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कविता का अंश... समय का पंछी उड़ता जाता एक जगह नहीं थम पाता मानव इसका पीछा करता भिन्न –भिन्न राहों पर चलता... पाप – पुण्य पोटली में भरता निज भाग्य निर्धारित करता प्रीत न किसी से ये है लगाता द्वेष न किसी के प्रति पालता बस उड़ता ....उड़ता ही जाता... अनेकों है निज रंग दिखाता हंसाता, रुलाता, प्रिय बनाता सीख सिखाता, अनुभव लाता परिपक्व बनाता, नित्य गाता पर लगाव न कभी दिखाता... निर्मोही बन आगे बढ़ जाता विदाई का पैगाम भी सुनाता सब यहीं का धरा रह जाता समय का पंछी आगे उड़ जाता... ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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