गुरुवार, 18 अगस्त 2016
रक्षाबंधन पर कविता - 2 - बसंत कुमार शर्मा
आ गई हैं राखियाँ...
कविता का अंश...
हर गली बाजार में अब छा गई हैं राखियाँ,
प्रेम का त्यौहार लेकर आ गई हैं राखियाँ।
दूर भाई है अगर तो क्या हुआ, चिंता नहीं,
कूरियर के साथ भी तो जा रहीं हैं राखियाँ।
राखियाँ जिसने बनाईं शुक्रिया उसका भी है,
हर बहिन के प्यार को दिखला रही हैं राखियाँ।
डोर हैं ये प्यार की बस जोड़ना हैं जानतीं,
हाथ में बँधकर दिलों तक जा रहीं हैं राखियाँ।
हार चूड़ी और कँगना चाहिए कुछ भी नहीं,
मात्र रक्षा का वचन भरवा रहीं हैं राखियाँ।
मोल राखी का चुकाना है बड़ा मुश्किल यहाँ,
देख लो इतिहास को समझा रहीं हैं राखियाँ।
खीर है, मीठी सिवैयाँ, बन रहे पकवान हैं,
है अगर रूठा कोई, मनवा रही हैं राखियाँ।
साल का त्यौहार है रिश्ते निभाने के लिये,
याद बचपन फिर हमें करवा रही हैं राखियाँ।
इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
लेबल:
कविता,
दिव्य दृष्टि

सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
Post Labels
- अतीत के झरोखे से
- अपनी खबर
- अभिमत
- आज का सच
- आलेख
- उपलब्धि
- कथा
- कविता
- कहानी
- गजल
- ग़ज़ल
- गीत
- चिंतन
- जिंदगी
- तिलक हॊली मनाएँ
- दिव्य दृष्टि
- दिव्य दृष्टि - कविता
- दिव्य दृष्टि - बाल रामकथा
- दीप पर्व
- दृष्टिकोण
- दोहे
- नाटक
- निबंध
- पर्यावरण
- प्रकृति
- प्रबंधन
- प्रेरक कथा
- प्रेरक कहानी
- प्रेरक प्रसंग
- फिल्म संसार
- फिल्मी गीत
- फीचर
- बच्चों का कोना
- बाल कहानी
- बाल कविता
- बाल कविताएँ
- बाल कहानी
- बालकविता
- भाषा की बात
- मानवता
- यात्रा वृतांत
- यात्रा संस्मरण
- रेडियो रूपक
- लघु कथा
- लघुकथा
- ललित निबंध
- लेख
- लोक कथा
- विज्ञान
- व्यंग्य
- व्यक्तित्व
- शब्द-यात्रा'
- श्रद्धांजलि
- संस्कृति
- सफलता का मार्ग
- साक्षात्कार
- सामयिक मुस्कान
- सिनेमा
- सियासत
- स्वास्थ्य
- हमारी भाषा
- हास्य व्यंग्य
- हिंदी दिवस विशेष
- हिंदी विशेष
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें