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12:19 pm
कविता का अंश... उन खोखले वादों की कटारों से, हम हर रोज़ कटते रहते हैं, उन भयंकर भ्रम जालों से, बहार निकल नहीं पाते हैं । उस अदृश्य आशा की तलाश में, हर रोज़ भटकते रहते हैं, हर शाम खुद से ही हार कर, फिर मायूस हो जाते हैं । उन अविरत आडंबरों से, हम इतने कायर बन चुके हैं, अपनी ही सच्चाई के सुरों को, हम सुन नहीं पाते हैं । अपने ही झूठ के जंगलों में, अक्सर हम खों जाते है, अपमानों के आँसुओं को, घूँट घूँट कर हम पी जाते हैं । कभी दोस्ती के दलदल में, तो कभी प्रेम के मृगजाल में, हर बार हम फँस जाते हैं, लाख कोशिशों के बाद भी, उस दर्द ए दरिया में, हर बार हम डूब जाते हैं । आकर्षणों की आँधी में, हर बार हम बह जाते हैं, औकात से आगे सोचने की गलती, अक्सर हम कर जाते हैं । घनघोर निराशा की नाव में, हम अक्सर हिंचकोले खाते हैं, उन अनगिनत ठोकरों के बाद, अब दर्द को भी महसूस नहीं कर पाते हैं । हर दिन पैसे की अंधी प्यास में, खुद को ही बेचते रहते हैं, अब तो खुद ही बोली लगाकर, खुद को ही खरीदते रहते हैं। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... E-mail - nisarg1356@gmail.com दूरभाष - 8460284736

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