सोमवार, 29 अगस्त 2016

कहानी – योगेन पंडित

वास्तव में यह एक बंगाली कहानी है, जिसका हिंदी अनुवाद किया है – उत्पल बैनर्जी ने। इस कहानी में गाँव में प्रचलित पुराने परिवशे की शिक्षा पद्धति का चित्रण किया गया है। कहानी का अंश… हरिपुर के ओअर प्राइमरी स्कूल के योगेन पंडित को बुढ़ापे में बहुत दुखी होना पड़ा। नये जमाने के नये चाल-चलन के साथ वे किसी तरह अपना सामंजस्य नहीं बैठा पाए। वे अब भी छात्रों को सबक याद करने के लिए कहते और यदि वे सबक याद नहीं करते तो वे उन्हें थप्पड़ मारते, कान खींचते, बेंत लगाते और बेरहमी से पिटाई भी करते। बदमाश लड़कों को वे पीट-पीट कर अधमरा कर देते। इन सबके अलावा वे एक और काम किया करते थे। इसे वे हमेशा से करते आए थे। स्कूल आकर वे दो-एक घंटे की नींद लिया करते थे। वे लगभग एक कोस दूर एक सुनार के मकान में रहते थे। वहाँ उन्हें रोज देर रात तक जागकर बही-खाते लिखने पड़ते थे। इसके एवज में उन्हें रहने की अनुमति मिलती थी और अनाज भी प्राप्त हो जाता था। अपना खाना वे खुद ही बनाते थे। वे बहुत गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। सभी उनसे डरते भी थे। विद्यार्थी उन्हें चोरी-छिपे भैंसा पंडित कहा करते थे। जैसे काला रंग था, वैसे ही वे ताकतवर भी थे। उनकी दोनों आँखें हमेशा लाल रहती थी। कोई भी उन्हें छेड़ने का साहस नहीं कर सकता था। रोज एक कोस पैदल चल कर वे बारह बजे के आसपास स्कूल पहुँचते। वे बच्चों को मारते जरूर थे पर प्यार भी बहुत करते थे। तनख्वाद तो बहुत कम मिलती थी फिर भी अच्छे बच्चों को पुरस्कार दिया करते थे। गरीब बच्चों को किताबें खरीदकर देते थे। कोई बीमार पड़ जाता तो उनकी देखरेख भी करते। संसार में उनका अपना कोई नहीं था। जो कुछ भी था, वे सब बच्चे ही थे। इसलिए वे उनके बीच ही अपनी जिंदगी गुजार रहे थे। आखिर एक दिन ऐसी क्या घटना घटी कि वे दुखी हो गए और हरिपुर छोड़कर सदा के लिए चले गए? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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