गुरुवार, 18 अगस्त 2016
रक्षाबंधन पर कविता - 1
कविता का अंश….
उमड़-घुमड़ कर आई घटा सावन की,
साथ लाई यादें बाबुल के आँगन की।
रखकर सूनी कलाई बैठे हैं भाई,
बहना ने रिश्तों की डोर उस पर है सजाई।
बाँधा है प्यार अपना राखी के कच्चे धागों में,
हँसते-गाते जीवन बीते…
दुआ है यही इन कच्चे तागों में।
दूर देश में बैठी है माँ-सी ममता बरसाती बहना,
बरस-बरसकर, उमड़-उमड़कर…
आती है दुआएँ लबों पर,
कुछ मुस्कानों के मोती बिखरते हैं,
कुछ आँसू की लड़ियाँ बनती हैं,
बनती-सँवरती इन लड़ियों में
रिश्तों की मजबूत कड़ियों में
बहना की दुआएँ पलती हैं।
हर पल, हर क्षण वो,
भाई के संग-संग चलती हैं।
भावविभोर करती ऐसी ही कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…
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कविता,
दिव्य दृष्टि

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