बुधवार, 8 जून 2016

एन. रघुरामन - जीने की कला - 8

दिव्य दृष्टि के श्रव्य संसार में हम लेकर आए हैं एन.रघुरामन की जीने की कला, जिसमें यह बताया गया है कि बच्चों को सुलाने के लिए सुनाई जानेवाली कहानियों को बदलना चाहिए। नई कहानियाँ बननी चाहिए और नई खोज की जानी चाहिए ताकि हमारे बच्चे आज की दुनिया की नई जिम्मेदारियाँ लेने के लिए स्वयं को तैयार कर सकें। बच्चे वो कोमल पौधे या कोमल मिट्टी हैं, जिन्हें जैसा चाहें वैसा आकार दिया जा सकता है। अत: उनकी सोच को बदलने का प्रयास कर उन्हें सही मार्गदर्शन दिए जाने की आवश्यकता है। बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क को एक नए साँचे में ढालने की प्रक्रिया से जुडी बातें जानते हैं इस ऑडियो के माध्यम से….

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