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12:04 pm
ग़ज़ल का अंश… रेत के ये ढेर मुझसे आज कुछ कहने लगे, ये मरुस्थल आज क्यों अच्छा मुझे लगने लगा। सर्द हवा ने रेत पर तस्वीर तेरी खींच दी, देखकर चेहरा तेरा अच्छा मुझे लगने लगा। रोशनाइयों में क्यों अब मन मेरा लगता नहीं, अब अंधेरों का सिला अच्छा मुझे लगने लगा। सादगी इस शख्सियत में आ गई है इस कदर, जो भी हो जैसा भी हो अच्छा मुझे लगने लगा। इन अंधेरे रास्तों का अब सफर थमता नहीं, यादों का तेरी काफिला अच्छा मुझे लगने लगा। याद तेरी आ रही है एक खिलौने की तरह, मन मेरा क्यों आज फिर बच्चा मुझे लगने लगा। टूटे स्वप्न पीठ पर लादे चला था मैं कही, बातों का तेरी कारवाँ अच्छा मुझे लगने लगा। इस कदर मशगूल रहता हूँ मैं खुद में आज कल, अपना शक्लों मिजाज भी अच्छा मुझे लगने लगा। ऐसी ही कुछ चुनिंदा ग़ज़लों का मजा ऑडियो की मदद से लीजिए…

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