शुक्रवार, 20 मई 2016

कविताएँँ - डॉ. महेंद्र भटनागर

कविता का अंश... ग्रीष्म... तपता अंबर, तपती धरती, तपता रे जगती का कण-कण! त्रस्त विरल सूखे खेतों पर बरस रही है ज्वाला भारी, चक्रवात, लू गरम-गरम से झुलस रही है क्यारी-क्यारी, चमक रहा सविता के फैले प्रकाश से व्योम-अवनि-आँगन! जर्जर कुटियों से दूर कहीं सूखी घास लिए नर-नारी, तपती देह लिए जाते हैं, जिनकी दुनिया न कभी हारी, जग-पोषक स्वेद बहाता है, थकित चरण ले, बहते लोचन! भवनों में बंद किवाड़ किए, बिजली के पंखों के नीचे, शीतल खस के परदे में जो पड़े हुए हैं आँखें मींचे, वे शोषक जलना क्या जानें जिनके लिए खड़े सब साधन! रोग-ग्रस्त, भूखे, अधनंगे दमित, तिरस्कृत शिशु दुर्बल, रुग्ण दुखी गृहिणी जिसका क्षय होता जाता यौवन अविरल, तप्त दुपहरी में ढोते हैं मिट्टी की डलियाँ, फटे चरण! डॉ. महेंद्र भटनागर की अन्‍य कविताओं का आनंद ऑडियो के माध्‍यम से लीजिए...

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