अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

लेख के बारे में... भारतीय फिल्‍मों में हास्‍य कहानी व सिचुएशन के आधार पर निर्धारित होता था। हास्‍य एक नैसर्गिक कला है जिसका मन से नजदीक का संबंंध होता है। मन की प्रसन्‍नता हालात पर निर्भर करती है। हास्‍य एक कठिन विधा होती है। किसी को हँँसाना मामूली बात नहीं है। डायलॉग की अदायगी, शारीरिक हावभाव, चेहरे की मुद्राएँँ सभी कुछ इसमें शामिल होता है। हास्‍य बोला और अबोला दोनाें प्रकार का होता हे। मूक फिल्‍मों में भी हास्‍य हाता था पर उसे केवल आँँखों से, चेहरे के हावभाव से और शारीरिक हावभाव से व्‍यक्‍त किया जाता था। महर्षि नारद को पहला हास्‍य कलाकार माना जाता था। अंग्रेजी के हास्‍य कलाकार चार्ली चेंपलिन से पूछा गया कि उन्‍हें सबसे अधिक कौन सी ऋतु अच्‍छी लगती है, तो उनका जवाब था- बरसात की ऋतु क्‍योंकि इस ऋतु में आँँसू छिप जाते हैं, दिखाई नहीं देते। कोई भी हास्‍य कलाकार अंदर से बहुत दुखी होने का बाद भी अगर हँँसाने में सफल होता है, तो यही उसकी सच्‍ची अभिनय कला है। हमारे भारतीय फिल्‍मों के ऐसे ही हास्‍य कलाकारों के बारे में जानकारी प्राप्‍त कीजिए, मणि खेड़ेकर भट के लेख से तैयार किए गए इस ऑडियो के माध्‍यम से...

एक टिप्पणी भेजें

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " हिंदी भाषी होने पर अभिमान कीजिये " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. हास्य कलाकार हमें हँसा कर अपने दुख को भुलाने में मददगार होते हैं।

    उत्तर देंहटाएं

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.