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कविता का अंश... अब मत चला कुल्हाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। देख रहा तू कुल्हाड़ी , इसी ने काटे कई पेड़। नहीं किसी को छोड़ा बंदे, बूढ़े युवा अधेड़। भूखी नदिया सूखे नाले, नंगी हुई पहाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। कहाँ मकोरे कहाँ करोंदे, झरबेरी की बाड़? लुच, लुच लाल गुमचियाँ ओझल, जंगल हुये उजाड़। घूम रहे जंगल में आरे, नहीं रुक रही गाड़ी ब‍ंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। बादल फटा जलजले जैसा, पानी ढेरम ढेर। एक दिवस में तीस इंच तक, हुआ गजब अंधेर। सूखा पसरा बाढ़ आ गई, धरती बहुत दहाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। दो पहिया, मोटर, कारों के, सड़कों पर अंबार। आसमान में ईंधन छोड़ें, विष से भरे गुबार। कान फोड़ते कोलाहल ने, भू की छाती फाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। पर्यावरण प्रदूषण की यूँ, होती घर घर बात। किंतु समस्या के निदान में, नहीं किसी का साथ। बना नहीं कोई भी पाया, सबने बात बिगाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। अभी समय है अब भी चेतो, दुनियाँ भर के देश। चीन अमरिका ने ओढ़े हैं, नकली झूठे वेश। पर्यावरण प्रदूषण के ये, सबसे बड़े खिलाड़ी बंदे, अब मत चला कुल्हाड़ी। ऐसी ही अन्य कविताओं को सुनने के लिए आॅडियो की मदद लीजिए...

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    देख रहा तू इसी कुल्हाड़ी ने काटे कई पेड़।
    प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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