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चिड़िया और चुरूंगुन... कविता का अंश... छोड़ घोंसला बाहर आया, देखी डालें, देखे पात, और सुनी जो पत्‍ते हिलमिल, करते हैं आपस में बात;- माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया? 'नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया' डाली से डाली पर पहुँचा, देखी कलियाँ, देखे फूल, ऊपर उठकर फुनगी जानी, नीचे झूककर जाना मूल;- माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया? 'नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया' कच्‍चे-पक्‍के फल पहचाने, खए और गिराए काट, खने-गाने के सब साथी, देख रहे हैं मेरी बाट;- माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया? 'नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया' उस तरू से इस तरू पर आता, जाता हूँ धरती की ओर, दाना कोई कहीं पड़ा हो चुन लाता हूँ ठोक-ठठोर; माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया? 'नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया' मैं नीले अज्ञात गगन की, सुनता हूँ अनिवार पुकार। कोइ अंदर से कहता है, उड़ जा, उड़ता जा पर मार;- माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया? 'आज सुफल हैं तेरे डैने, आज सुफल है तेरी काया' ऐसी ही अन्य बाल कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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