सोमवार, 1 अगस्त 2016
भुट्टे आये बड़े रसीले - घनश्याम मैथिल "अमृत"
कविता का अंश...
भुट्टे आये बड़े रसीले,
दाने जिनके पीले-पीले,|
चूल्हे सिगड़ी गरम गरम हैं ,
भुट्टे देखो नरम नरम हैं ,|
सिंकने पर खुशबु है आती,
खाने को यह जी ललचाती,|
थोडा नींबू नमक लगाओ,
चबा चबा कर इनको खाओ,|
दादा जी के दांत नहीं हैं,
उनको देखो नहीं सताओ,|
दूध भरे यह दाने न्यारे,
बारिश में लगते हैं प्यारे,|
मोतीसे दाने जड़े हुए हैं,
एक कतार में खड़े हुए हैं,|
मुंह पर मूंछें रखें सिकन्दर,
हरे भरे कपड़ों के अंदर ,|
दाने मक्का के पक जाते,
पॉप-कॉर्न हम इनके खाते,|
इनके कई बनते पकवान,
मक्का खूब उगाएं किसान,|
इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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