सोमवार, 16 मई 2016

कविताएँँ - दिनेश प्रभात

कविता का अंश... लिखी हे नाम यह किसके, तुम्हारी उम्र वासंती? अधर पर रेशमी बातें, नयन में मखमली सपने। लटें उन्मुक्त­सी होकर, लगीं ऊंचाइयाँ नपनें। शहर में हैं सभी निर्थन, तुम्हीं हो सिर्फ धनवंती। तुम्हारा रूप अंगूरी तुम्हारी देह नारंगी। स्वरों में बोलती वीणा हँसी जैसे कि सारंगी। मुझे डर है न बन जाओ कहीं तुम एक किंवदंती। तुम्हें यदि देख ले तो, ईष्र्या वो उर्वशी कर ले। झलक यदि मेनका पा ले, तो समझो खुदकुशी कर ले। कहो तो प्यार से रख दूँ, तुम्हारा नाम वैजंती। कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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