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12:28 pm
कविता का अंश... जाती हुई धूप संध्या की, सेंक रही है माँ। अपना अप्रासंगिक होना, देख रही है माँ। भरा हुआ घर है, नाती पोतों से, बच्चों से। अन बोला बहुओं के बोले, बंद खिड़कियों से। दिन भर पकी उम्र के घुटने, टेक रही है माँ। फूली सरसों नही रही, अब खेतों में मन के। पिता नहीं हैं अब नस नस, क्या कंगन सी खनके। रस्ता थकी हुई यादों का, छेक रही है माँ। बुझी बुझी आँखों ने, पर्वत से दिन काटे हैं। कपड़े नहीं, अलगनी पर फैले सन्नाटे हैं। इधर उधर उड़ती सी नजरें, फेक रही है माँ। इस कविता के साथ ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए..

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