अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

1:45 pm
गुलाबी, अल्हड़ बचपन... कविता का अंश... मैंने बचपन के सामान को, अपनी स्मृति के कोटर में डाल दिया है। ताला लगा कर समय का, चाबी को सँभाल लिया है । बचपन के घर आँगन की, हवाओं में बिखरी किलकारियों, गुलाबी रिश्तों की बिखरी बातों, दीवारों पर टँगी, बुज़ुर्गों की, तस्वीरों को , सतरंगी बीते दिनों को, बिखरी यादों के मौसम को, बचपन की धुरी के चारों ओर, चक्कर काटते माँ बाबूजी, भाई भावज और उपहार से मिले, अल्हड मीठे दिनों को, अमूल्य पुस्तक-सा सहेज लिया है। और संचित कर जीवन कोश में, इंद्रधनुषी सतरंगी चूनर में, बाँध दिया है। अब यह पोटली मेरी धरोहर है, जिसे मैं किसी से बाँट नही सकती। कभी भी बचपन की चीज़ों को, कबाड़ की चीज़ों की तरह, छाँट नहीं सकती, क्योंकि यह पूँजी है, मैरे विश्वास की, कृति है श्रम की, जहाँ सें मैं, आरंभ कर सकती हूँ, यात्रा मन की, गुलाबी बचपन की। एेसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.