गुरुवार, 4 अगस्त 2016

किशोरकुमार स्मृति पर विशेष आलेख - जहाँ नहीं चैना, वहाँ नहीं रहना - विनोद तिवारी

लेख का अंश… ‘यूडलिंग’ किशोर कुमार के गायन की निजी विशेषता थी। जिसकी नकल आज तक कोई नहीं कर पाया है। वे कहा करते थे - बात सिर्फ सुर पकड़ने की है। बड़े-बड़े कलाकार जो बहुत कुछ कर गए हैं, उन्हें सुनिए। आपकी लगन सच्ची होगी, तो स्वयं प्रेरणा मिल जाएगी। लेकिन सिर्फ नकल करने पर जोर दिया, तो अलग पहचान बना पाना नामुमकिन होगा। किशोर को पुरस्कार तो अनेक मिले हैँ, लेकिन वे हिंदुस्तान के सबसे गरीब आदमी के उस पुरस्कार को महान मानते थे, जो अपनी बेचैनी या पीड़ा के क्षणों में उनके किसी गीत को गुनगुनाकर चेहरे पर खुशी और मुस्कान से खिल उठता था। किशोर कुमार की संगीत यात्रा कब से शुरू हुई, कोई नहीं जानता। किसी को वह नौजवान याद है, जो कि इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में अपनी पढ़ाई के दिनों में के.एल.सहगल के गीतों से समां बाँध दिया करता था, तो कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें उस बालक का भी स्मरण है, जो एक साथ सात-सात गोल्ड मैडल जीत कर शरमाता-सकुचाता हुआ घर लौटता था। आगे चलकर कितनी फिल्मों के लिए कितनी गोल्ड डिस्क इसी किशोर कुमार के बंगले की शोभा बनी। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है क्योंकि किशोर के मन में अपनी किशोरावस्था का वही मासूम किशोर सदा जमा बैठा रहा जो हर सफलता को विनम्रता और झिझक के साथ स्वीकार करने के बाद, प्रचार से दूर, अपनी साधना में पुन: लगन से लग जाने को श्रेष्ठ समझता था। कहते हैं कि हीरे की परख जौहरी को होती है और इस हीरे को परखनेवाले जौहरी थे - संगीतकार खेमचंद प्रकाश। सर्वप्रथम उन्होंने ही अपनी फिल्म जिद्दी में किशोर को अवसर दिया। अभिनेता एवं गायक किशोर कुमार के बारे में ऐसे ही अन्य दिलचस्प बातें जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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