बुधवार, 22 जून 2016
कविता - पेड़ों के संग बढ़ना सीखो - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी साहित्य जगत के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही। चाहे वह कविता हो, गीत हो, नाटक हो अथवा आलेख हों। जितनी कठोरता से उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों पर आक्रमण किया, उतनी ही सहजता से वे बाल साहित्य के लिये भी लेखनी चलाते रहे। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर 1927 को बस्ती (उ.प्र) में हुआ। उन्होंने एंग्लो संस्कृत उच्च विद्यालय बस्ती से हाईस्कूल की परीक्षा पास कर के क्वींस कॉलेज वाराणसी में प्रवेश लिया। एम.ए की परीक्षा उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। एक छोटे से कस्बे से अपना जीवन आरम्भ करने वाले सर्वेश्वर जी ने जिन साहित्यिक ऊचाइयों को छुआ, वो इतिहास और उदाहरण दोनो हैं। उनके काव्य सन्ग्रह "खूंटियॊं पर टंगे हुए लोग" के लिये उन्हें १९८३ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। काठ की घंटियाँ, बांस का पुल, गर्म हवाएँ, एक सूनी नाव, कुआनो नदी आदि उनकी प्रमुख क्रतियां हैं। आपने पत्रकारिता जगत में भी उसी जिम्मेदारी से काम किया और आपका समय हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है।अध्यापन करने तथा आकाशवाणी में सहायक प्रोड्यूसर रहने के बाद वे बाल साहित्य पत्रिका "पराग" के सम्पादक रहे और "दिनमान" की टीम में अज्ञेय जी के साथ भी उन्होंने काम किया। उनकी देख रेख में हि्न्दी बाल साहित्य ने नये आयाम छुए और आज के समय में बाल साहित्य जगत उनके जैसे रचनाकारों की बड़ी कमी अनुभव करता है। यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता ऑडियो के माध्यम से... विश्वास है आपको यह अवश्य पसंद आएगी।
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