सोमवार, 6 जून 2016

पंचतंत्र की कहानियाँ - 16 - दुश्मन का स्वार्थ

दुश्मन का स्वार्थ... कहानी का अंश... एक पर्वत के समीप बिल में मंदविष नामक एक बूढा सांप रहता था। अपनी जवानी में वह बडा रौबीला सांप था। जब वह लहराकर चलता तो बिजली-सी कौंध जाती थी पर बुढापा तो बडे-बडों का तेज हर लेता हैं। बुढापे की मार से मंदविष का शरीर कमज़ोर पड गया था। उसके विषदंत हिलने लगे थे और फुफकारते हुए दम फूल जाता था। जो चूहे उसके साए से भी दूर भागते थे, वे अब उसके शरीर को फांदकर उसे चिढाते हुए निकल जाते। पेट भरने के लिए चूहों के भी लाले पड गए थे। मंदविष इसी उधेडबुन में लगा रहता कि किस प्रकार आराम से भोजन का स्थाई प्रबंध किया जाए। एक दिन उसे एक उपाय सूझा और उसे आजमाने के लिए वह दादुर सरोवर के किनारे जा पहुंचा। दादुर सरोवर में मेंढकों की भरमार थी। वहां उन्हीं का राज था। मंदविष वहां इधर-उधर घूमने लगा। तभी उसे एक पत्थर पर मेंढकों का राजा बैठा नजर आया। मंदविष ने उसे नमस्कार किया 'महाराज की जय हो।' मेंढकराज चौंका 'तुम! तुम तो हमारे बैरी हो। मेरी जय का नारा क्यों लगा रहे हो?' मंदविष विनम्र स्वर में बोला 'राजन, वे पुरानी बातें हैं। अब तो मैं आप मेंढकों की सेवा करके पापों को धोना चाहता हूं। श्राप से मुक्ति चाहता हूं। ऐसा ही मेरे नागगुरु का आदेश हैं।' मेंढकराज ने पूछा 'उन्होंने ऐसा विचित्र आदेश क्यों दिया?' मंदविष ने मनगढंत कहानी सुनाई 'राजन्, एक दिन मैं एक उद्यान में घूम रहा था। वहां कुछ मानव बच्चे खेल रहे थे। ग़लती से एक बच्चे का पैर मुझ पर पड गया और बचाव स्वाभववश मैंने उसे काटा और वह बच्चा मर गया। मुझे सपने में भगवान श्रीकृष्ण नजर आए और शाप दिया कि मैं वर्ष समाप्त होते ही पत्थर का हो जाऊंगा। मेरे गुरुदेव ने कहा कि बालक की मृत्यु का कारण बन मैंने कृष्णजी को रुष्ट कर दिया हैं, क्योंकि बालक कॄष्ण का ही रुप होते हैं। बहुत गिडगिडाने पर गुरुजी ने शाप मुक्ति का उपाय बताया। उपाय यह हैं कि मैं वर्ष के अंत तक मेंढकों को पीठ पर बैठाकर सैर कराऊं।' मंदविष की बात सुनकर मेंढकराज चकित रह गया। सांप की पीठ पर सवारी करने का आज तक किस मेंढक को श्रेय प्राप्त हुआ? उसने सोचा कि यह तो एक अनोखा काम होगा। मेंढकराज सरोवर में कूद गया और सारे मेंढकों को इकट्ठा कर मंदविष की बात सुनाई। सभी मेंढक भौंचक्के रह गए। एक बूढा मेंढक बोला 'मेंढक एक सर्प की सवारे करें। यह एक अदभुत बात होगी। हम लोग संसार में सबसे श्रेष्ठ मेंढक माने जाएंगे।' एक सांप की पीठ पर बैठकर सैर करने के लालच ने सभी मेंढकों की अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। सभी ने ‘हां’ में ‘हां’ मिलाई। मेंढकराज ने बाहर आकर मंदविष से कहा 'सर्प, हम तुम्हारी सहायता करने के लिए तैयार हैं।' आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

1 टिप्पणी:

  1. पंचतंत्र की कहानी जितनी बार पढ़ो, सुनो उतनी बार नयी लगती हैं। बार बार पढ़ने का मन करता हैं इन कहानियों को पढ़ने का।

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