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1:07 pm
प्राचीन काल में एक राजा राज्य करता था। जिसका नाम था शत्रुदमन। वह बड़ा न्याय प्रिय और प्रजाप्रेमी था। दिन-रात प्रजा की भलाई में लगा रहता था। वह चाहता था कि उसके राज्य में सभी सुखी रहे। वह सदा अपनी प्रजा को सुखी बनाने के लिए ही प्रयत्नशील रहता था। राजा की प्रजा भी उसका सम्मान करती थी। जिस तरह देवता की पूजा की जाती है , उसी प्रकार वो अपने राजा की पूजा करती थी। बस राजा-रानी को केवल एक दुख था कि उनकी कोई संतान नहीं थी। वे दिन-रात प्रजा की भलाई के साथ-साथ ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि उन्हें संतान सुख मिले। प्रजा भी राजा का ये दुख समझती थी इसलिए वे भी प्रार्थना किया करती थी। उन सभी की प्राथनाएँ बेकार नहीं गई। लंबे समय बाद ही सही, राजा के यहाँ एक पुत्र पैदा हुआ। राजा-रानी ने उसका नाम रखा - अरिदमन। राजकुमार को पाकर प्रजा भी प्रसन्न हो गई। चंद्रकला की तरह धीरे-धीरे राजकुमार बढ़ने लगा। लेकिन राजपुत्र में राजा के समान दयालुता का गुण नहीं था। वो बड़ा अनाचारी था। उसे राजा का दान-दक्षिणा देना बिलकुल पसंद नहीं था। वह इसे धन की हानि समझता था। प्रजा अपने राजकुमार के इस अनाचार से दुखी थी। राजा को भी जब इस बात का पता चला तो वे सोच में पड़ गए। राजा ने राजकुमार का हृदय परिवर्तन करना चाहा। क्या वे इसमें सफल रहे या नहीं, किसने उनकी सहायता की, राजकुमार को असलियत और बनावट में अंतर स्पष्ट हुआ कि नहीं, ये सारे प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए सुनिए कहानी...

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