बुधवार, 1 जून 2016

कहानी - पीढ़ी - गोविंद उपाध्याय

कहानी का अंश... सुजाता बस मूक दर्शक बनी रहती। वैसे भी उसके पास बोलने के लिए था भी क्या? कभी लगता कि डॉक्टर साहब सही हैं, आखिर हर पिता की इच्छा होती है कि उसका बेटा उससे बेहतर करे। अपने बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतित होना हर पिता के लिए एक स्वाभाविक बात है। फिर यदि डॉक्टर प्रशांत ऐसा कर रहे हैं, तो यह कोई अनहोनी थोड़े ही है। पीयूष भी कुछ गलत नहीं है। हर एक को अपने भविष्य के बारे में सोचने का पूरा अधिकार है। अब वह बच्चा थोड़े ही है। अपना भला-बुरा खुद सोच सकता है। दुनिया की किस किताब में लिखा है कि पिता डॉक्टर है, तो बेटे को भी डॉक्टर होना चाहिए। पीयूष एक समझदार बच्चा है और अपने कैरियर के प्रति संवेदनशील भी है। उसने अपना कैरियर खुद चुना और देश का जाना-माना पत्रकार बना। अब उसकी बेटी भी अपनी तरह का जीवन चुनना चाहती थी। अपने अनुसार कैरियर बनाना चाहती थी। फिर वही विचारों की लड़ाई दोहराई जा रही थी। बाप-बेटी के बीच मतभेद की दीवार ऊँची हो, उससे पहले सुजाता ने इस दीवार को तोड़ने का फैसला ले लिया। किस तरह टूटी यह दीवार ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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