मंगलवार, 30 अगस्त 2016

विज्ञान कविता – टेलीफोन की खोज – सुधा अनुपम

कविता का अंश... देश था क्यूबा, शहर हवाना, शख्स का नाम था म्यूकी, जिसने पहला फोन बनाया, लगी जरूरत क्योंकि। म्यूकी की बीवी थी अपाहिज, चल-फिर न पाती थी। जिसकी चिंता हरदम, हरपल, म्यूकी को खाती थी। म्यूकी का जब फोन बना, वो बैठा था तलघर में। बीवी थी तीसरे माले पर, बात हुई पलभर में। म्यूकी का वो फोन कभी भी, आम नहीं हो पाया, सन् 1861 में फिर, फिलीप ने इसे बनाया। दो खाली टिन के डिब्बों के, बीच से डाली डोर। एक किनारे पर एक डिब्बा, दूजा दूसरी ओर। जो कुछ बोलो आगे बढ़ता, धागे के कम्पन से। ऐसा खेल खेलते आए, हम सभी बचपन से। धागा हटकर तार आ गए, विद्युत का सब खेल। स्वर लहरी को भेजा जिसने, वो था ग्राहम बेल। बेल ने सोचा, क्यों न अपनी बात को भेजा जाए, इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Labels