शुक्रवार, 3 जून 2016

राजेश्वर वशिष्ठ की कविता - कुंती की याचना

कविता का अंश... मित्रता का बोझ किसी पहाड़-सा टिका था कर्ण के कंधों पर पर उसने स्वीकार कर लिया था उसे किसी भारी कवच की तरह हाँ, कवच ही तो, जिसने उसे बचाया था हस्तिनापुर की जनता की नज़रों के वार से जिसने शांत कर दिया था द्रौणाचार्य और पितामह भीष्म को उस दिन वह अर्जुन से युद्ध तो नहीं कर पाया पर सारथी पुत्र राजा बन गया था अंग देश का दुर्योधन की मित्रता चाहे जितनी भारी हो पर सम्मान का जीवन तो यहीं से शुरु होता है! कर्ण बैठा था एक पेड़ की छाया में कुछ सुस्ताते हुए किसी गहन चिंतन में निमग्न युद्ध अवश्यम्भावी है अब लड़ना ही होगा अर्जुन को अब कौन कहेगा ----- तुम नहीं लड़ सकते अर्जुन से तुम राधेय हो, एक सारथी के पुत्र, कुल गौत्र रहित अब अंगराज कर्ण लड़ेगा अर्जुन से सरसराई पास की झाड़ी, चौंका कर्ण प्रतीत हुआ कोई स्त्री लिपटी है श्याम वस्त्र में उसने आग्रह किया कर्ण से आओ मेरे साथ कर्ण चकित हुआ पल भर को पर चल दिया उसके पीछे किसी अज्ञात पाश में आबद्ध वह तो कुंती थीं! कर्ण आश्चर्य से भर उठा आप यहाँ पांडव माता? इस अधूरी कविता को पूरा सुनिए ऑडियो की मदद से...

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