गुरुवार, 4 अगस्त 2016

लघुकथा - सूखी घास - आशीष कुमार त्रिवेदी

कथा का अंश… वह छोटा लड़का बहुत तेजी से खुर्पी चला रहा था। वेदा ने उसे लॉन की सूखी घास छीलने के लिए कहा था। भूख से बेहाल जब वह उसके दरवाजे पर कुछ खाने के लिए माँगने आया तो वेदा ने उसे डाँटते हुए कहा कि तुम लोगों की तो आदत है, भीख माँगने की। बिना काम के कुछ नहीं मिलेगा। भूख से अँतड़याँ खींची जा रही थी किंतु कोई चारा नहीं था अत: वह काम करने के लिए तैयार हो गया। वेदा ने उसे खुर्पी लाकर दी और वह घास छीलने लगा। गरमी के दिन थे। उसके माथे से पसीना टपक रहा था लेकिन वह इन सब बातों की परवाह किए बिना अपना काम कर रहा था। पेट की आग ने सारी परेशानियों का अहसास मिटा दिया था। अब तो बस वह यही सोच रहा था कि कब काम खत्म हो और उसे मजदूरी मिले और वह कुछ खा सके। क्या उसे खाना मिला? जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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