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कविता का अंश... बेटी की पीड़ा साँस अभी थमी नहीं ,रात अभी ढली नहीं पथभ्रष्ट हो रहे सभी ,माँ चल दूर कहीं। नन्ही परी पुकारती ,घर संसार वो सँवारती फिर क्यों हमीं से ,जीवन की भीख माँगती? देवता से भी अधिक, देवियाँ पूजी जाती जहाँ, क्यों बेटियाँ ? जन्म से पहले ही, विदा होती वहाँ। अपराधिन हँू मैं नहीं, बेटी हँू मैं माँ तुम्हारी , बताओ माँ! धरती पर,मेरा आना क्यों हुआ भारी? पुत्र ही क्यों है हर सम्मान का अधिकारी? पुत्री भी नाम रौषन कर सकती है तुम्हारी। गर मैं नहीं तोे भूमि, रह जायेगी वंषों से खाली, बेटी हँू मैं ,मुझसे ही सजती है जीवन की क्यारी। नया सूर्योदय का है इंतजार,जब बेटी का हो सम्मान धरा भी माँ कहलाने का सर्वस्व कर सकेगी अभिमान। आने वाली पीढ़ी में,रह न जाए वसुधा हमसे खाली बेटी को बचाओ! वरना अभागिन रहेगी माँ हमारी। कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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  1. संवेदनाओं के पंख ,दिव्य दृष्टि की मैं सदैव आभारी रहूँगी। साथ ही भारती परिमल जी की जिनकी स्वर ने कविता में जान डाल दी।

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