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12:12 pm
बिल्ली का न्याय कहानी का अंश... एक वन में एक पेड की खोह में एक चकोर रहता था। उसी पेड के आस-पास कई पेड और थे, जिन पर फल व बीज उगते थे। उन फलों और बीजों से पेट भरकर चकोर मस्त पडा रहता। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए। एक दिन उडते-उडते एक और चकोर साँस लेने के लिए उस पेड की टहनी पर बैठा। दोनों में बातें हुईं। दूसरे चकोर को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह केवल वह केवल पेडों के फल व बीज चुगकर जीवन गुजार रहा था। दूसरे ने उसे बताया- 'भई, दुनिया में खाने के लिए केवल फल और बीज ही नहीं होते और भी कई स्वादिष्ट चीज़ें हैं। उन्हें भी खाना चाहिए। खेतों में उगने वाले अनाज तो बेजोड होते हैं। कभी अपने खाने का स्वाद बदलकर तो देखो।' दूसरे चकोर के उड़ने के बाद वह चकोर सोच में पड गया। उसने फैसला किया कि कल ही वह दूर नजर आने वाले खेतों की ओर जाएगा और उस अनाज नाम की चीज़ का स्वाद चखकर देखेग। दूसरे दिन चकोर उड़कर एक खेत के पास उतरा। खेत में धान की फसल उगी थी। चकोर ने कोंपलें खाई। उसे वह अति स्वादिष्ट लगीं। उस दिन के भोजन में उसे इतना आनंद आया कि खाकर तृप्त होकर वहीं आँखें मूंदकर सो गया। इसके बाद भी वह वहीं पडा रहा। रोज खाता-पीता और सो जाता। छः - सात दिन बाद उसे सुध आई कि घर लौटना चाहिए। इस बीच एक खरगोश घर की तलाश में घूम रहा था। उस इलाके में ज़मीन के नीचे पानी भरने के कारण उसका बिल नष्ट हो गया था। वह उसी चकोर वाले पेड के पास आया और उसे ख़ाली पाकर उसने उस पर अधिकार जमा लिया और वहाँ रहने लगा। जब चकोर वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके घर पर तो किसी और का क़ब्ज़ा हो गया हैं। चकोर क्रोधित होकर बोला - 'ऐ भाई, तू कौन हैं और मेरे घर में क्या कर रहा हैं?' खरगोश ने दांत दिखाकर कहा - 'मैं इस घर का मालिक हूँ। मैं सात दिन से यहाँ रह रहा हूं, यह घर मेरा हैं।' चकोर गुस्से से फट पडा - 'सात दिन! भाई, मैं इस खोह में कई वर्षो से रह रहा हूं। किसी भी आस-पास के पंछी या चौपाए से पूछ ले।' खरगोश चकोर की बात काटता हुआ बोला- 'सीधी-सी बात हैं। मैं यहाँ आया। यह खोह ख़ाली पडी थी और मैं यहाँ बस गया मैं क्यों अब पडोसियों से पूछता फिरुँ?' चकोर गुस्से में बोला- 'वाह! कोई घर ख़ाली मिले तो इसका यह मतलब हुआ कि उसमें कोई नहीं रहता? मैं आखिरी बार कह रहा हूँ कि शराफत से मेरा घर ख़ाली कर दे वर्ना…।' आगे की कहानी ऑडियो की मदद से जानिए...

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