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2:27 pm
कहानी का अंश… सदाको हिरोशिमा में रहती थी। यह जापान का वही शहर है, जहाँ अमेरिका ने एटमबम गिराया था। एटमबम की तबाही से बहुत सारे लोग मारे गए थे और बचे हुए लोग एक विचित्र बीमारी के शिकार हो गए थे। सदाको भी उनमें से एक थी। सदाको अस्पताल में भर्ती थी। उसकी दोस्त ने उसे कागज के एक हजार सुनहरे पक्षी बनाने की सलाह दी थी। कागज के पक्षी एक शुभ प्रतीक थे। सभी लोग सदाको के पक्षियों के लिए कागज जमा करने लगे। सदाको रोज दो-चार चिड़िया बनाती। अगले कुछ दिनों में कई बार ऐसा लगा जैसे सदाको एकदम भली-चंगी हो गई है। परंतु डॉक्टर्स ने कहा कि सदाको को अस्पताल से घर ले जाना उचित नहीं है। अब तक सदाको को पता चल चुका था कि उसे खून का कैंसर है। पर उसने अपने स्वस्थ होने की उम्मीद नहीं छोड़ी थी। उसे पूरी आशा थी कि एक दिन वह ठीक हो जाएगी। सदाको हमेशा अपने आपको व्यस्त रखती। अपने मित्रों को पत्र लिखती, मिलने आनेवाले लोगों से पहेलियाँ बूझती, खेल-खेलती और गाने गाती। शाम के वक्त वह चिड़िया बनाती थी। वह अभी तक तीन सौ से भी ज्यादा चिड़िया बना चुकी थी। अब कागज मोड़ने में उसका हाथ साफ हो चुका था। उसकी उँगलियाँ कागज के मोड़ों को अच्छी तरह पहचानने लगी थी परंतु धीरे-धीरे उसकी बीमारी बढ़ती जा रही थी। सदाको को शरीर में दर्द का अहसास होने लगा था। कभी-कभी उसके सिर में इतना तेज दर्द होता कि वह न तो पढ़ पाती थी और न ही लिख पाती थी। कभी उसे ऐसा लगता मानो उसकी हड्डियों में आग लग गई है और वह गलने लगी हैं। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा जाता। वह घंटो सुनहरे पक्षी को अपनी गोद में लेकर बैठी रहती। एक दिन नर्स उसे पहियो वाली कुर्सी पर बैठाकर बाहर बरामदे में ले आई। वहाँ कुछ धूप थी। यहाँ सदाको की मुलाकात केनजी से हुई। आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए….

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