है, उसे भी जानना। आज हर तरफ महंगाई की ही चर्चा है, पर उसे कम करने के लिए किसी के पास कोई उपाय नहीं है। आज सरकार का संबंध आम आदमी से टूट गया है, जो आघातजनक है। सरकार की नजर डॉलर के भाव, सोनेे-चांदी के भाव, क्रूड के भाव आदि से हटती नहीं है। जीडीपी और मैनुफैक्चरिंग इंडेक्स की बातें करती थकती नहीं, परंतु अरहर की दाल के बढ़ते दाम जैसे सुलगते मुद्दे पर कोई कुछ करने को तैयार ही नहीं है। सरकार बातें बहुत कर रही है, पर अपने खिलाफ कुछ भी सुनना नहीं चाहती। एनडीए सरकार बनी, तब से सभी अच्छे दिनों की राह देख रहे हैं। पर अच्छे दिन एक सपना बनकर रह गया है। अब कमरतोड़ महंगाई सबका स्वागत करने लगी है। अाश्चर्य इस बात का है कि पहले पेट्रोल की कीमतों के साथ्ज्ञ महंगाई बढ़ती थी, अब तो पेट्रोल के दाम कम हो रहे हैं, अब जाकर स्थिर भी हो गए हैं, उसके बाद भी महंगाई लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार इतनी लापरवाह कैसे हो सकती है? सरकार को अपनी नाकामयाबी की शायद जानकारी नहीं है। अपनी छबि को उज्जवल करने के लिए प्रधानमंत्री विदेशों के दौरे कर रहे हैं। शायद उन्हें भी नहीं मालूम कि देश में क्या हो रहा है। अरहर दाल ने अन्य सभी दालों के दाम बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कई लोग यह तर्क दे रहे हैं कि महंगाई बढ़ने के साथ-साथ लोगों के वेतन में भी वृद्धि हुई है। पर वेतन में वृद्धि केवल सरकारी कर्मचारियों की हुई है। निजी कंपनियों के कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि एक विकसित देश में बढ़ती महंगाई पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है। पर जब क्रूड आयल के दामों में कमी आती है, तो उसका लाभ देश को जो मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पा रहा है। भाव कम होने का असर सुदूर गांव के एक ग्रामीण पर भी होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है। यह सरकार की अदूरदर्शिता है। सरकार को यह देखना चाहिए कि जब वह दाम कम करती है, तो वास्तव में दाम कम हो रहे हैं या नहीं। अमेरिका जैसे देशों में दूध, अंडे और ब्रेड की कीमतों मे पिछले 40 बरसों में मात्र कुछ सेंट की ही बढ़ोत्तरी हुई है। यदि हमारे देश में भी यह संभव होता है, तो यह सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। सरकार के पास अभी भी समय है, वह जमाखोरों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। जिससे उन्हें लगे कि दालों का संग्रह कर उन्होंने गलती की है, तो इसी गलती का अहसास उन्हें सरकार उन पर सख्ती लगाकर कराए, तो दाल के दाम अंकुश में लाने में देर नहीं होगी। इसके पहले भी देश को प्याज ने काफी रुलाया है। कांग्रेस की सरकार केवल प्याज के कारण ही चली भी गई। प्रधानमंत्री की बड़ी-बड़ी बातें अब लोगों को लुभा नहीं पा रही हैं। आम आदमी चाहता है कि वह अपने बच्चों की परवरिश सही तरीके से कर सके। इसीलिए उसने भाजपा को अपना कीमती वोट दिया था। अब यदि यह सरकार भी आम आदमी की न होकर व्यापारियों, मुनाफाखोरों और जमाखोरों की हो जाए, तो यह भारतीय जनता के लिए बहुत बड़ा धोखा है। सरकार इस दिशा में जितने भी सख्त कदम उठाए, उसका असर दीवाली तक तो नहीं पड़ेगा, यह तय है। इसका मतलब यही हुआ कि इस बार की दीवाली महंगाई के नाम रही।
डाॅ. महेश परिमल

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

तिन तिनक तुन तानी वाद्य यंत्रों की कहानी

इस लेख में संगीत से जुडे विविध वाद्य यंत्रों के बारे में जानकारी दी गई हैं। जो कि आप सभी के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी।

बाल कहानी पिंजरा खोलो

इस कहानी में तोते की उदारता का वर्णन किया गया है। पक्षी उन्‍मुक्‍त गगन में उडना चाहते हैं। वे मनुष्‍यों के बीच रहते अवश्‍य हैं लेकिन उनका असली ठिकाना गगन की ऊँचाई है। इसे छूकर ही वे खुश रह सकते हैंं। मानवीय मूल्‍यों से जुडी ये बाल कहानी मानवता का संदेश देती है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

बाल कविता हरीश परमार 1

छत्‍तीसगढ में हरीश परमार का नाम बाल साहित्‍यकार के रूप में जाना पहचाना है। उनकी कई कविताऍं क्षेत्रिय समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रही हैं। प्रस्‍तुत हैं उनकी कुछ कविताऍं -

बाल कहानी तेनालीराम ऊनी कम्‍बल

तेनालीराम के किस्‍से काफी मशहूर हैं। वे हमेशा अपनी चतुराई से साजिशों का पर्दाफाश कर देते हैंं। इस कहानी में उनकी इसी चतुराई को बताया गया है।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

बाल कहानी बिजली

बच्‍चों का अपना एक अनोखा संसार होता है। वे इस संसार में कुदरती नजारों को जब अपने जैसा ही देखते हैं तो खुश हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही इस कहानी में है। ये कहानी बच्‍चो को चांद तारों की अनोखी दुनिया में ले जाती है।

बाल कहानी रेगिस्‍तान की खुशी

बाल कहानी रेगिस्‍तान की खुशी इस कहानी में यह बताया गया है कि त्‍याग में ही खुशी है। अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन हमें दूसरों के लिए जीवन जीकर उसे सार्थकता प्रदान करनी चाहिए।

शाम ए गम की कसम तलत महमूद

शाम ए गम की कसम तलत महमूद को याद करते हुए लिखा गया एक जानकारीप्रद लेख है। जिसमें उनके संघर्ष के दिनों की कुछ झलकियाँ दिखाई देती हैं। इस लेख को आवाज देते हुए आप तक पहुँचाने की एक कोशिश हमने की है।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

सिबाका गीतमाला की कहानी अमीन सयानी की जुबानी

इस ऑडियो में अमीन सयानी ने सिबाका गीतमाला की शुरूआत की कहानी बताते हुए 1955 के आसपास के हिट गीतों की जानकारी दी है और वे गीत सुनाए भी हैं। आप भी इन गीतों का मजा लीजिए।

राम अधीर जी के काव्‍य गीत

राम अधीर जी साहित्‍यजगत में एक जाना पहचाना नाम है। उनकी कुछ कविताओं को यहॉं आवाज दी गई है। उन्‍होंने अपने काव्‍य गीतों में सरस, सरल और सहज शब्‍दों का प्रयोग किया है। जो मन को छू लेते हैं।

कहानी खेत में मणि

बाल कहानी खेत में मणि के माध्‍यम से यह बताया गया है कि मेहनत और ईमानदारी का फल हमेशा अच्‍छा होता है। जीवन में सच्‍चाई का साथ निभानेवाला व्‍यक्ति कभी दुखी नहीं होता।

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

कहानी दुख का अधिकार


हिंदी कहानी दुख का अधिकार
 लेखक यशपाल की इस कहानी में जीवन की सच्‍चाई को बडे सहज एवं सरल तरीके से व्‍यक्‍त किया गया है। अमीर और गरीब के बीच केवल धन दौलत की दीवार नहीं होती दकियानूसी विचारों की दीवार भी होती है ।

निराधार हुआ आधार

डॉ. महेश परिमल
सबसे पहले जब उद्योगपति नंदन नीलकेणी ने पिछली सरकार के सामने एक भारतीय की अपनी पहचान के लिए एक प्रस्ताव रखा कि हम भारतीयों के नाम में समानता हो सकती है, पर यदि अपनी पहचान कायम करने के लिए यदि सभी के अलग-अलग नम्बर हों, जिसके आधार पर उसकी पहचान स्थापित हो सके। तो सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए सभी के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया। धीरे-धीरे यह हर भारतीय की पहचान बनने लगा। इससे आगे बढ़ते हुए भाजपा सरकार ने इसे उपभोक्ता के बैंक खाते से जोड़ने के लिए कदम उठाया। इससे समूचे देश में एक क्रांति ही आ गई। हर तरफ आधार कार्ड की ही चर्चा होने लगी। साथ-साथ इसमें की गई गलतियों एवं लापरवाहियों के किस्से भी आम हो गए। लेकिन एक बात यह ठीक रही कि इससे उपभोक्ता के खाते में सबसिडी की राशि सीधे जमा होने लगी। पर तभी सुप्रीमकोर्ट ने यह आदेश दिया कि आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया जा सकता। इससे लोगों में एक तरह की बेचैनी देखी गई। काफी जद्दोजहद से बना था आधार कार्ड, लेकिन उसकी उपयोगिता को अनदेखा कर दिया गया। अब अाधार कार्ड की हालत यह है कि यह अपनी पहचान बनाते-बनाते स्वयं ही निराधार हो गया। एक तरफ डिजिटल इंडिया के लिए सरकार हाय-तौबा मचा रही है, तो दूसरी तरफ डायरेक्ट केश ट्रांसफर के साथ जुड़ी आधार कार्ड योजना के संबंध में लापरवाह हो गई है। सरकार की सबसिडी की राशि सीधे उपभोक्ता के खाते में चली जाए, इसके लिए आधार कार्ड को सीधे बैंक खाते से जोड़ दिया गया। आधार कार्ड पाकर लोग स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। लोग इसे हाईप्रोफाइल मानने लगे। लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने अपने निर्णय में यह कहा कि प्रजा का यह बायोमेट्रिक डाटा सुरक्षित नहीं है। इस जानकारी को गोपनीय भी नहीं रखा जा सकता। सुप्रीमकोर्ट ने सबसिडी जमा करने के लिए आधार कार्ड को उपयोगी माना। परंतु इसके अन्य क्षेत्रों में उपयोग के लिए अनुपयोगी माना। इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है कि इसे अन्य क्षेत्रों में भी उपयोग में लाया जाए या नहीं। आधार कार्ड की योजना सभी क्षेत्रों में जारी रखी जाए या नहीं, इस आशय का सुझाव सेबी, आरबीआई, एलआईसी, ट्राई एवं आयकर आदि ने दिए हैं। इस तरह से देखते ही देखते आधार कार्ड जीवन का ही आधार बन गया। लोग इसके लिए लम्बी-लम्बी लाइनों में खड़े रहकर, परेशान होकर अपना कार्ड बनवाने लगे। सब कुछ अच्छे से चल रहा था कि अचानक ही एक जनहित याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने यह फैसला दिया कि आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। इस फैसले से लोगों की आशाओं पर मानों तुषारापात हो गया। आधार कार्ड को कांग्रेस अपना गेम चेंजर समझती थी, परंतु लोकसभा चुनाव में वह इसे पूरी तरह से भुना नहीं पाई। कांग्रेस के इस कार्य को भाजपा सरकार ने भुनाने का प्रयास किया, इसमें काफी हद से कामयाब भी रही।


सरकार डायरेक्ट बेनीफीट ट्रांसफर स्कीम को आधार कार्ड के साथ जोड़ना चाहती थी, परंतु इसके लिए कोई योजना तैयार नहीं कर पाई। एक योजना के अंतर्गत यह प्लान था कि सरकार की तरफ से मिलने वाले लाभ को सीधे उपभोक्ता के बैंक खाते में डाल दिया जाए। यूपीए सरकार इस योजना में विफल साबित हुई। सभी यही सोच रहे थे कि एनडीए सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस नाकामयाब योजना को ताक पर रख देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। आधार कार्ड का आइडिया देने वाले नंदन नीलकेणी मोदी को इसकी उपयोगिता को समझाने में सफल रहे। उन्होंने बताया कि आधार कार्ड से अभी भले नहीं, पर भविष्य में इसके चमकात्कारिक परिणाम सामने आ सकते हैं। इसके बाद इस आधार कार्ड को जोरदार सफलता मिलने लगी। एलपीजी सबसिडी आदि की राशि सीधे ग्राहक के खाते में जमा होने लगी। जन धन योजना के अंतर्गत 28 अगस्त तक 17.74 करोड़ बचत खाता बैंकों में खुले थे। इसमें से 22 हजार करोड़ की राशि जमा भी हो गई। ये सभी खाते आधार कार्ड के साथ जोड़ दिए गए थे। 3 लाख 515 हजार 634 परमानेंट एकाउंट नम्बर (पेनकार्ड) आधार कार्ड के साथ जुड़ गए। आधार कार्ड का दूसरा लाभ यह हुआ कि बैंक एकाउंट ख्ुलवाना, पासपोर्ट बनवाना आदि अन्य सरकारी कामों में भी इसका उपयोग होने लगा था। सरकार को आधार कार्ड के उपयोग को एक सीमा में रखने के बजाए राज्यों में कितने बोगस राशन कार्ड हैं, इसकी जांच कर उसे रद्द करने का काम करना चाहिए।
आधार का आधार पहले तो स्पष्ट था, इसके कारण कई बोगस उपभोक्ताओं की पहचान हो गई। भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया। इससे प्रजा का धन योग्य हाथों में जाना शुरू हो गया। आधार कार्ड के कारण यह स्पष्ट हुआ कि 2011 में आंध्र प्रदेश में जब जनसंख्या की गणना हुई, तो पता चला कि जितने राशन कार्ड हैं, उससे अधिक उस राज्य की आबादी है। यानी की आबादी से कई गुना राशन कार्ड थे। इससे बिचौलियों का आधार खत्म हो गया। इन्हीं के कारण सरकार द्वारा दिया जाने वाला लाभ सही हाथों तक नहीं पहुंच पाता था। इससे कई फायदे हुए। लेकिन जो पहले सरकारी सहायता को लोगों तक नहीं पहुंचने देना चाहते थे, वही लोग इससे घबराने लगे। वही लोग जनहित याचिका लगाकर उसे एक बेकार योजना बनाने में लगे हुए हैं। आधार कार्ड जैसी योजना बार-बार देखने को नहीं मिलती। जब तक लार्जर बैंक कोई निर्णय न ले, तब तक आधार कार्ड केवल एलपीजी, केरोसीन और अनाज की सबसिडी में काम में लाई जा सकती है। इससे भले ही सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। लेकिन इसके लाभ को देखते हुए इसे जारी रखना चाहिए। ताकि सरकारी लाभ का फायदा सीधे हितग्राहियों को ही मिले।
डॉ. महेश परिमल

हरीश परमार की कविताऍं

छत्‍तीसगढ के साहित्यकारों में हरीश परमार एक जाना पहचाना नाम है। उनकी कविताएँ विशेष रूप से बाल कविताऍं काफी सराहनीय हैं। यहॉं पर उनकी कुछ जीवन की सच्‍चाई से जुडी कविताएँ आप सुन सकते हैं।

बाल कविता मेरा घर

बाल कविता मेरा घर एक मासूम चिडिया का संसार कितना छोटा होता है और धीरे धीरे बढता जाता है। इसी बात को इस कविता में बताया है एक मासूम आवाज ने।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

खुशबू का रंग

कहानी खुशबू का रंग 38 साल पहले सारिका में प्रकाशित नासिरा शर्मा की यह कहानी जेहन में चल रही थ्‍ाी। जिसे आज आवाज देते हुए रोमांचित हूँ।

दुष्‍यंत कुमार की गजलें

हिंदी गजलों में दुष्‍यंत कुमार का नाम सर्वोपर‍‍ि है। उनकी गजलें आज भी प्रासंगिक हैंं।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

एक था चूजा

एक था चूजा - यह कहानी, कविता की तर्ज पर तुकबंदी के साथ लिखी गई है। जिसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि किस तरह से माँ की बात न मानने पर बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जब उन्‍हें अपनी गलती पता चलती है, तब तक देर हो चुकी होती है। भारती परिमल







स्कूल का अंतिम दिन




आज के बच्चे स्कूल जाकर वहाँ इतने रम जाते हैं कि वे स्कूल छोड़ना ही नहीं चाहते। 12 पास करने के बाद भी वे अपनी स्कूल की यादें दिल से नहीं भुला पाते हैं। एेसी ही एक 12 वीं पास युवती की जुबानी सुनें कि वह क्यों स्कूल छोड़ना नहीं चाहती। यह कविता है भारती परिमल की और उसे पढ़ा है उनकी बेटी अन्यूता परिमल ने

सुलगते सवालों के मुहाने पर हम!

डॉ. महेश परिमल
 इस समय देश का माहौल कुछ बदला-बदला-सा लग रहा है। नेताओं की जुबानें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। जुबानी-जंग तेज से तेजतर होती जा रही हैं। लोग स्वयं को असुरक्षित समझने लगे हैं। कोई मकान बदल रहा है, तो कोई शहर। कोई अपने घर में राशन भर रहा है, तो कोई बच्चों को विदेश भेज रहा है। ये सारे ताम-झाम केवल स्वयं और परिवार की सुरक्षा को लेकर हो रहा है। हिंदू-मुस्लिम के नाम पर दोनों को अलग करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जा रही है। ऐसा लगता है कि भीतर ही भीतर कुछ पक रहा है। कुछ ऐसी तैयािरयां हो रही हैं, जो इसके पहले कभी नहीं हुई। लोग परस्पर संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। सब अपने में ही मस्त हैं। टीवी पर चीखते लोग ऐसे लगते हैं, मानों पूरे देश में आग लगा देंगे। अखबार भी कम नहीं हैं। एक छोटी-सी खबर को भी बहुत बड़ा स्थान देकर उसे तूल दिया जा रहा है। कोई किसी का सरमायादार नहीं बनना चाहता। विश्वास नाम की चीज तो रह ही नहीं गई है। ऐसा माहौल पहले कभी देखने को नहीं मिला। अभी कुछ ही दिन पहले एक मित्र ने अपने प्रावीडेंस फंड से कुछ राशि निकाली। उस राशि से उसने घर में दो महीने का राशन भर लिया। मुझे आश्चर्य हुआ। इसका कारण जानना चाहा, तो उसने साफ-साफ कहा-इस देश में अब कभी-भी कुछ भी हो सकता है। हो सकता है, लंबा कर्फ्यू ही लग जाए। इसलिए बच्चों के लिए कुछ तो रखना ही होगा। मुझे समझ में नहीं आया कि आखिर माजरा क्या है। इस देश को काफी लंबे समय बाद बहुमत वाली सरकार मिली है। सरकार का वादा है कि वह जाति,धर्म आदि से उठकर काम करेगी। सबका विकास करेगी। ऐसा होता दिखाई भी दे रहा है, तो फिर अराजकता का माहौल क्यों दिखाई दे रहा है? कहीं तो ऐसा कुछ है, जो बाहर से दिखाई नहीं दे रहा है, पर भीतर ही भीतर सुलग रहा है। इस बीच नेताओं के बयान पर कोई अंकुश नहीं है। वे कुछ भी बोल रहे हैं, तो मीडिया को मसाला मिल रहा है। कहीं किसी के मुंह से कुछ गलत निकला कि वह मुद्दा बन जाता है। कहने वाला तो एक ही बार कहता है, फिर मीडिया उसे दिन में करीब 100 बार कहलवा देता है। इससे माहौल बिगड़ते देर नहीं लगती। देखा जाए, तो संयम तो कहीं किसी में दिखाई नहीं दे रहा है। अंकुश के अभाव में लोग एक-दूसरे को भड़काने में ही लगे हैं। सोशल मीडिया तो इस दिशा में एक कदम आगे जाकर काम करने लगा है। अफवाहें फैलाने में इससे बड़ा कोई माध्यम ही नहीं है। यूं तो सोशल मीडिया ज्ञान का खजाना है, पर इस खजाने का दुरुपयाेग ही अधिक हो रहा है। आपसी सद्भाव अब दुर्लभ हो गया है। इक्का-दुक्का कुछ खबरें आ जरूर रही हैं, पर वह समुद्र में एक बूंद की तरह है। बच्चों में प्रतिस्पर्धा के नाम पर कुछ ऐसे संस्कार डाल दिए गए हैं कि दूसरे नम्बर पर आने पर वह यही कहता पाया जाता है कि टीचर नेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे पक्षपात किया। काेई भी किसी के निर्णय से संतुष्ट ही नहीं है। हर कोई अपना मुकाम खुद ही बनाना चाहता है। बच्चों में यह सब कुछ आ रहा है, बड़ों के माध्यम से। बच्चे जो देख-सुन रहे हैं, उसे ही अपने जीवन में उतार रहे हैं। संस्कार के साधन अब माता-पिता ही नहीं, बल्कि मोबाइल-टीवी हो गए हैं। आकाशीय मार्ग से मिलने वाले इस ज्ञान से बच्चे कुछ अलग ही तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं। स्कूलों में हर बच्चा आक्रामक ही दिखाई दे रहा है। सभी की नसें तनी हुई होती हैं। इसकी वजह होम वर्क तो कतई नहीं है। पर वे भी स्वयं पर काबू नहीं रख पा रहे हैं। घर में कोई भी इलेक्ट्राॅनिक चीज बच्चों की सहमति के बिना आ ही नहीं सकती। बच्चे बड़ों के काम में दखल देने लगे हैं, पर उन्हें अपने काम में बड़ों का दखल कतई मंजूर नहीं। हर कोई अपने ही आस्मां में कैद रहकर अपना रास्ता खोज रहा है। न तो उसे अपनी मंजिल का पता है और न ही उसे यह पता है कि उसे जाना कहां है? यदि जाना है, तो उसके पास जो संसाधन है, उससे वह अपनी मंजिल तक पहंुच सकता है? रही बात गांव, मोहल्ले, शहरों की, तो सभी जगह राजनीति ने ऐसी पैठ जमा ली है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। एक-दूसरे को नीचा दिखाना मानो राष्ट्रधर्म बन गया है। अपने को कोई कम आंकना ही नहीं चाहता। किसी भी किसी अपराध में पकड़ लिया जाए, तो उसकी पहंुच इतनी दूर तक होती है कि वह पुलिस हिरासत में पहुंचने के पहले ही रिहा हो जाता है। मामला थाने तक भी नहीं पहुंच पाता। ऐसा तो गांव, मोहल्ले में हो रहा है। पर जो राजधानी स्तर पर हो रहा है, उसकी तस्वीर बहुत ही भयानक है। छोटी से छोटी संस्थाओं के तार राजनेताओं से जुड़े हुए हैं। इन नेताओं के तेवर इतने अधिक सख्त हैं कि अपनी जीत के लिए वे कुछ भी कर सकने के लिए दल-बल के साथ तैयार हैं। हर नेता की अपनी तैयारी है। उनके अपने कार्यकर्ता हैं, जो एक आवाज पर लड़ने-मरने को उतारू हैं। मानों यह संकल्प ही ले लिया है कि अब की बार तो कोई बच ही नहीं पाएगा। बिहार चुनाव को लेकर इस समय काफी गर्मा-गर्मी भी दिखाई दे रही है। अभद्र भाषा का चलन ऐसा बढ़ गया है कि कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करना चाहता। माहौल ऐसा बन गया है कि दुश्मन को जीवित देखना भी पसंद नहीं है। दुश्मन का जिंदा रहना उनकी कायरता है। अपनी इस कायरता को कम करने के लिए वे कुछ ऐसा करने के लिए तैयार हैं, जिससे दुश्मन नेस्तनाबूत हो जाएं। देश की स्थायी सरकार में ही कुछ लोग ऐसे हैं, जो किसी का कहना नहीं मान रहे हैं। आपत्तिजनक बयानों के बाढ़ आ गई है। मुद्दा कोई भी हो, उसका तुरंत राजनीतिकरण हो जाता है। उसके बाद बयान दर बयान का सिलसिला चल निकलता है। उनके बयान इतने अधिक आक्रामक होते हैं कि लोग अपने वश में नहीं रह पाते। कुछ कर गुजरने की छटपटाहट बढ़ जाती है। अब साधू-संत भी इसमें पीछे नहीं रहे। उनके अंधभक्त भी इतने अधिक हिंसावादी हैं कि वे और कोई दूसरी भाषा न तो समझते हैं और न ही उन्हें शांति की भाषा आती है। हर दल का अपना एक अलग ही आक्रामक शाखा है, जो बस आदेश की प्रतीक्षा में है। उलझन भरे इस माहौल में आम आदमी का सांस लेना मुश्किल हो गया है। बदलते माहौल को लेकर हर कोई अपने तईं तैयारी कर ही रहा है। पर यह तय है कि कुछ हुआ, तो सबसे अधिक प्रभावित आम आदमी ही होगा। वही मारा जाएगा, उसके बच्चे मारे जाएंगे, उसका परिवार तबाह हो जाएगा। उच्च और मध्यम वर्ग तो अपनी तैयारी कर चुका है, अब निम्न वर्ग क्या करे? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सुलगते सवालों के मुहानों पर बैठा आज इंसान यह तय नहीं कर पा रहा है कि क्या किया जाए? संकीर्ण मानसिकता, ओछी राजनीति, तीखी हवाओं के बीच आम आदमी अपने वजूद को तलाश रहा है। इससे बचने की कोई राह दूर-दूर नहीं दिखाई नहीं दे रही है। क्या होगा इस देश का, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
 डॉ. महेश परिमल

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

बावरे मुहावरे

मुहावरों में वह शक्ति होती है, जो कई बार बहुत ही मारक होती है। कई बार ये लोगों को हँसा भी देते हैं। कई बार सौ बातों की अपेक्षा एक ही मुहावरा काफी होता है, अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी होने के लिए। कई मुहावरे तो आपस में विरोधाभासी भी होते हैं। ये हमारे जीेवन में हमेशा काम आते हैं। आओ, मुहावरों की इस दुनिया में थोड़ी देर के लिए, सच में बहुत मजा आएगा....



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नारी जीवन से जुड़ी सच्चाई को दर्शाती एक कविता


दिव्य दृष्टि - एक परिचय और एक नई शुरूआत

आज से नियमित तौर पर सुनें हिंदी पॉडकास्ट - हर विषय और हर रंग में.

हम शुरुआत कर रहे हैं अपना परिचय और अपने काम के बारे में आपको बता कर :


शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

विरोध नहीं, उसकी जड़ की पड़ताल हो

डॉ. महेश परिमल
चिड़िया जैसी कद का एक खूबसूरत स्पेनिश पक्षी होता है, जिसका नाम है केनेरी। 300 वर्ष पहले जब कोयले की खानों में काम करने वाले खनिक मजदूर अपने काम के लिए जाते थे, तब अपने साथ इस केनेरी पक्षी को भी ले जाते थे। इस पक्षी की यह विशेषता हाेती है कि खदानों से निकलने वाली मिथेन जैसी जहरीली गैस को सबसे पहले यही पक्षी महसूस करता है, थोड़ी-सी गंध से ही इस पक्षी का दम घुटने लग जाता है। कुछ देर बाद इसकी मौत हो जाती थी। इससे मजदूर समझ जाते थे कि कहां पर मिथेन गैस की बहुतायत है। एक पक्षी की अकाल मृत्यु से कई मजदूरों की जान बच जाती थी। समाज में रहने वाले सर्जक, लेखक, कलाकार या फिर कवि ये सभी अपने आसपास के समाज के केनेरी पक्षी की तरह होते हैं। अपने समय या देशकाल के आंतरिक सत्य को ये सबसे पहले महसूस करते हैं। उसके बाद अपने विचार समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं। आम जनता अपने आसपास फैली जहरीली हवाओं को पहचान नहीं पाती, इसलिए ये समाज के संवेदनशील लोग केनेरी पक्षी की भूमिका अदा करते हैँ। अपने जान जोखिम में डालकर ये लोगों को सचेत करते हैं कि आने वाला समय काफी संवेदनशील है, जो खतरनाक भी हो सकता है। इसलिए सचेत हो जाएं। लोगों को सचेत करने वाले यही सर्जक, कवि, कलाकार, लेखक अपनी इसी ख्ूबी के कारण समाज के पहरुए का काम करते हैं। इसलिए इनका स्थान विशिष्ट होता है। इस समय ये काम नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने किया है। स्वयं को मिले सम्मान सरकार को लौटाते हुए इन्होंने अपनी तरफ से विरोध का स्वर मुखर किया है। इस स्वर में वह पीड़ा प्रस्फुटित होती है, जो उनकी पहचान है।
इस समय देश में जो कुछ भी हो रहा है, वह एक संवेदनशील समाज के लिए घातक है। इससे बौद्धिक वर्ग कुछ अनमना-सा महसूस कर रहा है। विख्यात साहित्यकार नयनतारा सहगल ने कितनी ही समस्याओं को लेकर देश के प्रधानमंत्री और अन्य प्रबुद्ध वर्ग के मौन को लेकर अपना विरोध व्यक्त किया है। इस ओर सबका ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने की घोषणा भी कर दी है। उनका अनुसरण करते हुए अशोक वाजपेयी ने भी स्वयं को मिले पुरस्कार लौटा दिए हैं। स्वाभाविक है, कुछ लोग इसे भाजपाई खेमे के विरोध के रूप में देख रहे हों और इसे  राग कांग्रेसी’ बता रहे हों। पर क्या यह पूरा सच है? नयनतारा सहगल को कांग्रेसी कहकर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। भले ही वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी हों, पर केवल इसी कारण से उन्हें हाशिए पर नहीं डाला जा सकता। उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में भी है। पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान अपने उपन्यास ‘टाइम टू बी हेपी’ से खींचा। इसके बाद तो ‘स्टार्म इन चंडीगढ़’ ‘मिस्टेकन आईडेंटटिटी’ और ‘रिच लाइफ अस’ जैसे उपन्यासों के माध्यम ने साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। यही नहीं समय-समय पर उन्होंने सर्जनात्मक साहित्य के साथ-साथ अपने आसपास के राजनीतिक, सामाजिक अौर वैश्विक परिवेश पर भी अपने विचार व्यक्त करती रहीं हैं। नयनतारा जवाहर लाल नेहरू की भांजी है, इस आवरण से तो वे तभी मुक्त हो गई थीं, जब उन्होंने इंदिरा गांधी के शासन में उनका विरोध किया था। अपनी किताब इंदिरा गांधी इमर्जेंसी एंड स्टाइल में उन्होंने व्यक्तिपूजा, एकाधिकार के कारण लोकतंत्र की छटपटाहट को व्यक्त किया था। उस समय उनका यह रूप भाजपा को बहुत भला लगा था। स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने नयनतारा को एक ‘जाग्रत सर्जक’ ही एक जाग्रह प्रहरी हो सकता है, कहकर उनकी प्रशंसा की थी। वही नयनतारा अब भाजपा शासन की बुराई कर रहीं हैं, तो इसे कांग्रेसी राग कहा जा रहा है। किस तरह की दोहरी मानसिकता है लाेगों की? दूसरी ओर अशोक वाजपेयी को  हिंदी के ख्यातनाम कवि के रूप मे पहचाना जाता है। सरकार के कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला है उन्होंने। गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के लिए उन्होंने काफी काम किया है। उनका कार्यकाल कांग्रेस शासन में अधिक रहा, इसलिए लोग उन्हें ‘कांग्रेस कवि’ कहते हैं। परंतु जिनकी कविता के प्रशंसक अटल बिहारी वाजपेयी हों और उन्होंने ही अशोक जी को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया हो, तो फिर वे किस तरह से कांग्रेसी कवि हो गए? इसका जवाब किसी भाजपाई के पास नहीं है।
इन दोनों बुद्धिजीवियों ने वर्तमान राजनीतिक वातावरण में बढ़ रही धर्मांधता, मानवीय मूल्यों के हनन और स्वेच्छाचारी विचारधारा के अतिक्रमण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। यह एक चुनौतीभरा काम है। नयनतारा ने साहित्य अकादमी द्वारा मिले सम्मान को वापस करते हुए यह मुद्दा उठाया हे कि देश में स्थापित हितों के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की हत्या हो रही है,तब साहित्य अकादमी खामोश क्यों बैठी है? दादरी हत्या के मामले में प्रधानमंत्री अब तक मौन क्यों हैं? इस पर भी उन्होंने अपना विरोध मुखर किया है। नयनतारा ने इसके पहले कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी की हत्या, वामपंथी विचार गोविंद पानसरे की हत्या और सुधारवादी नेता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या का उल्लेख किया है। ये तीनोें बुद्धिजीवी अपने-अपने क्षेत्र में अपनी तरह का योगदान देते रहे हैं। तीनों की हत्या में समानता है। तीनों ही मामले में धर्मांध लोगों को इनकी सक्रियता फूटी आंख नहीं सुहा रही थी। ये उनके लिए आंख की किरकिरी बन गए थे। एम.एम. कलबुर्गी भी साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे। अपने लेखन में उन्होंने समय-समय पर धार्मिक रूढ़ियों, उन्माद, क्रियाकांडों की निरर्थकता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर तीखा प्रहार भी किया था। मूर्ति में क्या कोई शक्ति है, इसकी जांच के लिए उन्होंने जो कुछ किया, उस पर विहिप और बजरंग दल वाले भड़क उठे, उनकी काफी आलोचना हुई। अंतत: 30 अगस्त को उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। गोविंद पानसरे महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत के साम्यवादी विचारक थे। राजनीतिक विचारधारा वामपंथी होने के कारण वे समाज की रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाते रहते। शिवाजी पर केंद्रित उनकी किताब काफी विवादास्पद हुई थी। शिवाजी पर उनके दृष्टिकोण से शिवसेना एवं अन्य धार्मिक कट्‌टरवादी संस्थाएं उनके विरोध में आ खड़ी हुई थीं। उन पर तीन बार प्राणघातक हमला हुआ। ऐसे ही एक हमले में गत फरवरी में वे अपनी जान गवां बैठे। इसी तरह नरेंद्र दाभोलकर भी समाज में फैली कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधश्रद्धा, क्रियाकांडों, धार्मिक पाखंडों आदि पर जमकर प्रहार करते। अपनी इसी प्रहारक क्षमता के कारण वे धर्म के नाम पर ढोंग करने वाले कथित बाबाओं के लिए परेशानी का कारण  बन गए थे। कितनी बार उन्हें जान से मारने की धमकी मिली। उन पर हमले भी हुए। अंधश्रद्धा निर्मूलन संबंधी विधेयक लाने के लिए वे पूरे महाराष्ट्र में अभियान चला रहे थे। इसके कारण कितने ही सांप्रदायिक संगठनों के निशाने पर आ गए थे। अंतत: उन्हें भी अपनी जान खोनी पड़ी।
उपरोक्त तीनों मामलों से एक बात यही निकलकर आती है कि क्या गोविंद पानसरे ने शिवाजी के प्रति अपने विचार रखने का अधिकार नहीं है। क्या वे अपनी नई नजर, नए तर्क से अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकते? मूर्ति में बसने वाले ईश्वर वास्तव में हमारे भीतर बसते हैं, ऐसा कहने वाले कलबुर्गी अपने ही बचपन में की गई नादानी का किस्सा बताते हैं, तो कुछ लोगों के सर पर आसमान क्यों टूट पड़ता है? यह ईश्वरीय तत्व का अपमान है या सत्य की तरफ ले जाने वाला एक नूतन अभिगम है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हम सभी को प्राप्त है। यह लोकतंत्र का प्राण है। इसके अलावा यह हिंदू धर्म का मर्म भी है। प्राचीन वेदग्रंथों में भी ब्रह्म को व्याख्यायित करने के लिए मंथन करने वाले शिष्यों को गुरु सतत ‘नेति...नेति’ कहकर सत्य की तरफ ले जाते रहे हैं। क्या उस समय उनके शिष्यों ने अपने गुरु पर हमला किया था। ब्रह्म यह नहीं है, ऐसा लगातार कहने वाले गुरु को हम नास्तिक कहने में जरा भी संकोच नहीं करते। विचारों की ताजगी को खुले रूप में स्वीकारना ही हिंदू धर्म का लचीलापन है। इसी लचीलेपन के कारण ही हिंदू धर्म हजारों साल के बाद भी पूरी शिद्दत के साथ अडिग है। इतने सारे आक्रमणों के बाद भी उसमें जरा भी विचलन नहीं आया है। उसकी अविचलता ही उसकी पहचान है। तो क्या आज यदि कुछ लोग ज्वलंत मामलों में अपना नया विचार रखते हैं, तो सचमुच हिंदू धर्म खतरे में पड़ जाएगा? यदि वास्तव में ऐसा होता, तो यह धर्म कब का नेस्तनाबूत हो चुका होता। नयनतारा सहगल हो या अशोक वाजपेयी, यदि वे अपना विरोध दर्ज करते हैं, तो उन्हें गंभीरता से सुनना ही होगा। आखिर उन्हें एेसा कहने और करने की नौबत क्यों आई, इस पर गहराई से विचार आवश्यक है। न कि उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर किसी तरह की टिप्पणी की जाए। समाज में यदि विरोध नहीं होगा, तो नए विचार कैसे आएंगे। विरोध तो सामाजिक विकास का अभिन्न अंग है। इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। यदि हमने विरोध को नहीं स्वीकारा, तो मंजीरों के शोर में हम भी क्रमश: तालिबानी मानसिकता के प्रभाव में आ जाएंगे। इसका हमें आभास भी नहीं होगा। विरोध को कुचलना समाधान नहीं है, बल्कि विरोधियों का हौसला बुलंद करना है।
डॉ. महेश परिमल

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