अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

2:58 pm
कविता का अंश... कालिदास! सच-सच बतलाना ! इंदुमती के मृत्यु शोक से, अज रोया या तुम रोये थे ? कालिदास! सच-सच बतलाना ? शिवजी की तीसरी आँख से, निकली हुई महाज्वाला से, घृतमिश्रित सूखी समिधा सम, कामदेव जब भस्म हो गया, रति का क्रंदन सुन आँसू से, तुमने ही तो दृग धोये थे ? कालिदास! सच-सच बतलाना, रति रोयी या तुम रोये थे ? वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका, प्रथम दिवस आषाढ़ मास का, देख गगन में श्याम घन-घटा, विधुर यक्ष का मन जब उचटा, खड़े-खड़े जब हाथ जोड़कर, चित्रकूट के सुभग शिखर पर, उस बेचारे ने भेजा था, जिनके द्वारा ही संदेशा, उन पुष्करावर्त मेघों का, साथी बनकर उड़ने वाले, कालिदास! सच-सच बतलाना, पर पीड़ा से पूर-पूर हो, थक-थक कर और चूर-चूर हो, अमल-धवल गिरि के शिखरों पर, प्रियवर! तुम कब तक सोये थे? रोया यक्ष या तुम रोये थे? कालिदास! सच-सच बतलाना ! इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.