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लेख का अंश... दादा साहेब फालके का पूरा नाम घुण्डीराज गोविन्द फालके था। उनका जन्म नासिक के पास तीर्थस्थ्ल त्र्यम्बकेश्वर में 30 अप्रेल 1870 में हुआ था। उनके पिता एक शास्त्री थे। आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। बाद में उन्हें जेजे स्कूल ऑफ आर्टस मुंबई भेजा गया। वहाँ उन्होंने फोटोग्राफी, मुद्रण कला, जादू, सिलाई, पेँटिंग, कारपेंटरी जैसी कलाएँ सीखीं। बडौदा के कला भवन से रंगकर्म का पाठ सीखा। पढ़ाई समाप्त करने के बाद पूना की सरकारी प्रिंटिंग प्रेस में काम किया। स्वदेशी आन्दोलन से प्रेरित होकर सरकारी नौकरी छोड़ दी। 1909 में वे जर्मनी गए और तीन रंग छापने वाली प्रिंटिंग मशीन लेकर आए। इस बीच भागीदारी में जो ब्लाक मेकिंग और फोटोग्राफी का स्टूडियो खोला था, उसकी भागीदारी टूट गई। निराश होकर कुछ दिनों के लिए रतलाम में भी रहे। इन्दौर के महाराजा तुकोजीराव होल्कर से भी उन्हें आर्थिक सहायता मिली थी। तम्बू सिनेमा में फिल्म द लाइफ ऑफ क्राइस्ट देखकर अपनी फिल्म निर्माण करने की योजना बनाई। घरपरिवार और दोस्तों के सहयोग से इसे मूर्त रूप देने के लिए 1912 में फिल्म निर्माण का साजो-सामान लेने के लिए लंदन गए। उपकरण और रसायन खरीदकर भारत लौटे। उससमय राजा हरिश्चंद्र के रोल के लिए तो दत्तात्रय दाबके की सेवाएँ ली गई लेकिन रानी तारामती के लिए कोई स्त्री तैयार नहीं थी। फिल्म क्षेत्र में उतरना एक घटिया व्यवसाय समझा जाता था। यहाँ तक कि वेश्याओं ने भी इसके लिए साफ मना कर दिया। तब एक पुरूष को ही तारामती का रोल दिया गया। 3 मई 1913 में मुंबई के कोरोनेशन थियेटर में भारत की पहली फिल्म दर्शकों के सामने आई और इस तरह दादा साहेब फालके भारतीय सिनेमा के पितामह कहलाए। दादा साहेब और फिल्म राजा हरिशचन्द्र से जुड़ी अन्य बातें जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

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